सामाजिक संघर्ष का हल धर्म में है कि राजनीति में- एक सवाल

संघर्ष रहेगा तो मानव समाज की समस्याएं भी यथावत ही रहेंगी क्योंकि जाति, प्रजाति की आर्थिक-राजनैतिक-सामाजिक आधार पर वंचना हमेशा तनाव पैदा करती रहेगी. फिर सवाल उठता है कि मानव समाज की इन समस्याओं का हल क्या हो सकता है. 

सामाजिक संघर्ष का हल धर्म में है कि राजनीति में- एक सवाल

अलबर्ट आइंस्टीन ने 30 जुलाई 1932 को दुनिया के विख्यात मनोवैज्ञानिक सिग्मंड फ्रायड (Sigmund Freud) को एक पत्र लिखा और पूछा कि प्रोफेसर फ्रायड ये बताएं, ' क्या कोई ऐसा रास्ता है जो मानवता को संघर्ष के खतरे से बचा सके, आपसी द्वंद से बचा सके?' आइंस्टीन ने अपने सवाल को विस्तार देते हुए कहा कि सत्ता प्राप्ति की चाहत रखने वाले दूसरे समूहों की गविविधियों के सहारे जीने की आदत रखते है, जिनकी महत्वकांक्षा पूरी तरह से लोभ और आर्थिक फायदों पर टिकी होती है. अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए ये इंसान के अंदर नफरत और विनाश की छिपी हुई इच्छा को इस हद तक बढ़ा देते है कि वह वंचित समूह की सामूहिक ताकत बन जाए फिर इसका अंतिम परिणाम नफरत के चलते सामूहिक विनाशही क्यों न हो.

सबसे अहत बात है कि नफरत और हिंसा के विचारों को फैलाने में सबसे आगे बौद्धिक विचारों के लोग होते है क्योंकि बौद्धिक समाज के लोग आम लोगों के जनजीवन से कोई सीधा जुड़ाव नहीं रखते और न ही वे उसकी तरह सामाजिक समस्याओं जैसे गरीबी, असमानता का सामना करते है. ये बौद्विक लोग आम लोगों की समस्याओं का कृत्रिम हल देते है जो कागजी तौर पर ही केवल तार्किक होता है. ऐसे में दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ऐसे उपायों एंव साधनों की खोज की जाय जो मानवीय समस्याओं को दूर करे और संघर्ष को असंभव बना दे.

यह भी पढ़ेंः सोशल मीडिया कुप्रचार पर नकेल-प्रशासनिक चुनौती

इस पर फ्रायड ने जवाब दिया था  'युद्ध, संघर्ष निश्चित तौर पर तभी रोका जा सकता है जब मानव जाति एक होकर ऐसी केन्द्रीय संस्था का गठन करे जिसे यह अधिकार दिया जाए कि वह सभी प्रकार के हितों के संघर्ष मे निर्णय करेगी. लेकिन ऐसी संस्था के जन्म के पहले हमें एक भयानक गृहयुद्ध से गुजरना पड़ेगा.'

देखा जाये तो दूसरे विश्वयुद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ का जन्म कुछ ऐसे ही हालातों में हुआ लेकिन दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अनवरत चल रहे अलगाववाद, उग्रवाद, धार्मिक आंतकवाद, राजनैतिक सत्ता पलट के संघर्षो के बाद ये सवाल अभी भी कायम है कि आखिरकार मानवीय समाज की समस्याएं खत्म होंगी कि नहीं, युद्व व सामाजिक संघर्ष रुकेंगे अथवा नहीं और क्या सही में ऐसी कोई केन्द्रीय सत्ता धारित संगठन अस्तित्व में आ पायेगा जो हितों के संघर्ष में निर्णयन की सक्षम क्षमता रखे.

संयुक्त राष्ट्र को लेकर तो तीसरी दुनिया के देश अक्सर भेदभाव का आरोप लगाते रहे है. विचारधारा के तौर पर देखा जाये तो आश्चर्य की बात यह है कि आज के दौर में कोई ऐसा विचार मौजूद नहीं है जिससे यह उम्मीद की जा सके कि वह एकीकृत सत्ता जैसी किसी चीज को तैयार कर पायेगा. साम्यवादी विचारधारा और इस्लामिक ब्रदरहुड जैसी विचारधाराएं भी आपसी संघर्ष के चलते ऐसे विचार के निर्माण में असफल साबित हो चुकी है और अन्तराष्ट्रीय स्तर पर अन्तर्विरोध का सामना कर रही है. अफ्रीका और मध्य एशिया में छिड़ा हुआ संघर्ष इसका उदाहरण है.

