तो क्या PM की रेस में शामिल होने के लिए NDA से अलग होना चाहते हैं नीतीश कुमार?

बार-बार सीएम नीतीश कुमार भाजपा से 'थोड़ा हटके' अपनी राय जाहिर कर रहे हैं. सवाल उठने लगे हैं कि नीतीश के विपक्ष के साथ सुर मिलाने का मतलब क्या है? क्या नीतीश एनडीए से अलग कोई और विकल्प तो नहीं तलाश रहे? नीतीश के इस कदम के मायने क्या हैं.

Written by - Pratyush Khare | Last Updated : Aug 4, 2021, 10:37 PM IST
  • NDA से बाहर संभावनाएं तलाश रहे हैं नीतीश?
  • PM की रेस में शामिल होना चाहते हैं सुशासन बाबू?
तो क्या PM की रेस में शामिल होने के लिए NDA से अलग होना चाहते हैं नीतीश कुमार?

नई दिल्ली: संसद में पेगासस पर बवाल मचा है विपक्ष मामले की जांच कराने को लेकर केंद्र सरकार को घेर रहा है. बीजेपी विपक्ष के आरोपों को बेबुनियाद करार दे रही है, लेकिन बीजेपी के सहयोगी नीतीश कुमार ने भी मामले की जांच की मांग कर सबको हैरत में डाल दिया है.

पेगासस बहाना, कहीं और है निशाना?

नीतीश कुमार के पेगासस मामले की जांच की मांग को लेकर सियासी मायने निकाले जा रहे हैं. राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी नीतीश कुमार तेल और तेल की धार आजमाना चाहते है. दरअसल, 2020 में बिहार चुनाव में जेडीयू ने बड़े भाई की हैसियत खो दी है. केंद्र में भी बड़ी मुश्किल से जेडीयू कोटे से 1 मंत्री पद मिला, नीतीश भले ही मुख्यमंत्री हों लेकिन ये कचोट तो उन्हें है ही.

नीतीश कुमार अपनी उस पुरानी हैसियत को पाना चाहते हैं. हाल में विपक्ष एकजुटता की कवायद शुरू हुई तो नीतीश उसमें अपनी भूमिका तलाशना चाहते हैं. विपक्ष के मोर्चे में ममता बनर्जी के सामानांतर अपना स्कोप भी देख रहे हैं. नीतीश बीजेपी को ये बताना भी चाहते हैं कि जेडीयू भले ही संख्या बल में बीजेपी से पीछे हैं, लेकिन जेडीयू बीजेपी की सहयोगी है. बीजेपी की अनुयायी नहीं है बिहार में नीतीश के बिना बीजेपी कुछ नहीं.

चौटाला से मुलाकात, तीसरे मोर्चे की तैयारी?

पेगासस पर विपक्ष के सुर में सुर मिला रहे नीतीश कुमार की इंडियन नेशनल लोक दल के चीफ ओम प्रकाश चौटाला से मुलाकात को भी राजनीतिक चश्मे से देखा जा रहा है. ये मुलाकात ऐसे वक्त हुई है जब चौटाला तीसरे मोर्चे की पैरवी कर रहे हैं.

चौटाला मोदी सरकार को किसान विरोधी बता चुके हैं, उन्होंने कहा था कि आज की सबसे बड़ी आवश्यकता केंद्र की ‘जनविरोधी’ और ‘किसान विरोधी’ सरकार से मुक्ति पाने की है. भले ही जेडीयू इसे विशुद्ध रूप से आत्मीय भेंट बता रही हो, लेकिन ये मुलाकात ऐसे वक्त पर हुई जब जब ममता बनर्जी और एनसीपी नेता शरद पवार मोदी के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने में जुटे हैं.

चिराग ने BJP को किया नीतीश से सावधान

एलजेपी के पूर्व अध्यक्ष चिराग पासवान ने नीतीश के हालिया बयानों पर निशाना साधते हुए कहा कि वो 'संकेत' दे रहे हैं कि वो विपक्ष के साथ गठबंधन में प्रवेश करने की राह पर हैं. चिराग ने कहा कि "बिहार के नतीजे घोषित होने के ठीक एक दिन बाद मैंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी और उसमें बताया था कि बिहार में जल्द ही मध्यावधि चुनाव होंगे क्योंकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विपक्ष से हाथ मिलाएंगे और उनका चेहरा बनने की कोशिश करेंगे."

हर गुजरते दिन के साथ, नीतीश पेगासस, जनसंख्या नियंत्रण और अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दों पर सरकार की आलोचना करके इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.

उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश को बताया पीएम मैटेरियल

जदयू के राष्ट्रीय संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा ने नीतीश कुमार को पीएम मैटेरियल बताकर 2024 से पहले एक सियासी बहस छेड़ दी. कुशवाहा का कहना है कि आज भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं. लेकिन देश में कई पीएम मैटेरियल हैं, जिसमें एक बिहार के मुख्यमंत्री और जदयू के नेता नीतीश कुमार भी हैं.

इनकी लोकप्रियता देशभर में है. जिसके जवाब में बीजेपी नेता सम्राट चौधरी ने कहा कि अभी कोई वैकेंसी नहीं है अगर कोई ऐसा सोचता भी है तो उसको अगले 10 साल तक इंतजार करना होगा.

बिहार में जेडीयू-बीजेपी में खटपट

बिहार में बीजेपी और जेडीयू के बीच खटपट अब खुलकर सामने आने लगी है. बिहार के मंत्री और बीजेपी नेता सम्राट चौधरी कह रहे हैं कि हमारी गठबंधन सरकार है, यह हमारी स्वतंत्र सरकार नहीं है. बिहार में काम करना हमारे लिए बहुत चुनौतीपूर्ण है क्योंकि 4 विचारधाराएं एक साथ काम कर रही हैं. ऐसे में हमें बहुत कुछ सहना पड़ता है.

