राजस्थान चुनाव: बीजेपी और कांग्रेस के लिए दावेदारों को चुनने की राह होगी मुश्किल

टिकट को लेकर कोई भी दावेदार आश्वस्त नहीं है, क्योकिं दोनों पार्टियों के लिए राजस्थान का रण प्रतिष्ठा का सवाल बना हुआ है और एक-एक टिकट का बंटवारा सोच समझ कर किया जाएगा. 

राजस्थान चुनाव: बीजेपी और कांग्रेस के लिए दावेदारों को चुनने की राह होगी मुश्किल

जयपुर: भाजपा और कांग्रेस की टिकट के लिए इस बार जितने दावेदार हैं, उतने पहले कभी नहीं हुए. श्रीगंगानगर जिले की छह विधानसभा सीटों पर आमतौर पर यही देखने में आया है कि टिकट के लिए दो-तीन दावेदार होते हैं और उनमें से मजबूत दावेदार का नाम पहले से ही चर्चा में आ जाता है और फिर पार्टी का निर्णय उसी के पक्ष में होता रहा है. इस बार स्थिति होचपोच वाली है. 

टिकट को लेकर कोई भी दावेदार आश्वस्त नहीं है, क्योकिं दोनों पार्टियों के लिए राजस्थान का रण प्रतिष्ठा का सवाल बना हुआ है और एक-एक टिकट का बंटवारा सोच समझ कर किया जाएगा. कोंग्रेश सेवादल जिलाध्यक्ष श्यामलाल शेखावाटी की माने तो विधानसभा क्षेत्रो में टिकट के दावेदारों की संख्या बढ़ना तो सही है, लेकिन ऐसे में पार्टी को ऐसे लोगों को टिकट देनी चाहिए जो उस विधानसभा की समस्याओं को गहराई से ना केवल जानता हो बल्कि उनका समाधान करने का भी प्लान हो. 

हालांकि, उनकी माने तो अभी जिले में प्रत्येक विधानसभा में कांग्रेस पार्टी से दस से 15 तक टिकट के दावेदार मैदान में हैं लेकिन कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के बीकानेर दौरे के बाद तस्वीर साफ होगी की किसमें कितना दम है. वहीं टिकट के लिए दिल्ली-जयपुर जाने वाले दावेदारों के चक्कर भी खाली जाएंगे अगर उनकी विधानसभाओ में जनता के बिच पकड़ नहीं है. उधर कॉंग्रेश की टिकट के लिए बने सचिन-गहलोत के खेमे भी तब काम नहीं आएंगे जब पार्टी के सर्वे में दावेदारों की मजबूती कमजोर रही हो. कमोबेश यही स्थिति मतदाताओं की है. टिकट की घोषणा से पहले ही अपने विधानसभा क्षेत्र के उमीदवारों के नाम बता देने वाले मतदाता इस बार कयास भी नहीं लगा पा रहे हैं कि किसको टिकट मिल सकती है और कौन चुनाव जीत सकता है.

चुनाव की घोषणा से पहले प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस की टिकट तय करने वाली समितियों की घोषणा भी हो चुकी है. दावेदार अब उन समितियों में शामिल अपने खेवनहारों के हिसाब से खेमो में बंटने लगे हैं. मसलन कांग्रेस की टिकट के दावेदार अशोक गहलोत और सचिन पायलट में से किसी एक का दामन थाम रहे हैं, वहीं भाजपा की टिकट की चाह रखने वाले चुनाव में केन्द्रीय नेतृत्व की रणनीति को भांप खेमा चुनने के साथ-साथ संघ की शरण ले चुके हैं.