Kargil War Mistakes: 1999 का कारगिल युद्ध दो महीने से अधिक समय तक चला. उस दौरान हमसे कई गलतियां हुईं. हमने जंगलों को पेड़ समझकर नजरअंदाज कर दिया. कश्‍मीर घाटी में आतंकवाद एक चुनौती था जिससे निपटने में लगे सुरक्षा बल यह देखना ही भूल गए कि हिमालय में ऊंचाई पर क्या हो रहा है. चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने गुरुवार को कारगिल युद्ध से मिले सबक पर बोलते हुए यह सब कहा.


COMMERCIAL BREAK
SCROLL TO CONTINUE READING

सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने कहा कि युद्ध की स्मृतियों को संजोने के अलावा इसके बाद की स्थिति को भी देखना चाहिए. युद्ध से जरूरी सबक लेने चाहिए और आगे वही गलतियां दोहराना नहीं चाहिए. CDS ने कहा कि युद्ध की स्मृतियों को संजोने के अलावा, इसके परिणामों पर गौर करना और भविष्य के लिए उपयोगी सबक लेना भी महत्वपूर्ण है.


कारगिल युद्ध में भारत की गलतियां


  • कारगिल में हमें बेशक जीत मिली लेकिन तमाम खामियां भी उजागर हो गई थीं. तभी तो, 26 जुलाई 1999 को सेना की ओर से जीत की घोषणा करने के 72 घंटों के भीतर सरकार ने के. सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता में अपनी पहली समिति गठित की. इस समिति का उद्देश्य 'जम्मू और कश्मीर में लद्दाख के कारगिल जिले में पाकिस्तानी आक्रमण की ओर ले जाने वाली घटनाओं की समीक्षा करना' और 'ऐसे सशस्त्र घुसपैठ के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए आवश्यक समझे जाने वाले उपायों' की सिफारिश करना था.

  • समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि कारगिल सेक्टर में पाकिस्तानी घुसपैठ ने भारतीय सरकार, सेना और खुफिया एजेंसियों के साथ-साथ जम्मू-कश्‍मीर की राज्य सरकार और उसकी एजेंसियों को पूरी तरह चौंका दिया था. सुब्रह्मण्यम कमेटी के मुताबिक, किसी भी एजेंसी या व्यक्ति को हमले की भनक नहीं लगी, न ही उन्हें इतने बड़े पैमाने पर हमले की संभावना का अंदाजा था.


यह भी पढ़ें: कारगिल युद्ध के दौरान जब वाजपेयी ने नवाज शरीफ की फोन पर लगाई थी 'क्लास'


  • पूर्व सेना प्रमुख एनसी विज (रिटायर्ड) ने अपनी नई किताब 'अलोन इन द रिंग' में लिखा है कि पाकिस्तान के इरादे भांप पाने में खुफिया एजेंसियां पूरी तरह नाकाम रहीं. उनके मुताबिक, खुफिया एजेंसियां 'पाकिस्तान द्वारा अंतर्राष्ट्रीय हथियार बाजारों से सर्दियों के लड़ाकू उपकरणों की बड़ी खरीद का पता लगाने में गंभीर रूप से विफल रहीं' और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) का 'गलत आकलन' कि चालू वर्ष में पाकिस्तान के साथ युद्ध की कोई संभावना नहीं थी.

  • 1999 में ऐतिहासिक लाहौर घोषणा पर हस्ताक्षर होने के कुछ महीनों के भीतर ही पाकिस्तान ने भारत पर हमला बोल दिया. शुरुआत में पाकिस्तानी सैनिकों को ‘मुजाहिद्दीन’ समझ लिया गया था. युद्ध के दौरान, पाकिस्तानी लड़ाकों द्वारा कब्जा किए गए स्थानों को फिर से हासिल करने के लिए कई लड़ाइयां लड़ी गईं.

  • नब्बे के दशक में कश्‍मीर घाटी के भीतर आतंकवाद चरम पर था. सुरक्षा बलों का सारा ध्‍यान आतंकियों से निपटने पर था. हम ऊंचाई पर मौजूद इलाकों पर नजर रखना तो भूल ही गए. हिमालय की उन ऊंची-ऊंची चोटियों को नजरअंदाज करना हमें बहुत भारी पड़ा. जैसा कि जनरल चौहान ने भी कहा, 'हम कभी-कभी तात्कालिक और आसान कामों पर इतना ध्यान केंद्रित कर लेते हैं कि बड़ी तस्वीर को नजरअंदाज कर देते हैं.'


यह भी देखें: कारगिल में वायुसेना के सामने फेल था पाकिस्तानी F-16, मिराज 2000 ने 30 सेकेंड तक रखा लॉक, जांबाजों ने बताए प्राउड मोमेंट 


26 जुलाई : कारगिल विजय दिवस


जनरल चौहान ने कहा, 'हमारे सैनिकों द्वारा दिए गए बलिदान की यादें हमारी राष्ट्रीय लोककथा का हिस्सा बननी चाहिए, जैसा कि कारगिल युद्ध के साथ हुआ है.' वह नई दिल्ली में आयोजित, कारगिल युद्ध में विजय की 25वीं वर्षगांठ से जुड़े एक समारोह में बोल रहे थे. युद्ध 3 मई को शुरू हुआ और 26 जुलाई को भारत की निर्णायक जीत के साथ समाप्त हुआ. भारत हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मनाता है.


कारगिल विजय के 25 साल


आज भी नहीं बदली पाकिस्तान की विचारधारा: CDS जनरल अनिल चौहान


जनरल चौहान ने कहा, '1971 (युद्ध) में हार के बाद पाकिस्तान हमेशा हमसे बदला लेना चाहता था. 1984 में सियाचिन ग्लेशियर पर हमारे द्वारा किया गया कब्जा एक और अपमान था, जो पाकिस्तान को सहना पड़ा. कारगिल में इसकी कार्रवाई अपने सम्मान को पुनः प्राप्त करने के लिए थी, लेकिन स्पष्ट रूप से उसके सभी प्रयास अपने उद्देश्य में असफल रहे.' सीडीएस ने कहा कि 'आज हम जो छद्म युद्ध देख रहे हैं, वह उसी विचारधारा और सोच का परिणाम है जो नहीं बदली है.'


(एजेंसी इनपुट्स)