मोदी-शी बैठकः भू-राजनैतिक परिस्थितियों का दबाव

दो शीर्ष नेताओं की अनौपचारिक मुलाकात से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि इसमें कोई समझौता होगा, लेकिन इससे ऐसे माहौल के निर्माण की उम्मीद की जा सकती है जिससे दोनों देशों के रिश्ते सुधारने में मदद मिल सके. 

मोदी-शी बैठकः भू-राजनैतिक परिस्थितियों का दबाव

आगामी जून महीने में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चीन जाना था, लेकिन उसके पहले अप्रैल माह में ही वे राष्ट्रपति शी जिनपिंग से अनौपचारिक मुलाकात के लिए वुहान पहुंच गए. यह मुलाकात जून में भी हो सकती थी, लेकिन ऐसी कौन-सी बात थी, जो दोनों देशों को बातचीत के लिए व्यग्र कर दिया? डोकलाम तनाव के दौरान भारत के खिलाफ आग उगलने वाले चीन के सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने दोनों नेताओं की मुलाकात को काफी अहमियत प्रदान की है. राष्ट्रपति शी के करीबी उपराष्ट्रपति वांग किशन को वार्ता प्रक्रिया में शामिल किया जाना चीन की गंभीरता को प्रदर्शित करता है. डोकलाम विवाद की पृष्ठभूमि में यह मुलाकात हुई है, जिसने दोनों देशों के संबंधों में निर्णायक बदलाव ला दिया है. चीनी नेता देंग शियाओ पिंग से 1988 में राजीव गांधी की मुलाकात भी सीमा विवाद के बाद ही हुई थी. वार्ता पर उसकी छाया को नकारा नहीं जा सकता, पर विभिन्न क्षेत्रों में दोनों देशों के आपसी रिश्ते अस्सी के दशक से बेहतर हैं.

दरअसल, बदलता वैश्विक परिदृश्य दोनों नेताओं को एक दूसरे के निकट जाने के लिए प्रेरित कर रहा है. एक बार फिर शीत युद्ध की वापसी हो चुकी है. ऐसी हालत में दोनों देशों को अपनी स्थिति के आकलन की जरूरत है, खासकर उस स्थिति में जब दोनों देशों के रिश्तों में कुछ समस्याएं हैं. सूचना के अभाव में गलतफहमी पैदा हो सकती है, हालांकि चीन पश्चिमी उकसावे को भी इसके लिए जिम्मेदार मानता रहा है. ध्यान देने की बात है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्यापार और प्रशांत क्षेत्र में चीन के वर्चस्व के मसले पर चुनौती देने की मंशा प्रकट कर दी है, जिसके साथ हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक

साझेदारी बढ़ रही है. वैश्विक शक्ति बनने की महत्वाकांक्षा रखने वाले चीन पर इस बात का दबाव है कि वह क्षेत्र के देशों को समायोजित करे, ताकि उनकी अमेरिका से दूरी बढ़े. ऐसा प्रतीत होता है कि वुहान सम्मेलन के लिए पहल चीन की तरफ से की गई थी, जिस पर भारत ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दिखाई. प्रधानमंत्री मोदी की चीन यात्रा से पहले दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारियों और मंत्रियों के बीच वार्ता चल रही थी. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच भी ऐसी मुलाकात हुई थी. इसके बावजूद दोनों देशों के रिश्तों में गुणात्मक बदलाव नहीं आया. इसलिए यह सवाल उठना लाजिमी है कि इस मुलाकात से दोनों देश आपसी रिश्ते सुधारने की दिशा में क्या हासिल कर सकते हैं? क्या उनकी नीति में मूलभूत बदलाव आ जाएगा?

दो शीर्ष नेताओं की अनौपचारिक मुलाकात से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि इसमें कोई समझौता होगा, लेकिन इससे ऐसे माहौल के निर्माण की उम्मीद की जा सकती है जिससे दोनों देशों के रिश्ते सुधारने में मदद मिल सके. मुलाकात के बाद यह बात सामने आई है कि दोनों देश सीमा पर शांति एवं स्थिरता बनाए रखेंगे. इसके तहत वे अपने देश की सेना को निर्देशित करेंगे कि वे आपस में संवाद मजबूत करें. सीमा विवाद सुलझाने पर प्रतिबद्धता जताई गई. स्पष्ट है कि दोनों देश नहीं चाहते कि डोकलाम जैसी अप्रिय स्थिति पैदा हो. गर्मी के दिनों में बर्फ पिघलने पर सेना की गतिशीलता बढ़ना स्वाभाविक है. इसलिए किसी संभावित खतरे को टालना उचित ही था.

