#MeToo: 'मंत्री और पूर्व संपादक एमजे अकबर ने मेरा यौन उत्‍पीड़न किया'

गजाला ने लिखा: अकबर की निगाहें मुझ पर पड़ीं और मेरे दुस्‍वप्‍न शुरू हो गए. मेरे डेस्‍क को उनके केबिन के बाहर इस तरह शिफ्ट किया गया कि जैसे ही उनका केबिन जरा सा भी खुलता तो उनकी नजर सीधे मुझ पर पड़ती. वे वहां बैठकर मुझे लगातार घूरते रहते.

#MeToo: 'मंत्री और पूर्व संपादक एमजे अकबर ने मेरा यौन उत्‍पीड़न किया'
केंद्रीय विदेश राज्‍य मंत्री एमजे अकबर पूर्व में मशहूर संपादक रहे हैं.(फाइल फोटो)

मीटू अभियान के तहत केंद्रीय विदेश राज्‍य मंत्री और पूर्व संपादक एमजे अकबर के खिलाफ कई महिलाओं ने यौन उत्‍पीड़न के आरोप सार्वजनिक रूप से लगाए हैं. इस बीच एक अन्‍य पत्रकार गजाला वहाब ने एमजे अकबर के खिलाफ अपने खौफनाक अनुभवों को अंग्रेजी वेबसाइट द वायर पर शेयर किया है. अपनी कहानी को बताते हुए गजाला ने कहा है कि एशियन एज अखबार में काम करने के दौरान जब एमजे अकबर की निगाहें उन पर पड़ीं तो वहां उनके नौकरी के अंतिम छह महीने नरक से भी बदतर रहे.

गजाला वहाब इस वक्‍त FORCE न्‍यूजमैगजीन की एक्‍जीक्‍यूटिव एडीटर हैं. इसके साथ ही 'ड्रैगन ऑन योर डोस्‍टेप: मैनेजिंग चाइना थ्रू मिलिट्री पावर' पुस्‍तक की सह-लेखिका हैं. गजाला वहाब ने जो अपनी स्‍टोरी साझा की है, उसके संपादित अंश हम यहां, 'उन्‍हीं की कहानी, उन्‍हीं की जुबानी' अंदाज में पेश कर रहे हैं:

गजाला वहाब की स्‍टोरी
1989 में जब मैं स्‍कूल में थी तो पिता ने अकबर की लिखी किताब Riot After Riot पढ़ने को दी. मैं वह किताब दो दिनों में ही पढ़ गई. उसके बाद उनकी कई अन्‍य किताबें पढ़ने के बाद वह मेरे नए पसंदीदा लेखक बन गए. हालांकि जब मैं ककहरा भी नहीं जानती थी, तभी मैंने पत्रकार बनने का निश्‍चय किया था, उस कड़ी में अकबर की किताबें पढ़ने के बाद ये इच्‍छा जुनून में तब्‍दील हो गई. लिहाजा मैंने स्‍कूल में पढ़ाई के बाद पत्रकारिता में डिग्री ली. उसके बाद 1994 में द एशियन एज के दिल्‍ली ऑफिस में जॉब के लिए ये सोच कर पहुंची कि नियति मुझे यहां खींचकर लाई है ताकि सर्वश्रेष्‍ठ व्‍यक्ति से इस बिजनेस के बारे में सीखने का मौका मिलेगा.

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लेकिन वहां पहुंचकर सबसे पहले मेरा भ्रम टूटा. उनको मैंने ऑफिस में चिल्‍लाते हुए और ड्रिंक करते देखा. इस संदर्भ में एक वरिष्‍ठ सहयोगी ने ताना भी मारा कि तुम अभी छोटे शहर से आई हो. सो अपने छोटे शहर की मानसिकता के साथ मैंने वहां के ऑफिस कल्‍चर को स्‍वीकार किया. मैंने अकबर को युवा सब-एडीटरों से फ्लर्ट, भद्दे मजाक और खुलेआम पक्षपात करते देखा. मैंने सुना कि लोग दिल्‍ली के एशियन एज ऑफिस को अकबर का हरम कहते थे. वहां लड़कों की तुलना में युवा लड़कियों की संख्‍या काफी ज्‍यादा थी. ऑफिस गॉसिप के दौरान मैंने अक्‍सर एशियन एज के विभिन्‍न रीजनल दफ्तरों में उनके अफेयर्स के बारे में सुना. मैंने इसको अपने ऑफिस कल्‍चर का हिस्‍सा माना. मैं चूंकि उनकी परिधि से दूर थी, इसलिए अप्रभावित रही.

लेकिन अपनी नौकरी के तीसरे साल इस ऑफिस कल्‍चर ने मुझे प्रभावित किया. अकबर की निगाहें मुझ पर पड़ीं और मेरे दुस्‍वप्‍न शुरू हो गए. मेरे डेस्‍क को उनके केबिन के बाहर इस तरह शिफ्ट किया गया कि जैसे ही उनका केबिन जरा सा भी खुलता तो उनकी नजर सीधे मुझ पर पड़ती. वे वहां बैठकर मुझे लगातार घूरते रहते. ऑफिस के इंट्रानेट नेटवर्क से अश्‍लील संदेश भेजते.

