जानिए क्यों चिराग पासवान ने अकेले लड़ा चुनाव, क्या हुआ उन्हें फायदा और क्या थे उनके पास ऑप्शन

बिहार में चुनाव खत्म हो गए, सरकार भी बन गई लेकिन बिहार के चुनाव में एक सवाल का जवाब अब भी सब तलाश रहे हैं कि आखिर चिराग पासवान ने अकेले लड़ने का फैसला क्यों किया. आखिर क्यों चिराग पासवान ने सब कुछ दांव पर लगाकर बिहार में अकेले दम पर चुनाव लड़ने का फैसला किया.

जानिए क्यों चिराग पासवान ने अकेले लड़ा चुनाव, क्या हुआ उन्हें फायदा और क्या थे उनके पास ऑप्शन

नई दिल्ली/आशिफ एकबाल: बिहार में चुनाव खत्म हो गए, सरकार भी बन गई लेकिन बिहार के चुनाव में एक सवाल का जवाब अब भी सब तलाश रहे हैं कि आखिर चिराग पासवान ने अकेले लड़ने का फैसला क्यों किया. आखिर क्यों चिराग पासवान ने सब कुछ दांव पर लगाकर बिहार में अकेले दम पर चुनाव लड़ने का फैसला किया. क्योंकि पूरे बिहार में चुनाव में "चिराग पासवान" का नाम हर के जुबान पर चढ़ा है. 

तो इस सवाल का तलाशने के लिए आपको थोड़ा पीछे चलना पड़ेगा. बात उस वक्त है कि जब एनडीए में सीटों का बंटवारा हो रहा था और लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) को महज़ 15 सीटें दी जा रही थी. बात 15 सीटों की नहीं थी. जमीनी हकीकत पर बिछी सियासी बिसात को देखें तो स्वर्गीय रामविसाल पासवान की LJP को 15 सीटों देने के पीछे की रणनीति समझ से परे थी. क्योंकि बिहार में लोकजनशक्ति पार्टी के 6 एमपी और राज्यसभा एमपी है. इस लिहाज से अगर एलजेपी को 15 सीटों का ऑफर किसी भी सूरत में सही नहीं था और इसके पीछे नीतीश कुमार की ज़िद थी कि LJP को सिर्फ 15 सीटें दी जाएं. 

अब चिराग पासवान के सामने तीन ऑपशन थे. चिराग या तो 15 सीटों पर मान जाए और महागठबंधन के साथ जाए या फिर अकेले चुनाव लड़ें. ऐसे में चिराग पासवान ने अपनी दम पर चुनाव लड़ने का फैसला किया. हार जीत की अगर बात छोड़ दी जाए तो पूरे बिहार चुनाव चिराग पासवान ने अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई है. लोक जन शक्ति पार्टी को एक सीट का नुकसान जरूर हुआ है लेकिन 24 लाख वोट यानि करीब 6 प्रतिशत वोट लाकर दूसरी पार्टियों का आगाह भी कर दिया है कि सत्ता में रहना है तो लोजपा को साथ रखना होगा. 

बात अगर जीतमन राम मांझी की हम और वीआईपी की करें तो हम और पीआईपी को जिस तरह से सीटें दी गई उतनी सीटों की दोनों ही पार्टियां हकदार नहीं थी. क्योंकि बिहार के कैनवास में लोक जनशक्ति पार्टी के सामने इन दोनों ही पार्टियों का वजूद नहीं टिकता है लेकिन नीतीश कुमार की ज़िद की आगे चिराग पासवान को अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया और नीतीश कुमार को अपने दम पर करारी शिकस्त भी दी. नीतीश कुमार के सीएम बनने से ज्यादा बिहार की गलियों में ये चर्चा है कि अकेले चिराग ने नीतीश कुमार की सियासत को बहुत हद तक कमज़ोर कर दिया है और नीतीश कुमार को 42 सीटों पर औंधे मुंह गिरना पड़ा है.

अगर नतीजों पर गौर करें तो बिहार में बेहद कम फर्क से सरकार बनी हैं या ये कहें कि अगर हम और VIP ना होती तो शायद नीतीश कुमार बिहार की सियासत में पूर्व हो जाते. यही वजह है कि सियासी पंडित कह रहे हैं कि सरकार तो बन गई है लेकिन 5 साल चलेगी या नहीं इसके बारे में कहना बेहद मुश्किल है. बात अगर चिराग पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी की करें तो चिराग ने सीधे तौर पर नीतीश कुमार से 36 सीटें छीनीं हैं. यही वजह है कि अकेले चिराग पासवान ने नीतीश कुमार की हसरतों पर पानी फेर दिया. एलजेपी ने बीजेपी के संज्ञान में 6 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे. अगर एलजेपी बीजेपी के खिलाफ भी अपने और उम्मीदवार उतारती तो भाजपा के हिस्से भी 73 सीटें नहीं आती. मतलब एलजेपी बीजेपी को भी नुकसान पहुंचा सकती थी लेकिन चिराग पासवान ने ऐसा नहीं किया. यही वजह है कि चिराग से सीधे तौर पर नीतीश कुमार को नुकसान और बीजेपी को बहुत फायदा हुआ है. 

नीतीश कुमार बिहार की सियासत से लोक जन शक्ति पार्टी को भस्म करने की ख्वाहिश में अपने घर में आग लगा बैठे हैं और चिराग पासवान ने नीतीश कुमार का पूरा सियासी गणित बिगाड़ दिया. सियासी के सूरमाओं का मानना है कि लोजपा के इस दांव से नीतीश कुमार के सीएम बनने के बावजूद उनकी राजनैतिक ज़मीन कमजोर हो गई है. इस पूरी तस्वीर को देखने सियासत के जानकार कहते हैं कि आने वाले चुनाव में लोपजा जिस पार्टी के साथ रहेगी उसकी ही बिहार में सरकार बनेंगी. 

मतलब साफ है बिहार में सरकार बनाने के लिए लोजपा को गठबंधन का हिस्सा किसी भी पार्टी को बनाना ही पड़ेगा और लोजपा के संस्थापक रामविलास पासवान हमेशा कहते रहे हैं कि लोजपा को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है.