गुजरे ज़माने की फिल्‍म है, ‘बाज़़ार’. वैसे तो उस पर खूब लिखा गया है. और मैं सिनेमा का जानकार भी नहीं हूं. उसके बाद भी आज अगर हम ‘जिंदगी के इस कोने’ में फिल्‍म पर विमर्श करने जा रहे हैं, तो उसकी वज़ह है, ‘बाज़़ार’ का समय से परे होना, कहानी के समाज पर प्रभाव की संभावना.


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‘बाज़़ार’ आज भी उतनी ही प्रासंगिक है. इसकी सबसे बड़ी खूबी जीवन का संपूर्ण दस्‍तावेज होने में है. हमारी फिल्‍में विषयों के चुनाव और चरित्र चित्रण में कोई बहुत प्रभावी नहीं रही हैं, अक्‍सर लीक पर चलती हैं, ऐसे में एक फिल्‍म का अपने समय में ‘समय’ से इतना आगे होना और चंद घंटों में जीवन को समेट लेना बेमिसाल है.


‘बाज़़ार’ उनको देखनी चाहिए, जो जिंदगी के हर कदम पर निर्णय लेने से डरते हैं. खतरे उठाने से डरते हैं. उनको देखनी चाहिए जो प्रेम करते हैं, लेकिन अभिव्यक्‍त करने का साहस नहीं जुटा पाते. उनको देखनी चाहिए, जो सपनों के पंख में लालच के पेंच लगा देते हैं, यह जानते हुए भी कि पंख में पेंच होने से उड़ान में मुश्किल होती है.


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उनको भी देखनी चाहिए, जो अपनी दुनिया बसाने में कई बार इतने मशगूल हो जाते हैं कि अपनों की ही दुनिया अनजाने में उजाड़ देते हैं. उसके बाद ताउम्र इसके ग़म में खुद को बर्बाद किए रहते हैं. तो जिंदगी के मायने आसान भाषा में समझाने के लिहाज से ‘बाज़़ार’ जीवन प्रबंधन का का बेहतरीन अध्‍याय है. यह इस बात को बेहतरीन तरीके से रेखांकित करती है कि जिंदगी एक प्री पेड सिम कार्ड है, जिसमें जितना आपने स्‍नेह, प्रेम का निवेश किया है, उतना ही समय, आपके खाते में क्रेडिट होगा. उससे अधिक ज़रा सा भी नहीं.


हम अक्‍सर सपनों के बारे में एकतरफा तरीके से सोचते हैं. जीवन को समग्रता में समझने की जगह खंड-खंड में सहेजने और सुलझाने में लगे रहते हैं. खुद को माफ करने के लिए एक से एक तरीके ईज़ाद करते रहते हैं, लेकिन दूसरों को हमेशा कठघरे में रखते हैं.


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‘बाजार’ ऐसे ही किस्‍सों से भरी दास्‍तां है. जहां हर किरदार की अपनी अलग कहानी, सपने हैं. हर कोई खुद में सिमटा हुआ, गगन को छूना चाहता है. बिना यह समझे कि इसका दूसरे की जिंदगी में क्‍या असर होगा.


ज़रा ध्‍यान से देखने पर हम पाएंगे कि हम भी तो यही कर रहे हैं. उसके बाद इस बहस में उलझें हैं कि जिंदगी दोज़ख (नरक) हुई जा रही है. दूसरों के हिस्‍से सुख का ब्रीफकेस है, जबकि हम दुखों की गठरी से लदे जा रहे हैं. जबकि गठरी में दुख भरने वाला कोई नहीं, सबसे अधिक हम खुद ही हैं. हमें ही अपनी हसरतों, अपनी ख्‍वाहिशों और जिंदगी के साथ तालमेल का हुनर नहीं मालूम. और कूसूरवार दूसरों को ठहराए जा रहे हैं.


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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)


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