सम्राट चौधरी ने कहा कि 'हमने नीतीश कुमार को 43 सीटें जीतने के बाद भी सीएम के रूप में स्वीकार किया, 2000 में जब जेडीयू को महज 37 सीट मिली थी. तब भी उन्हें सीएम के रूप में स्वीकार किया गया था, ये बात जेडीयू को भूलनी नहीं चाहिए.'

वहीं जेडीयू के राष्ट्रीय संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा जवाब देते हैं कि बिहार में अगर आज चुनाव हो तो जनता दल यूनाइटेड सबसे बड़ी पार्टी की भूमिका में होगी. इससे एक बात तो साफ है कि जेडीयू को बिहार में बड़े भाई की भूमिका में बीजेपी को देखना अंदर ही अंदर साल रहा है.

जातीय जनगणना पर नीतीश का अलग रुख

नीतीश कुमार भले ही एनडीए में हों लेकिन कई मुद्दों पर उनका स्टैंड बीजेपी के खिलाफ होता है. जातीय जनगणना कराने की मांग को लेकर नीतीश और आरजेडी एक साथ आ गए हैं, जबकि केंद्र की मोदी सरकार जातिगत जनगणना कराने के लिए राजी नहीं है.

पिछले दिनों लोकसभा में एक सवाल पर केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने बताया था कि साल 2021 की जनगणना में केंद्र सरकार केवल अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए गणना कराएगी. नीतीश कहते हैं कि बिहार विधानमंडल ने सर्वसम्मति से जातिगत जनगणना के लिए प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजा था, केंद्र सरकार को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए.

योगी की जनसंख्या नियंत्रण नीति पर नीतीश का तंज

देश में जहां जनसंख्या नियंत्रण पर बहस तेज है, यूपी की योगी सरकार के जनंख्या नियंत्रण कानून के सख्त मसौदे को लेकर विपक्ष बीजेपी पर हमलावर है. वहीं नीतीश कुमार ने योगी सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि कुछ लोग सोचते हैं कि सिर्फ कानून बनाने से कुछ हो जाएगा, सबकी अपनी अपनी सोच है.

सिर्फ कानून बनाकर जनसंख्या पर नियंत्रण करना संभव नहीं है, जब महिलाएं शिक्षित होंगी तो अपने आप प्रजनन दर घटेगा. दरअसल, ये योगी सरकार की उस जनसंख्या नीति पर कटाक्ष है जिसमे दो से अधिक बच्चे वालों पर सख्त पाबंदियों का प्रावधान रखा गया है.

NRC, अनुच्छेद 370, तीन तलाक पर भी नीतीश की राय थी अलग

ऐसा नहीं है कि नीतीश कुमार का स्टैंड सिर्फ जातीय जनगणना और जनसंख्या नियंत्रण नीति पर बीजेपी के खिलाफ हो NRC और तीन तलाक पर भी नीतीश कुमार के सुर बीजेपी से अलग रहे हैं. 2019 को जब जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय कर दिया गया था.

तब नीतीश ने इसे हटाए जाने पर विरोध जताया था. लेकिन वोटिंग के दौरान दोनों सदन से वाकआउट कर जेडीयू के सांसदों ने एक प्रकार से मोदी सरकार का समर्थन भी किया था. तीन तलाक पर भी नीतीश ने कहा था कि ट्रिपल तलाक को जबरन किसी पर नहीं थोपा जाना चाहिए. नीतीश कह चुके हैं कि बिहार में नेशनल रजिस्टार ऑफ सिटीजंस यानी एनआरसी की जरूरत नहीं है.

नीतीश राजनीतिक विकल्प हमेशा खुले रखते हैं!

नीतीश कुमार को सत्ता पक्ष सुशासन बाबू कहता है तो विपक्ष पलटू राम बुलाता है दरअसल नीतीश कब पलटी मारेंगे कहना मुश्किल है बीजेपी और जेडीयू के 17 साल पुराने रिश्ते को 2013 में नीतीश कुमार ने एक झटके में खत्म कर दिया था.

भले जेडीयू ने इसकी वजह गठबंधन में सही तालमेल ना होने को बताया हो, लेकिन ये बात किसी से छिपी नहीं थी कि नीतीश नरेंद्र मोदी के बढ़ते कद से परेशान थे नरेंद्र मोदी को बीजेपी की राष्ट्रीय चुनाव प्रचार समिति का प्रमुख बनाए जाने के बाद जेडीयू ने बीजेपी से गठबंधन तोड़ लिया था.

2014 में नीतीश ने कहा था कि हम मिट्टी में मिल जाएंगे, लेकिन बीजेपी से भविष्य में गठबंधन नहीं करेंगे, अब वह चैप्टर खत्म हो चुका है. 2015 में नीतीश कुमार ने 20 साल बाद अपने धुर विरोधी लालू से हाथ मिलाया और महागठबंधन की सरकार बनाई, लेकिन 18 महीने में ही नीतीश बाबू ने लालू को बाय बाय बोल दिया और बीजेपी से रिश्ते के क्लोज चैप्टर को फिर से ओपन कर दिया और एनडीए में दोबारा शामिल हो गए.

नीतीश कुमार के सहयोगी हों या विरोधी सबको एक बात पता है कि नीतीश राजनीति के हर दांव पेंच की कला अच्छे से जानते है अपनी राजनीतिक हैसियत बरकरार रखने के लिए वो कभी भी किसी भी पाले में जा सकते हैं.

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