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उसके बाद वह मुझे अपने केबिन में बुलाने लगे (जिसका दरवाजा वह हमेशा अंदर से बंद कर देते). शुरुआत में वह जो बातचीत करते वे व्‍यक्तिगत स्‍तर की थीं. मसलन पारिवारिक पृष्‍ठभूमि के बारे में पूछते और कहते कि घर से बाहर दिल्‍ली में अकेले मैं कैसे रह रही हूं. कभी-कभार जब वे संभवतया अपने साप्‍ताहिक कॉलम को लिख रहे होते तो मुझे अपने सामने बैठने को कहते. उसके पीछे तर्क यह था कि यदि उनको शब्‍दकोश में से किसी शब्‍द को खोजना हो तो केबिन के कोने में ट्राइपोड पर सबसे नीचे रखी डिक्‍शनरी में से उसे खोजूं. वे मुझे वहां जाकर डिक्‍शनरी देखने को कहते.

ये डिक्‍शनरी इतने नीचे रखी होती थी कि उसके लिए पूरा नीचे तक झुकना पड़ता था. उस सूरत में पूरा पीछे का हिस्‍सा अकबर की तरफ होता था. 1997 में ऐसे ही एक मौके पर जब डिक्‍शनरी में कुछ खोज रही थी तो वे चुपके से आकर मेरे पीछे खड़े हो गए और कमर को पकड़ लिया. मैं भय के मारे कांपते हुए संभलने का प्रयास करने लगी. इस दौरान उनके हाथ मेरे स्‍तनों से नितंबों तक गए. मैंने उनके हाथ को हटाने का प्रयास किया लेकिन उन्‍होंने कसकर पकड़ लिया था और अपने अंगूठों से मेरे स्‍तनों को रगड़ रहे थे. उस दौरान दरवाजा अंदर से न केवल बंद था, बल्कि ब्‍लॉक था. आतंक के उन क्षणों में मेरे दिमाग में सभी तरह के विचार आकर चले गए. आखिरकार उन्‍होंने मुझे छोड़ दिया. लेकिन इस दौरान उनकी मुस्‍कान में किंचित मात्र भी कमी नहीं आई. मैं केबिन से निकलकर टॉयलेट में गई और वहां रोने लगी...लेकिन ये तो शुरुआत भर थी.

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उसके अगली शाम फिर उन्‍होंने अपने केबिन में बुलाया. मैं जैसे ही अंदर घुसी तो देखा कि वे दरवाजे के निकट ही खड़े थे. इससे पहले कि कुछ समझ पाती कि उन्‍होंने पकड़ लिया और चूमने का प्रयास किया. मैं उनसे बचने का प्रयास करती रही. इस बीच उन्‍होंने मुझे जाने दिया. मैं रोते हुए बाहर भागी. ऑफिस के बाहर एक कोने में एकांत पाकर मैं वहां बैठ गई और रोने लगी.

उस वक्‍त पूरा मेरा जीवन मेरे सामने घूम रहा था. मैं अपने परिवार की पहली सदस्‍य थी जो अपने पैतृक शहर आगरा छोड़कर दिल्‍ली में नौकरी करने आई थी. पिछले तीन वर्षों की नौकरी के दौरान दिल्‍ली में रहने और काम करने के लिए कई मोर्चों पर संघर्ष किया था. इससे पहले मेरे परिवार की महिलाएं पढ़ने के बाद नौकरी नहीं करती थीं. हमारे जैसे छोटे शहर की बिजनेस फैमिलीज की लड़कियों की अरेंज मैरिज कर दी जाती थी. मैं इस पितृसत्‍तात्‍मकता से लड़कर आई थी. मैंने अपने पिता से पैसे लेने से भी इनकार कर दिया था क्‍योंकि मैं खुद अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी. मैं एक सफल और सम्‍मानित पत्रकार बनना चाहती थी.

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इसके अतिरिक्‍त गजाला वहाब ने अपनी स्‍टोरी में और भी कई सारी बातें बताई हैं. इसमें इस बात का भी जिक्र किया है कि उस दौर में किसने उनकी मदद की और किसने नहीं की. बहरहाल इस तरह की यातना सहने के बाद उन्‍होंने नौकरी छोड़ने का मन बना लिया. उनको रोकने की कोशिशें की गईं लेकिन आखिरकार उन्‍होंने नौकरी छोड़ दी. वह दुखी होकर अपने घर गईं और परिजनों को कहानी बताई. पिता ने पूरी बात सुनने के बाद कहा, 'जाओ दूसरी नौकरी खोज लो'. उनका इतना कहना था कि वह फूट-फूटकर रोने लगीं. इसके साथ ही गजाला ने लिखा है कि 21 साल गुजरने के बाद वे इन घटनाओं को पीछे छोड़ आई हैं. उन्‍होंने संकल्‍प लिया था कि वह पीडि़त नहीं बनेंगी और न ही किसी को यह मौका देंगी कि वह उनका करियर बर्बाद कर सके.

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