भोपाल: बीते 40 वर्षों से इस मदरसे में हो रही है गौ वंश की सेवा, जानिए पूरी खबर

भोपाल के इस मदरसे का नाम है दारुल उल हुसैनी. तूमड़ा गांव में मौजूद इस गौशाला में दीनी तालीम दी जाती है.

भोपाल: बीते 40 वर्षों से इस मदरसे में हो रही है गौ वंश की सेवा, जानिए पूरी खबर
इस मदरसे की खास बात ये है कि यहां के बच्चों को भी गौसेवा की तालीम भी दी जाती है. ये मदरसा आसपास के दर्जन भर गांवों की गायों के लिए पनाहगाह भी है.

संदीप भम्मरकर/भोपाल: गौवंश पर होती राजनीति के बीच एक तस्वीर भोपाल के मदरसे की आपको दिखाते हैं, जहां मुस्लिम समुदाय गौ माता की खिदमत कर रहा है. ये कोई एक-दो साल से नहीं, बल्कि चालीस साल पहले 1980 से हो रहा है. ना कोई दिखावा और ना कोई प्रचार. खिदमत ऐसी कि गौवंश के नाम पर जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगाने वाले सियासत दां की नज़रें भी शर्म से झुक जाएं.

भोपाल के इस मदरसे का नाम है दारुल उल हुसैनी. तूमड़ा गांव में मौजूद इस गौशाला में दीनी तालीम दी जाती है. लेकिन, इस गौशाला की तस्वीरें यकायक ध्यान खींचती है. इसकी वजह है मदरसे के हाफिज़ और जिम्मेदार यहां गायों की खिदमत करते देखे जाते हैं. वैसे, तो गौशालाओं को आमतौर पर गांवों और किसानों तक सीमित हैं, इन्हें मंदिरों या हिन्दू संन्यासियों के आश्रम का हिस्सा भी समझा जाता है. लेकिन मदरसे में गायों के खिदमत से कुछ लोग चौंक उठेंगे. ये सोच उठना इसलिए लाजिमी है, क्योंकि गाय इन दिनों सियासत का हिस्सा है. 

गाय और गौरक्षा के नाम पर सियासत पूरे देश में हो रही है. लेकिन इन सब खबरों को नज़रअंदाज़ करते हुए 1980 से ये गौशाला यहां बदस्तूर चल रही है. मदरसे के मुफ्ती मोहम्मद ऐजाज़ कहते हैं कि ना जाने ऐसा क्यों समझा जाता है कि गाय केवल हिन्दुओं के हिस्से में आती हैं. वे पैगम्बर हज़रत मोहम्मद ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि नबी ने कहा है कि गाय का दूध अमृत के समान है. बेज़ुबानों की खिदमत करना चाहिए. इसलिए मुस्लिम कौम भी गाय की उतनी ही फिक्र करती है, जितना कोई हिन्दू. 

इस मदरसे की खास बात ये है कि यहां के बच्चों को भी गौसेवा की तालीम भी दी जाती है. ये मदरसा आसपास के दर्जन भर गांवों की गायों के लिए पनाहगाह भी है. रात के वक्त जब आसपास के गावों के मवेशियों को बरसात के दौरान सूखी जगह नहीं मिलती है तो वे यहां मदरसे में डेरा डाल देते हैं. यहां उनके खाने के लिए घास-भूसा और पानी का इंतज़ाम मदरसे की इंतजामियां कमेटी करती है. मुफ्ती ऐजाज़ कहते हैं कि ये कोई बताने की चीज़ नहीं है, हम बताते भी नहीं हैं. आपने ज़िक्र छेड़ा है तो बता रहे हैं. 

दूसरे इंतज़ामों के बारे में पूछने पर मुफ्ती ऐजाज़ कहते हैं कि गायों के लिए नियमित तौर पर वेटनरी डॉक्टरों की विजिट कराई जाती है. उनकी देखरेख में ही उनके खाने का इंतजाम होता है. गायों का दूध मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए इस्तेमाल किया जाता है. भोपाल की तर्जुमे वाली मस्जिद के अंतर्गत आने वाले मदरसे के बच्चों तक ये दूध पहुंचाया जाता है. गाय के गोबर से खाद बनायी जाती है जिसका इस्तेमाल मदरसे के खेतों में किया जाता है. मदरसे में इन दिनों करीब 275 बच्चों को तालीम दी जा रही है. ये बच्चे दीनी तालीम लेने के लिए आसपास के इलाकों से आते हैं और यहीं रहते भी हैं.