उदयपुर के इस गांव में बारूद से खेली गई होली, वजह आपको भी कर सकती हैरान!

ढोल की थाप, गोलियों की गूंज, तलवारों की खनक और लाठियों की टकराहट से माहौल में जोश और जुनून पैदा हो जाता है.

उदयपुर के इस गांव में बारूद से खेली गई होली, वजह आपको भी कर सकती हैरान!
मुगलों को खदेड़ने की वीरता की झलक इस दौरान देखने को मिलती है.

अविनाश जगनावत, उदयपुर: होली रंगों का त्यौहार है. आमतौर पर लोग इस त्यौहार को रंगों से खेलते हुए मनाते हैं लेकिन राजस्थान के उदयपुर जिले में एक गांव ऐसा भी है, जहां पर लोग बारूद से होली खेल कर इस त्यौहार को मनाते हैं. रियासतकाल से शुरू हुई बारूद की होली खेलने की यह परंपरा आज भी इृस गांव में बदस्तूर जारी है और इसे देखने के लिए हर साल सैकड़ों की संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं.

होली ऐसा त्यौहार है, जिसके देश भर में अलग–अलग रंग देखने को मिलते हैं. बरसाने की लट्ठमार होली दुनिया भर में मशहूर है, तो कहीं कपड़ा फाड़ होली और कहीं पत्थर बरसा कर होली खेली जाती है. होली के सभी रंग आज भी अपनी चमक को कायम रखे हुए हैं. होली का एक ऐसा ही रंग उदयपुर जिले के मेनार गांव में भी देखने को मिलता है, जहां मेनारिया ब्राह्मण समाज के लोग बारूद से होली खेलते हैं. रियासतकाल से चली आ रही परंपरा गांव में आज भी बदस्तूर जारी है. 

बारूद से होली खेलने से पहले समाज के तमाम लोग पारंपरिक वेश-भूषा में एक योद्धा के रूप में गांव के बीचो-बीच जमा होते हैं. इसके बाद यह तमाम लोग पहले तलवारों से अपना परंपरागत गैर नृत्य करते हैं. इसके बाद बारूद से होली खेलते हैं. इस दौरान बंदूकों और तोपों से बारूद बरसाया जाता है. ये नजारा किसी युद्ध की तरह ही रहा.

मुगल सेना पर जीत का मनाते हैं जश्न
दरअसल, महाराणा उदय सिंह के समय मेनार गांव के पास मुगलों की एक चौकी थी, जहां से मुगल सेना ने मेवाड़ पर आक्रमण करने को योजना तैयार की, जिसकी भनक गांव के मेनारिया ब्राह्मण समाज के लोगों को पड़ गई. इससे बाद ये सभी एक वीर योद्धा की तरह मुगलों की चौकी पर टूट पड़े, जिसमें मेनारिया समाज के कुछ लोग शहीद भी हुए लेकिन वे मुगलों को खदेड़ने में सफल रहे. इसके बाद से ही मेनार गांव में होली के दूसरे दिन जमरा बीज के मौके पर लोग बारूद से होली खेल कर मुगल सेना पर अपनी जीत का जश्न मनाते हैं. मेनारिया समाज के इस वीरता पर उन्हें मेवाड़ के महाराणा ने विशेष उपाधि भी प्रदान की.

युद्ध में गांव के कुछ लोगों की जान भी गई थी
पूरे गांव में दीवाली जैसी भव्य रोशनी की जाती है. जमकर बारूद उड़ाया जाता है और तलवारों से गैर भी खेला जाता है. परंपरागत पोशाकों में गांव के लोग बंदूकें दागते हुए निकलते हैं और चारभुजा मंदिर के पास इकट्ठे होते हैं. कहा जाता है कि मुगलों की आखिरी चौकियों को इस गांव के लोगों ने ही ध्वस्त किया था. इस युद्ध में गांव के कुछ लोगों की जान भी गई थी, जिनकी समाधियां गांव में ही बनाई गईं. इस जीत के बाद इलाके के राजा ने यहां के लोगों को खास पहचान दी. मुगलों पर जीत की खुशी में ही हर साल होली के बाद यहां जमरा बीज मनाया जाता है. गांव के लोग सेना की तरह निकलते हैं और जमकर बारूद दागते हैं. महिलाएं वीर रस के गीत गाती हैं और जमकर आतिशबाजी भी की जाती है. 

परंपरा बेहद खतरनाक भी है 
मुगलों को खदेड़ने की वीरता की झलक इस दौरान देखने को मिलती है और हर कोई जोश से भर जाता है. इसी जीत के जश्न के रूप में यहां होली के बाद हर साल जमरा बीज का आयोजन होता है. यह परंपरा बेहद खतरनाक भी है लेकिन जमरा बीज के जोश के आगे यह खतरा कोई मायने नहीं रखता. ढोल की थाप, गोलियों की गूंज, तलवारों की खनक और लाठियों की टकराहट से माहौल में जोश और जुनून पैदा हो जाता है. मेनारिया ब्राह्मणों के इस गांव में जमरा बीज का उत्साह दीवाली जैसा होता है. बाहर रह रहे लोग भी इस पर्व पर गांव जरूर आते हैं.