राजस्थान निकाय चुनाव 2019: वोटरों को रिझाने में जुटे प्रत्याशी, अपनाई ये तरकीब

सुबह से ही मतदाताओं के लिए चाय और कॉफी के साथ 9 :00 से 11:00 बजे के आसपास ब्रेकफास्ट में खासतौर से बाड़मेर का सबसे प्रसिद्ध पकवान आपको खाने को मिलेगा. 

राजस्थान निकाय चुनाव 2019: वोटरों को रिझाने में जुटे प्रत्याशी, अपनाई ये तरकीब

भूपेश आचार्य, बाड़मेर: राजस्थान में नगर निकाय चुनाव को लेकर जबरदस्त तरीके से चुनावी प्रचार चल रहा है लेकिन हम आपको आज ऐसा एक चुनावी रंग बताने जा रहे हैं जहां जिला मुख्यालय पर इन दिनों आपको कई कॉलोनियों में पकवान कचोरी मिर्ची बड़े पकोड़े के साथ ही चाय कॉफी और रात होते होते तो दूध भी फ्री में पीने को और खाने को मिल सकता है. क्योंकि नगर निकाय चुनाव में जो प्रत्याशी मैदान में है वह अपने वोटरों को रिझाने के लिए इस तरीके से खाने पीने की मौज मस्ती कराते नजर आ रहे हैं. 

यहां आपको गली नुक्कड़ कॉलोनियों में वोटरों को रिझाने के लिए बीजेपी कांग्रेस और निर्दलीय प्रत्याशी इस तरीके से खाने-पीने लंगर चल रहे हैं. खुलेआम आचार संहिता की धज्जियां उड़ रही हैं लेकिन प्रशासन चुप है. ऐसा नहीं है कि बीजेपी वाले आचार संहिता की धज्जियां उड़ा रहे हैं. कोई खुले में उड़ा रहा है तो कोई चुपके से उड़ा रहा है तो निर्दलीय प्रत्याशी तो खुलेआम उड़ा रहे हैं. सुबह से ही मतदाताओं के लिए चाय और कॉफी के साथ 9 :00 से 11:00 बजे के आसपास ब्रेकफास्ट में खासतौर से बाड़मेर का सबसे प्रसिद्ध पकवान आपको खाने को मिलेगा. 

प्रत्याशियों के चुनावी कार्यालयों में पूरे दिन कुछ आपको खाने को जरूर मिलेगा. पश्चिमी राजस्थान में एक कहावत बड़ी प्रसिद्ध है कि " जिसका खाएंगे अन्न, उसका जरूर रखेंगे मन " ऐसा माना जाता है इसीलिए यहां पर जब भी चुनाव होते हैं तो इस तरीके से नेता अपने मतदाताओं को खुश करने के लिए जमकर खिलाते पिलाते हैं. 

मतदाता एक के बाद एक आ रहे हैं. कोई पकवान कर रहा है कोई चाय पिलाए तो कोई कॉफी पीता नजर आ रहा है. ऐसा नहीं है कि यह नजारा सिर्फ एक वार्ड में ही नजर आएगा या ऐसा भी नहीं है कि यह सुबह-सुबह नजर आएगा. शाम होते-होते यह नजारा बदल जाता हैं. शाम को आपको यहां पर पकौड़ा के साथ ही केसर का दूध भी कई जगह पर मिल जाएगा.

यह सब कुछ सबसे बड़ी बात है कि जिला मुख्यालय पर प्रशासन और पुलिस की नाक के नीचे हो रहा है. उसके बावजूद भी कोई इसको रोकने को तैयार नहीं हैं. खुलेआम आचार संहिता की धज्जियां उड़ रही हैं लेकिन कोई भी अधिकारी कार्यवाही करने को तैयार नहीं है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर इस तरीके से मतदाताओं को रिझाना लोकतंत्र के लिए कितना सही है.