कोटा: दवा खरीद टेंडर में हुआ था खेल, नियमों को किया गया दरकिनार

लोकल स्तर पर दवा खरीद का टेंडर करते वक्त परचेज व तकनीकी कमेटी ने नियमो को ताक में रखकर चहेती फर्म को फायदा पहुंचाने के लिए ये सारा खेल किया. 

कोटा: दवा खरीद टेंडर में हुआ था खेल, नियमों को किया गया दरकिनार
जयपुर से आई एक टीम ने मामले से संबंधित रिकॉर्ड को जब्त कर लिया है. (फाइल फोटो)

मुकेश सोनी, कोटा: कोटा मेडिकल कॉलेज में दवाओं की खरीद में हुए गड़बड़झाला का मामला सामने आने के बाद राजधानी जयपुर से आई उच्च स्तरीय टीम ने मामले से संबंधित रिकॉर्ड को जब्त कर लिया है. इस बीच एक और सनसनीखेज खुलासा कॉलेज में दवाओं की खरीद में हुआ है. बताया जा रहा है कि लोकल स्तर पर दवा खरीद का टेंडर करते वक्त परचेज व तकनीकी कमेटी ने नियमो को ताक में रखकर चहेती फर्म को फायदा पहुचाने के लिए ये सारा खेल किया. 

निविदा में नियमों को रखा गया ताक पर

निविदा 04 /2017-18 के तहत मेडिकल कॉलेज प्रशासन की ओर से 1205 प्रकार की दवाइयों के लिए (ड्रग मेडिसिन) अनुमानित लागत 11 करोड़ रुपये का टेंडर जारी किया था.उ सी अनुपात में धरोहर राशि 22 लाख की जमा करवाई. कमेटी मे लगभग 600 प्रकार की दवाओं को अनुमोदन हुआ. बाकी 605 प्रकार की दवाइयों की दर का अनुमोदन ही नहीं किया गया. 

सूत्रों की माने तो फर्म विशेष को फायदा पहुंचाने के लिए तकनीकी कमेटी ने नया नियम लगाकर दूसरी फर्म से ड्रग लाइसेंस की कॉपी मांगते हुए 70 कम्पनी को डिस एप्रूव्ड कर दिया. जबकि सम्बंधित फर्म की ओर से जीएमपी सर्टिफिकेट संलग्न किया गया था. आपको बता दें कि, जीएमपी सर्टिफिकेट पर ड्रग लाइसेंस अंकित होता है. इसी के कारण जो फर्म पहले L1 थी उसको डिस एप्रूव्ड कर L 2 स्थान की दर को L 1 का दर्जा दे दिया. इस पूरे खेल में एक ही परिवार की तीन फर्मो को फायदा हुआ. जिसके बाद उन्हें दवा सप्लाई का टेण्डर जारी हुआ. 

गड़बड़झाला के जिम्मेदारों ने चुप्पी साधी

ड्रग लाइसेंस की कॉपी नही लगाने के कारण L1 (फर्म)को डिस एप्रूव्ड कर दिया. लेकिन L1  द्वारा दवा सप्लाई की रेट कम थी. उसके बावजूद कमेटी ने नियमो की अनदेखी करते हुए L 2 की दर को न्यूनतम घोषित कर दिया. जबकि L1 की रेट पर मेडिकल कॉलेज प्रशासन को आरसी करनी चाहिए थी. L1की कम्पनी डिस एप्रूव्ड हुई थी दवा की रेट नही. ये सारा खेल प्रशासन की मिलीभगत से हुआ. जिसके कारण फर्म विशेष को फायदा हुआ और राजकोष को नुकसान. 

बैकफुट पर है मेडिकल कॉलेज प्रशासन

कमीशनखोरी मामला सामने के आने के बाद मेडिकल कॉलेज प्रशासन बैकफुट पर है. अब जांच के नाम पर लीपापोती करने में लगा है. इधर लोकल स्तर पर टेंडर होने के बाद भी अस्पतालों में दवा सप्लाई नहीं करने वाले फर्म पर मेडिकल कॉलेज प्रशासन व अस्पताल अधीक्षकों ने कोई कार्रवाई नहीं की है. 

नियमों के मुताबिक दवा सप्लाई नही करने पर सम्बंधित फर्म पर शास्ति (पेनल्टी) लगाने का प्रावधान है. सारा खेल उजागर होने के बाद मेडिकल कॉलेज प्राचार्य सहित "जिम्मेदारों" ने चुप्पी साध ली है. कोई भी इस मामले पर बोलने को तैयार नही है.

सवाल जिनका अब तक नहीं मिला जवाब

1. अनुमोदन औषधि की संख्या लगभग 600 है तो बाकी 605 प्रकार की दवाइयों की दर का अनुमोदन क्यों नहीं किया ,धरोहर राशि बढ़ाकर निविदा में विशेष फर्म को लाभ पहुचाना था? ताकि महंगी दर पर दवा की खरीद हो सके

2. क्या मेडिकल कॉलेज प्रशासन का उद्देश्य 37 प्रतिशत वाली शॉप को फायदा पहुचाने का था? 

3. जीएमपी सर्टिफिकेट पर ड्रग लाइसेंस अंकित होता है फिर कमेटी द्वारा नियम लगाकर ड्रग लाइसेंस की कॉपी मांगते हुए फर्म को क्यो डिस एप्रूव्ड किया गया?

4. कम्पनी हटाई जा सकती है लेकिन L1 दर में परिवर्तन नही किया जा सकता है. टेण्डर के नियमानुसार यह नियम RAPP एक्ट में है, उसके बाद भी नियमों को दरकिनार करते हुए L1 को डिस एप्रूव्ड कर L 2 स्थान की दर को L 1 का दर्जा क्यों दिया गया?

5. आखिर कौनसी मजबूरी थी जिसके चलते L1 के स्थान पर L 2 को न्यूनतम दर घोषित कर सरकार को लाखों को चुना लगाया गया?

 ये तमाम सवाल ऐसे है जिनके जवाब मेडिकल कॉलेज प्राचार्य के साथ साथ परचेज व तकनीकी कमेटी को भी देने होंगे. हालांकि मेडिकल कॉलेज कोटा से सम्बंधित अस्पतालों में दवा खरीद व टेंडर घोटाले के मामले में जयपुर से आई उच्च स्तरीय टीम ने मामले से संबंधित रिकॉर्ड जब्त किए है. जाच के बाद ही सारा सच सामने आ पायेगा.