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फादर्स डे: उदयपुर का वह निवासी जिसने 'पिता' शब्द को दी नई परिभाषा, जानिए पूरी कहानी

करीब 12 साल पहले उदयपुर में लगातार सात दिन तक कन्या भ्रूण और झाड़ियों लावारिस नवजातों के मिलने की घटना ने गौरवपूर्ण इतिहास के धनी इस शहर को कलंकित कर दिया था.

फादर्स डे: उदयपुर का वह निवासी जिसने 'पिता' शब्द को दी नई परिभाषा, जानिए पूरी कहानी
इन घटना ने देवेंद्र अग्रवाल के जीवन को नया मोड़ दिया

अविनाश जगनावत/उदयपुर: आज दूनिया भर में फादर्स डे को बडे ही धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है. अपने बच्चों के भविष्य को बनाने के लिए पिता के त्याग के आपने सैंकडों उदाहरण देखे और सुने होंगे. लेकिन फादर्स डे के मौके पर हम आप को एक ऐसे पिता से रूबरू करवाने जा रहे है जिसने पिता को शब्द की नई परिभाषा देते हुए उन सैकडों बच्चों को नया जीवन दिया, जिन्हें जन्म के तुरन्त बाद अपनो ने ठुकरा दिया था.

मासूम और नवजात बच्चों के साथ अठखेलिया करते देवेंद्र अग्रवाल उदयपुर में योग गुरु के नाम से विख्यात है. करीब 12 साल पहले उदयपुर में लगातार सात दिन तक कन्या भ्रूण और झाड़ियों लावारिस नवजातों के मिलने की घटना ने गौरवपूर्ण इतिहास के धनी इस शहर को कलंकित कर दिया. इन घटना ने देवेंद्र अग्रवाल के जीवन को नया मोड़ दिया और उनके मन के अंदर जगे पितृ भाव ने उन्हें ऐसे बच्चों को बचाने के लिए प्रेरित किया जिन्हें या तो कोख में ही मार दिया जाता या परिवार के लोग ही जन्म के बाद उन्हें झाड़ियों में फेंक देते. 

ऐसे बच्चों को बचाने का बीड़ा उठाने काम शुरू इतना आसान नहीं था. लेकिन योग गुरु ने फेंको मत हमे दो का नारा देते हुए अपने घर के पास ही एक पालना लगा दिया और बच्चों को लावारिस फेकने वालो से इस पालने में बच्चो का सुरक्षित परित्याव करने की अपील की. उनका यह प्रयास सार्थक भी हुआ और अगले कुछ महीनों में पालने में पांच नवजात बच्चे भी आ गए. जिनका वे एक पिता की तरह अपने घर पर ही पालन पोषण करने लगे. बच्चो को नया जीवन देने में जुटे अग्रवाल को कदम कदम पर कई परेशानियों का सामना करना पड़ा. उनकी यह इच्छा कानूनी पेचिदगियों और नियमो का शिकार हो गई और आखिर सरकार ने पालने में आए सभी बच्चों के जब्त कर लिया. उस समय अग्रवाल को मानो इस लगा जैसे उनके अपने बच्चे उनसे छीन लिए गए हो.

लावारिस छोड़े जाने वाले नवजात बच्चो को बचाने के लिए शुरू किए अभियान का यह हश्र देख एक बार तो योग गुरु देवेंद्र पूरी तरह से टूट गए. लेकिन अपने मकसद में कामयाब होने के दृढ़ निश्चय ने उनकी मुश्किल राहों को धीरे धीरे आसान बना दिया. 'फेंको मत हमे दो' के नारे को सार्थक करने के लिए योग गुरु ने शहर के कुछ भामाशाओं के साथ मिल कर वर्ष 2007 में महेशाश्रम संस्था बना कर शहर के चित्रकूट नगर इलाके में विधिवत रूप से पालना गृह शुरू किया. पालने में बच्चो का सुरक्षित परित्याग हो सके इसके लिए उन्होंने ने कानून में संशोधन कराने की लड़ाई भी प्रारम्भ की. इसके लिए उन्होंने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया. असफल होने पर उन्होंने संसद के जरिए नियमों में बदलाव करवाने का प्रयास प्रारम्भ किया. अपने मकसद को पूरा करने के लिए किए जा रहे प्रयासो में वे सफल भी हुए और कई नियमो में बदलाव भी हुआ. 

पालना ग्रह शुरू होने और नियमो में संशोधन से कई नवजात मासूमो को नया जीवन मिलने लगा. इसके बाद शहर के एमबी हॉस्पिटल में भी एक पालना लगाया गए. करीब एक दशक तक के इस सफर में इन दोनों पालने में 150 नवजात मासूमो का सुरक्षित परित्याग हुआ. जिनमे से 138 नवजातों को बचाने में अग्रवाल सफल हुए. जिनका विभिन्न प्रक्रिया के माध्यम से पुनर्वास भी करवा दिया गया. बच्चो के पुनर्वास होने तक अग्रवाल ने उन्हें एक पिता की तरह प्यार दिया और उनका लालन पालन किया.

पालना गृह के साथ अग्रवाल ने नवजात बच्चो को बचाने के उद्देश्य से मदर मिल्क बैंक, ब्रेस्ट फीडिंग क्लिनिक ओर बेटी गौरव उद्यान को भी शुरू किया. उनके इस प्रयास को प्रदेश सरकार ने भी प्रोत्साहित किया और वर्ष 2015 में उन्हें सरकार के विशेष प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया और बच्चों को बचाने के।लिए प्रदेशभर इस काम को बढ़ाने की जिम्मेदारी सौपी. इसके बाद सरकार की मदद से  प्रदेश बाजार में 68 पालना गृह शुरू किए गए. इन पालने में अब तक 250 से अधिक नवजात बच्चों का सुरक्षित परित्याग हो गया है. इसके साथ ही 18 मदर मिल्क बैंक का भी संचालन शुरू किया गया ओर पांच बैंक का काम अभी चल रहा है. इस दौरान योग गुरु ने अपने पालनो को भी सरकार को सुपुर्द कर दिया.

बहरहाल, 400 से अधिक नवजात बच्चों को नया जीवन देने वाले योग गुरु देवेंद्र अग्रवाल ने पिता शब्द को एन रूप में परिभाषित करने में जरूर सफल हुए है ओर जनक इस प्रयास से इन पालनो में आ कर सैंकड़ो बच्चो को ओर बचाया जा सकेगा. फादर्स डे के मौके पर हम भी अग्रवाल के इस प्रयास को सलाम करेंगे. जो ऐसे बच्चो के पिता बन उनको नया जीबन देने में सफल हुने है जिन्हें अपनो ने ही त्याग दिया.