इसी तरह दोनों देश संतुलित तरीके से द्विपक्षीय व्यापार को आगे बढ़ाएंगे. अभी व्यापार संतुलन चीन के पक्ष में है. भारत चाहेगा कि उसका निर्यात चीन को बढ़े. ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति पर चलने वाले डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के संरक्षणवादी कदम से अगर भारतीय निर्यात में किसी तरह का अवरोध उत्पन्न हुआ, तो चीन उसके लिए एक वैकल्पिक बाजार हो सकता है. इसी तरह अमेरिका से व्यापार युद्ध छिड़ने के मद्देनजर चीन को भारतीय बाजार की जरूरत बढ़ जाएगी. वैश्विक राजनीति का यह अंतर्विरोध भारत के हित में है.

वह दोनों देशों से अपने हितों को साधने के लिए सौदेबाजी की बेहतर स्थिति में होगा. बस कूटनीतिक दांव संभल कर चलना होगा.सुरक्षा के लिहाज से आतंकवाद पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए दोनों देश आपस में सहयोग बढ़ाएंगे. लेकिन भारत के विदेश सचिव विजय गोखले के कथन पर विश्वास किया जाए, तो दोनों नेता विशेष मसलों पर चर्चा नहीं किए. दो शिखर नेताओं के बीच चर्चा में ऐसा होना स्वाभाविक है. लेकिन जिस समय यह मसला उठेगा, उस समय दोनों देशों के रिश्तों की भावी दशा-दिशा स्पष्ट हो जाएगी. अगर चीन ने मसूद अजहर के मसले पर भारत के दृष्टिकोण का समर्थन किया, तो दोनों देशों में परस्पर विश्वास भाव पैदा होगा. लेकिन इससे उसका मित्र पाकिस्तान नाराज हो जाएगा. अपने राष्ट्रीय हितों के लिए कोई भी देश ऐसा कदम उठा सकता है.

ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वह ऐसा करेगा? वैसे तो यह मुद्दा बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति बनने की महत्वाकांक्षा रखने वाले चीन की नीयत की परीक्षा करने के लिए काफी है. अगर वह इस मसले पर भारत का साथ नहीं देगा, तो विश्व जनमत यही मानेगा कि चीन आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में ईमानदार नहीं है.

इस मुलाकात की खास बात वह सहमति रही, जिसके तहत युद्धग्रस्त अफगानिस्तान में दोनों देश संयुक्त रूप से आर्थिक परियोजना को बढ़ावा देंगे. हालांकि आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन सामरिक महत्व के इस फैसले के दूरगामी आयाम होंगे. कहा जा सकता है कि दोनों देश अफगानिस्तान में एक दूसरे की उपस्थिति को स्वीकार करते हैं. अफगान मामले में भारत की भागीदारी को पाकिस्तान पसंद नहीं करता. लेकिन सवाल उठता है कि क्या यह सब चीन, पाकिस्तान को नाराज करके करेगा? फिर इस पर अमेरिका की क्या प्रतिक्रिया होगी, जहाँ उसके प्रभाव को चीन घटाना चाहता है?

यह सोचना बेमानी होगा कि चीन और भारत आपसी संबंध सुधारने के लिए किसी तीसरे देश के साथ अपने रिश्ते खराब करना चाहेंगे. न तो चीन, पाकिस्तान के साथ अपने रिश्तों में किसी प्रकार की गिरावट लाना चाहेगा और न ही भारत, अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ. भारत कुछ वैसी ही नीति

अपनाना चाहेगा, जैसा उसने इजरायल और फिलीस्तीन के संदर्भ में किया है, जब उसने दोनों देशों के रिश्तों को एक दूसरे से जोड़ कर देखने की प्रवृत्ति से मुक्ति पाने की कोशिश की है. कुछ विश्लेषक मोदी-शी वार्ता को 1988 में राजीव गांधी और देंग शियाओ पिंग के बीच संपन्न वार्ता की तरह दूरगामी महत्व का बता रहे हैं. लेकिन भारत-चीन के संबंध वैश्विक राजनीति की धारा को तभी बदल सकते हैं, बशर्ते चीन की भारत नीति समावेशी और सम्मान पर आधारित हो. राजीव गांधी और देंग ने भारत-चीन रिश्तों को जो नई दिशा प्रदान की थी, उसे नरसिंह राव के शासन काल में गति प्रदान की गई थी.

इसके बावजूद दोनों देशों के संबंध सुधार में बाधक सीमा समस्या सुलझ नहीं पाई है. तिब्बत और कश्मीर ने इसे और जटिल बना दिया है. उल्टे चीन की विस्तारवादी महत्वाकांक्षा ने वैश्विक समुदाय के समक्ष एक नई चुनौती पैदा कर दी है. बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव और भारत की घेरेबंदी इसी का उदाहरण है. भारत इस स्थिति में नहीं है कि वह चीन को रियायत दे सके. इसलिए एक बैठक के आधार पर किसी निर्णायक प्रगति की उम्मीद करना बेमानी है. नई बात यह है कि वार्ता की पहल नौकरशाही के हाथ से निकल कर नेताओं के हाथ में आ चुकी है. अगर इनमें कोई बात आगे बढ़ती है, उसके पक्ष में जनमत तैयार करने की भी जरूरत होगी.

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