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पितरों को मोक्ष दिलाने के लिए घर बैठे कीजिए ऑनलाइन पिंडदान, पुरोहितों ने किया खारिज

 तीर्थ पुरोहित इसे धर्म के साथ मजाक बता रहे हैं.बता दें की मोक्ष नगरी गया में पितृपक्ष मेला शुरू हो गया है.इस साल करीब आठ लाख श्रद्धालुओं के आने की उम्‍मीद है.  

पितरों को मोक्ष दिलाने के लिए घर बैठे कीजिए ऑनलाइन पिंडदान, पुरोहितों ने किया खारिज
इस साल करीब आठ लाख श्रद्धालुओं के आने की उम्‍मीद है.

गया: बिहार राज्‍य पर्यटन विकास निगम ने गया में घर बैठे पिंडदान के लिए ई-पिंडदान का विशेष पैकेज लॉन्च किया है. इस पैकेज के जरिए लोग घर बैठे पितरों के मोक्ष के लिए ऑनलाइन पिंडदान कर सकते हैं, लेकिन गया के पंडा समाज ने इस व्यवस्था को कथित तौर पर नकार दिया है, उनका कहना है कि ऐसी व्यवस्था से लोगो की आस्था को नुकसान हो सकता है.

पर्यटन विभाग के इस पैकेज का 'पंडा समाज' विरोध कर रहा है. तीर्थ पुरोहित इसे धर्म के साथ मजाक बता रहे हैं.बता दें की मोक्ष नगरी गया में पितृपक्ष मेला शुरू हो गया है.इस साल करीब आठ लाख श्रद्धालुओं के आने की उम्‍मीद है.

 

इस पैकेज का लाभ लेने के लिए आपको www.pitrapakshagaya.com पर क्लिक करना होगा. इसके बाद खुले विंडो में अपेक्षित जानकारी देनी होगी.गया में पितृपक्ष मेला के आरंभ के साथ प्रभावी यह पैकेज 28 सितंबर तक जारी रहेगा. इस दौरान देश-विदेश के श्रद्धालु घर बैठे अपने पितरों का तर्पण और पिंडदान कर पाएंगे.इसके विशेष सेवा का लाभ उठाने के लिए आपको 19 हजार रुपये के साथ-साथ 950 रुपये जीएसटी देना होगा.पर्यटन विभाग ने इस पैकेज के लिए बैंक ऑफ इंडिया के अकाउंट नंबर की घोषणा की है.

श्रद्धलुओं द्वारा पैकेज के तहत मांगी गई राशि उपलब्ध कराने के बाद उनका पंजीकरण कर गया में उनके पितरों को विष्णुपद मंदिर और अक्षयवट में पिंडदान और फल्गु में तर्पण कराया जाएगा.इसके अतिरिक्त पूजन सामग्री, पंडित और पुरोहित पर होने वाले व्यय एवं कर्मकांड की वीडियो क्लीपिंग, फाटोग्राफ्स सभी श्रद्धालुओं को पिंडदान के बाद उपलब्ध कराए जाएंगे.बता दें की धर्मग्रंथों में पुत्र के गयाजी जाकर फल्गु में स्नान और विष्णुपद में पिंडदान को फलदायी कहा गया है.

गया के बारे में कहा जाता है की जो भी पिंडदान करने आते हैं, वे पूर्वजों के हस्तलिखित बही खाते पर दस्खत देखकर ही तीर्थ पुरोहित को अपना पंडाजी मानकर कर्मकांड संपन्न कराते हैं.यहां के तीर्थ पुरोहितों के पास साल-दो साल नहीं बल्कि दो सौ वर्ष तक के बही-खाते सुरक्षित हैं. वहीं समय के साथ इन्‍हें भी कंप्यूटराइज्‍ड करने की व्यवस्था की जा रही है।

फिलहाल पंडा समाज में इस व्यवस्था को लेकर नाराज़गी है. ई-पिंडदान का लाभ कितने श्रद्धालु उठाते हैं और ये व्यवस्था कितनी सफल होती है, ये जानने के लिए थोड़ा इंतजार करना होगा.
Saloni Srivastava, News Desk