नई दिल्ली: मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर (Sachin Tendulkar) के नाम क्रिकेट के सैकड़ों रिकॉर्ड हैं. अगर ऐसे में उनके रिकॉर्ड और खेल की सिर्फ दो खूबियां चुनने को कहा जाए तो वे क्या हो सकती हैं? इस पर एक राय हो पाना मुश्किल है. फिर भी कहा जा सकता है कि पहला तो उनका 100 शतकों का रिकॉर्ड होगा, जिसके आसपास आज भी कोई नहीं है. दूसरा, सचिन का कम उम्र में ही दुनिया के तमाम गेंदबाजों पर हावी होकर खेलना, जिसके कारण उनके प्रशंसकों ने उन्हें भगवान तक की संज्ञा दे दी. इत्तफाक से इन दोनों ही खूबियों का खूबसूरत रिश्ता 11 दिसंबर से जुड़ता है. जानिए कैसे?


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वो साल 1988 का दिसंबर महीना था, जब 15 साल के बालक से दिखने वाले खिलाड़ी को दिग्गजों से भरी मुंबई की रणजी टीम में शामिल किया गया. इस खिलाड़ी का नाम सचिन तेंदुलकर था. सचिन जो, एक साल पहले से ही अपने खेल से देशभर का ध्यान अपनी ओर खींच चुके थे, उन्हें पहली बार प्रथमश्रेणी मैच खेलने का मौका मिल रहा था. इस खिलाड़ी ने इस मौके को ऐसे लपका, जैसे वह उनका आखिरी मौका हो. 

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मुंबई-गुजरात का यह मैच 10 दिसंबर को मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में शुरू हुआ. पहले दिन गुजरात ने बैटिंग की और 140 रन बनाकर सिमट गई. मैच का दूसरा दिन यानी 11 दिसंबर, 15 साल के सचिन तेंदुलकर के नाम रहा, जो अपने पहले ही प्रथमश्रेणी मैच में 100 रन बनाकर नाबाद रहे. यह मैच ड्रॉ रहा और इसके साथ ही क्रिकेट को वो हीरा मिला, जिसकी चमक पूरी दुनिया ने देखी. 


सचिन तेंदुलकर के करियर में 16 साल बाद एक बार फिर 11 दिसंबर यादगार मौका लेकर आया. वह साल 2004 था और बांग्लादेश की टीम भारतीय टीम के सामने थी. सचिन के पहले प्रथमश्रेणी मैच की तरह भारत-बांग्लादेश टेस्ट भी 10 दिसंबर को शुरू हुआ. पहले दिन बांग्लादेश की टीम 184 रन बनाकर ढेर हो गई. फिर आया 11 दिसंबर. सचिन तेंदुलकर ने इस दिन 159 रन की नाबाद पारी खेली और सुनील गावस्कर (Sunil Gavaskar) के 34 टेस्ट शतकों के रिकॉर्ड की बराबरी कर ली. वे टेस्ट इतिहास के सिर्फ दूसरे ऐसे बल्लेबाज बने, जिसने 34 टेस्ट शतक लगाए हों. गावस्कर ने सचिन की इस उपलब्धि पर 34 शैंपेन की बॉटल गिफ्ट की थी. 

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इस तरह जब-जब सचिन तेंदुलकर की महानता का जिक्र छिड़ता है, तो वह बिना 11 दिसंबर को याद किए पूरा नहीं होता. वैसे इसी तारीख को सलीम दुर्रानी, सुभाष गुप्ते, टिम साउदी, सिल्वेस्टर क्लार्क, मार्क ग्रेटबैच, मरे गुडविन का जन्मदिन भी होता है. यानी, सिर्फ सचिन तेंदुलकर ही नहीं, ओवरऑल क्रिकेट के लिए यह तारीख बेहद खास है.