अलवर: ग्रामीणों के विस्थापन की सुस्त प्रक्रिया से बाघों पर लटक रही मौत की तलवार

सरिस्का की पहचान विश्व पटल पर टाइगर सेंचुरी से है. यहां देश-विदेश से पर्यटक भृमण करने आते हैं. 1221 स्कॉयर वर्ग किलोमीटर में फैले सरिस्का में 881 कोर एरिया है.  

अलवर: ग्रामीणों के विस्थापन की सुस्त प्रक्रिया से बाघों पर लटक रही मौत की तलवार
सरिस्का टाइगर रिजर्व

अलवर: सरिस्का की पहचान विश्व पटल पर टाइगर सेंचुरी से है. यहां देश-विदेश से पर्यटक भृमण करने आते हैं. 1221 स्कॉयर वर्ग किलोमीटर में फैले सरिस्का में 881 कोर एरिया है. इसमें बसे गांवों के विस्थापन की सुस्त प्रक्रिया के चलते टाइगर सहित अन्य वन्य जीवों की न सिर्फ जान को खतरा मंडराता रहता है बल्कि वन्य जीवों के स्वछंद विचरण में खलल के चलते वंश व्रद्धि न होना भी मुख्य कारण है.

अलवर में 1995 में सरिस्का टाइगर रिजर्व(Sariska Tiger Reserve) एरिया घोषित किया गया था. आज यह क्षेत्र 1221 स्कॉयर वर्ग किलोमीटर में फैला है. इसमे 881 वर्ग किलोमीटर कोर एरिया व अन्य क्षेत्रबफर और रिवेन्यू में आता है. आज सरिस्का वन क्षेत्र में 11 बाघ बाघिन और 5 कब्स है. पिछले ग्यारह माह में 4 बाघों की मौत पर कई सवाल उठे हैं. 

बाघों की मौत का एक मुख्य कारण सरिस्का वन क्षेत्र में बसे गांवों के विस्थापन की सुस्त प्रक्रिया है. यहां रहने वाले ग्रामीण वन प्रशासन द्वारा दिये जाने वाले पैकेज से संतुष्ट नहीं है, इसके चलते विस्थापन की प्रक्रिया अटकी पड़ी है. इस वजह से ग्रामीणों के आने जाने से न सिर्फ वन्य जीवों के स्वछंद विचरन में खलल होता है बल्कि वंश व्रद्धि न होना भी मुख्य कारण है, लेकिन विस्थापन को लेकर ग्रामीणों की सहमति होना भी बेहद जरूरी है.

यहां 2005 से पहले कभी 35 बाघ बाघिन हुआ करते थे, लेकिन शिकारियों ने इन्हें खत्म कर दिया और सरिस्का में पर्यटकों का आना भी लगभग बन्द हो गया था. आखिर तत्कालीन केंद्र सरकार ने प्रयास करते हुए रणथम्भोर(Ranthambore National Park) से टाइगर को शिफ्ट किया. इसके बाद धीरे-धीरे कई बाघ और बाघिनों को यहां लाकर बसाया गया. धीरे-धीरे एक बार फिर सरिस्का में रौनक लौटने लगी, लेकिन आज फिर एक बार सरिस्का वन क्षेत्र में लगातार आ रही बाघों की मौत पर फिर चिंता होने लगी है. पिछले दो सालों में सात बाघों की मौत हो चुकी है. 

सरिस्का वन क्षेत्र में बसे गांवों के विस्थापन की प्रक्रिया भी सुस्त चाल से चल रही है. यहां से अब तक सिर्फ चार गांवों को ही अन्यत्र बसाया गया है, लेकिन अन्य गांवों के विस्थापन को लेकर ग्रामीणों और वन विभाग में पैकेज को लेकर सहमति नहीं बन पा रही. इससे ग्रामीणों के बहाने शिकारियों का आना जाना भी लगा रहता है, जिससे बाघों के खतरा बरकरार है.