यह भी पढ़ेंः कैसे स्थापित होगा राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र!

लेकिन इन सबसे इतर इस बात की भी क्या गांरटी है कि यदि केन्द्रीकृत सत्ता पनप भी जाये तो इस केन्द्रीकृत सत्ता में भी हिस्सेदारी पाने के लिए संघर्ष नहीं होगा. अगर ऐसा होता है तो यह एक नये संघर्ष को जन्म देगा. संघर्ष रहेगा तो मानव समाज की समस्याएं भी यथावत ही रहेंगी क्योंकि जाति, प्रजाति की आर्थिक-राजनैतिक-सामाजिक आधार पर वंचना हमेशा तनाव पैदा करती रहेगी. फिर सवाल उठता है कि मानव समाज की इन समस्याओं का हल क्या हो सकता है. दुनिया में सभ्यता के प्रारम्भ से धर्म और फ्रांस की क्रांति के बाद से लोकतांत्रिक राजनैतिक प्रक्रिया द्वारा मानवीय समाज की समस्याओं, विभिन्न समूहों, वर्गों के बीच के मतभेदों का हल ढूंढा जा रहा है लेकिन क्या धर्म और राजनीति सही में मानवीय समस्यओं को उचित हल देकर विभिन्न समूहों के बीच संघर्ष को रोक सकते है.

राजनीति का एक नकरात्मक पहलू यह है कि वंचित समाज के दिमाग में यह बात डाल देती है कि उनकी जो खराब स्थिति है, उसका जिम्मेदार वे किसी भी हद तक नहीं है, बल्कि उसकी पूरी जिम्मेदारी समाज, दूसरे वर्गो, समूहों, व्यवस्था एंव परंपरा के कारण है और वंचित समूह का समाज, इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र तभी बदलेगा जब सब कुछ वंचित समूह के पक्ष में बदल जाये. राजनीति इस इच्छा को ही मंच देती है और पूर्वाग्रह से ग्रसित एक ऐसे व्यक्तित्व को जन्म देती है जिसे अपने वर्ग एंव समूहों के अलावा हर दूसरा वर्ग अपना विरोधी नजर आता है.

विचारकों में एक बहुत बड़ी गलतफहमी है कि धर्म राजनीति को दूषित कर देता है लेकिन यथार्थ देखा जाये तो यह एकदम उलट है. धर्म में जब तक सत्त प्राप्ति का संघर्ष नहीं जुड़ता धर्म व्यक्ति के कल्याण एवं एकजुटता पर ही आधारित होता है. धर्म के साथ एक सबसे बड़ा सार्थक पहलू यह है कि यह सामाजिक नियंत्रण हेतु व्यक्ति के स्वंय की जिम्मेदारी तय करता है और व्यक्ति को लगता है कि समाज में यदि कुछ गलत है तो उसमें उसकी व्यक्तिगत जिम्मेवारी भी है और वह व्यक्तिगत सुधार के द्वारा सामाजिक सुधार के लक्ष्य को पूरा करता है. चूंकि संगठन के रुप में चलने वाला घर्म भी धार्मिक और राजनैतिक सत्ता की प्राप्ति के षडयंत्रों को झेलता है इसलिए धर्म भी अपनी नैतिकता और शुचिता को खो देता है और राजनैतिक चालों का अखाड़ा बन जाता है.

