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राजस्थान: फिल्म 'दंगल' की छोरियों से कम नहीं हैं ये बेटियां, कबड्डी में कमा रही हैं नाम

लड़कियां कबड्डी के मैदान में उतरती है तो पूरा गांव एक जगह इकट्ठा होता है लड़कियों का कबड्डी मैच देखता है. बीजरासर गांव की 8 बेटियां नेशनल स्तर पर खेल चुकी हैं जबकि 12 बेटियां राज्य स्तर पर. 

राजस्थान: फिल्म 'दंगल' की छोरियों से कम नहीं हैं ये बेटियां, कबड्डी में कमा रही हैं नाम
कबड्डी के खेल में राष्ट्रीय स्तर पर भी बीजरासर गांव का नाम रोशन कर चुकी हैं गांव की बेटियां.

सरदारशहर/ मनोज प्रजापत: दंगल फिल्म की स्क्रिप्ट को हकीकत में तब्दील कर रही है सरदारशहर के एक छोटे से गांव बिजरासर की बेटियां, फर्क बस इतना है फिल्म में जो कुश्ती का दंगल था वो बिजरासर में कबड्डी का मैदान है. जिस तरह दंगल में एक पिता के सपने को बेटियों द्वारा पूरा करते हुए दिखाया गया है. उसी तरह सरदारशहर से 35 किलोमीटर दूर स्थित गांव बिजरासर की बेटियां कबड्डी के क्षेत्र में नई कहानी लिखने जा रही हैं और यहां उनका पूरा समर्थन कर रहे हैं उनके गुरु. 

हालांकि, इन बेटियों के लिए इस मुकाम तक पहुंचना आसान नहीं था. इसके पीछे इन बेटियों कड़ा संघर्ष किया, गांव वालों के ताने और इनके घरवालों को भी न जाने समाज द्वारा कही जाने वाली कितनी बातों का सामना करना पड़ा लेकिन आज के वक्त में पूरा बिजरासर गांव इन बेटियों के साथ खड़ा है और गांव में अब कबड्डी को भी अहम महत्व दिया जाता है. 

जब लड़कियां कबड्डी के मैदान में उतरती है तो पूरा गांव एक जगह इकट्ठा होता है लड़कियों का कबड्डी मैच देखता है. बीजरासर गांव की 8 बेटियां नेशनल स्तर पर खेल चुकी हैं जबकि 12 बेटियां राज्य स्तर पर. गत राष्ट्रीय कबड्डी प्रतियोगिता में राजस्थान की कबड्डी टीम में 2 बेटियां बीजरासर की शामिल थी. वहीं चूरू जिले पर पिछले 4 सालों से बिजरासर की बेटियों का ही कब्जा है. सरदारशहर के छोटे से गांव से निकलकर यह बेटियां दिल्ली, गुजरात, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा में भी कबड्डी के मैदान में अपना दमखम दिखा चुकी हैं.

एक ताने ने बदली पूरे गांव की किस्मत
दरअसल 2014 में जब बिजरासर की लड़कों की कबड्डी की टीम राजेंद्र पोटलिया के नेतृत्व में पास ही के गांव में कबड्डी का मैच खेलने के लिए गई तब इस टीम को सफलता नहीं मिली और हार का मुंह देखना पड़ा. हार के साथ साथ पड़ोस के गांव वालों ने राजेंद्र पोटलिया को ताना मार दिया की कबड्डी का खेल कोई बच्चों का खेल नहीं है. तब कबड्डी के कोच राजेंद्र को यह बात चुभ गई और उन्होंने ठान लिया कि मैं एक ऐसी टीम बनाऊंगा जो ना सिर्फ शहर या जिले में बल्कि देश में गांव का नाम रोशन करेगी. इसके बाद गुरु राजेंद्र ने लड़कों पर काफी मेहनत की लेकिन लड़के गुरु राजेंद्र की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे. फिर उन्होंने असंभव को संभव बनाया और लड़कियों को कबड्डी के मैदान में उतार दिया और लड़कियों ने एक के बाद एक गांव से लेकर शहर तक और जिले से लेकर प्रदेश तक जीत के झंडे गाड़ दिए लेकिन यह गुरु राजेंद्र के लिए इतना आसान भी नहीं रहा.

अपने घर की बेटियां से की शुरुआत
जब गांव के लड़के कबड्डी में सफल नहीं हुए तो राजेंद्र ने लड़कियों के साथ एक अच्छी कबड्डी की टीम बनाने कि मन में ठानी, लेकिन शुरू शुरू में गांव में कोई भी अपनी बेटियों को कबड्डी खिलाने पर राजी नहीं हुआ. तब थक हारकर राजेंद्र ने स्वयं ही अपनी दो बेटियों को और अपनी बहन को कबड्डी खिलाना शुरू कर दिया. इसके बाद धीरे-धीरे गांव की अन्य बेटियां भी कबड्डी खेलने के लिए आने लगी लेकिन इस दौरान इन बेटियों को काफी कुछ गांव वालों से सुनना भी पड़ा. शुरु शुरु में तो अन्य लड़कियों के घर वाले भी कहते थे कि कबड्डी लड़कों का खेल है लड़कियों का नहीं लेकिन लड़कियां नहीं मानी और राजेंद्र के नेतृत्व में मेहनत करती रहीं और अंत में बेटियों ने सफलता के नए-नए मुकाम हासिल किए. आज इन बेटियों पर पूरा गांव गर्व करता है. राजेंद्र बिना किसी दक्षिणा के लड़कियों को कबड्डी सिखाते हैं.

बेटियां करती है कड़ी मेहनत
कबड्डी के मैदान में सफल होने के लिए बेटियां कड़ी मेहनत करती हैं. इन बेटियों के परिजनों ने बताया कि सुबह 4 बजे उठकर दौड़ लगाने चली जाती हैं, फिर कबड्डी के मैदान में प्रैक्टिस करती हैं जिसके बाद यह बेटियां घर आकर घर के काम में घर वालों का हाथ भी बटाती हैं. फिर यह बेटियां स्कूल जाकर अपनी पढ़ाई पर भी पूरा ध्यान लगाती है.

गांव में नहीं है कबड्डी का कोई अच्छा मैदान
बेटियां जहां कबड्डी में जीत के नए-नए झंडे गाड़ रही हैं और गांव वालों का नाम रोशन कर रही है. वहीं अफसोस की बात की गांव में अभी भी बेटियों को कबड्डी का अच्छा मैदान तक नसीब नहीं हुआ है. जिसके चलते बेटियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. यह बेटियां खुद ही टूटी फूटी जगह पर हर रोज मैदान को बनाती हैं उसमें पानी डालती हैं और कबड्डी खेलती हैं. राजेंद्र ने बताया कि जब बाहर मैच खेले जाते हैं तब मेंट का मैदान मिलता है लेकिन गांव में अच्छा मैदान नहीं होने के चलते बेटियों को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है यदि गांव में एक अच्छा मैदान हो तो बेटियां निश्चित रूप से देश का नाम रोशन कर सकती है.