राजनीति करने वाले फिर धर्म को आवश्यकतानुसार अपने फायदे को ध्यान में रखते हुए व्याख्या कर परोसते है.............कल्पना कीजिये एक ऐसे समाज की जहां समानता, स्वतंत्रता न्याय से संबंधित कोई सामाजिक समस्या न हो, वैसे ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि मनुश्य का स्वभाव भी अन्य जानवरों की तरह कमजोरों पर आक्रमक रहकर जीने का है. फिर भी शायद ऐसा कोई समाज होगा जहां कोई सामाजिक समस्या नहीं हो तो आप पायेंगे कि उस समाज में.राजनीति जीवित नहीं रह सकती,. इसलिए इस भ्रम को दूर कर लेना बहुत जरुरी है कि राजनीति सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए की जाती है लेकिन गहरायी से देखे तो राजनीति केवल सामाजिक समस्याओं के स्वरुप को बदल देती है. हो सकता है कि पहले कोई वर्ग सामाजिक समस्या से पीड़ित हो लेकिन ऐसी नीति लायी जाये कि अब पहले वाला वर्ग तो समस्या से बच जाये लेकिन दूसरे वर्ग की ओर समस्या को मोड़ दिया जाय. ये बिल्कुल उसी तरह है जैसे एक भूखे आदमी की भूख मिटाने के लिए दूसरे आदमी की रोटी छीनकर दे दी जाय. ये हालात और भी विकृत तब और हो जायेंगे जब पहले के पास रोटियां बढ़ती चली जाय और दूसरे के पास कम होती चली जाये फिर वह संघर्ष करेगा.

कहा जाता है कि भारत भूमि संकट में है, लेकिन यदि गौर किया जाये कि 1947 से पहले लाहौर में संकट होता तो क्या आम भारतीय कराची के लिए दुख नहीं मनाते, जरुर मनाते...........लेकिन अब कराची में संकट होगा तो शायद नहीं मनायेंगे क्योंकि उनके दिमाग में 1947 का बंटवारा है.............और यही राजनीति है. राजनीति परिवार, जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा को तोड़कर की जाती है तो वह केवल एक नकरात्मक राजनीति होती है लेकिन जब समाज के एकीकरण, मनुष्यता की रक्षा के लिए राजनीति होती है तो वह धर्म बन जाती है. राजनीति एंव धर्म के बीच की दूरियां समाप्त हो जाती है. वह स्थिति जब राजनीति और धर्म आपस में मिल जाते है, सामाजिक विकास और शांति के लिए एक आदर्श स्थिति है लेकिन यह क्षणिक है क्योंकि मानव का सत्ता प्राप्ति स्वभाव उसे फिर से इस खेल को चालू करने को प्रेरित करता है. परिणाम यह होता है कि राजनीति जीत जाती है और धर्म हार जाता है और राजनीति के इशारों पर कार्य करने लगता है और समाज में बंटवारे के लिए एक माध्यम के तौर पर प्रयोग किया जाने लगता है. सत्ता पर हिस्सेदारी चाहने वाले चाहते है कि राजनीति बंटवारे पर आधारित विषयों पर हो ताकि सत्ता का विखंडन हो जाये और ज्यादा से ज्यादा लोगों को नेतृत्व का मौका प्राप्त हो. 

सत्ता पर नियंत्रण रखने वाला भी विखंडन नहीं चाहता है क्योंकि विखंडन होने पर उसकी सत्ता ही कम हो जायेगी. लेकिन इन दोनों ही परिस्थितियों में समाज की समस्याओं का कोई हल नहीं निकलता है और मनुष्यता यथावत अंधेरे में ही बनी रहती है. राजनीति और धर्म अपने आपमें मानवीय समस्याओं का हल ढूंढने में नाकाफी है, साथ ही इनके नकरात्मक घालमेल से संघर्ष यथावत बने रहते है. लेकिन फिर भी एक आशा यह अवश्य बनती है कि क्या सत्ता लोलुपता से दूर सामाजिक निष्ठाओं पर आधारित धर्म और राजनीति का उचित मिलन ही ऐसे मानवीय व्यक्तित्वों को जन्म देगा जो समाज में सुधार करने के पहले स्वयं में सुधार करे और सामाजिक समस्याओं का समूल हल निकाले न कि विखंडनकारी हल, निश्चित ही ऐसा व्यक्तित्व संघर्ष से परे सर्वजन हिताय सोचेगा, बहुजन हिताय नहीं, भारत में महात्मा गांधी इसका बेहतरीन उदाहरण है.

(लेखक कपिल शर्मा बिहार राज्य निर्वाचन सेवा में अधिकारी हैं)
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

By continuing to use the site, you agree to the use of cookies. You can find out more by clicking this link

Close