क्या है रावण के नाम का अर्थ, क्यों कहते हैं दशानन? जानें कुछ खास फैक्ट्स

रावण ने अपने 10 में से 1 सिर को वीणा की तुम्बी के रूप में, अपने एक हाथ को धरनी के रूप में और तंत्रिकाओं को स्ट्रिंग के रूप में इस्तेमाल कर एक वीणा को तैयार की. जो 'रूद्र-वीणा' के नाम से जानी जाती है. ये देख शिव प्रसन्न हो गए और उसे 'रावण' नाम दिया. 

क्या है रावण के नाम का अर्थ, क्यों कहते हैं दशानन? जानें कुछ खास फैक्ट्स
दशहरा 2020

गुंजन शर्मा/नई दिल्ली: रावण रामायण का एक मुख्य पात्र है. रावण का नाम तो सभी जानते हैं लेकिन इसका अर्थ कम ही लोग जानते होगें. रावण का अर्थ होता है जोर से दहाड़ने वाला. रावण को दशानन के नाम से भी जाना जाता है.कहा जाता है कि रावण में शात्रों का ज्ञान था, वह अत्यंत बलशाली, राजनीतिज्ञ और महापराक्रमी था. किसी ने रावण को हकीकत में तो नहीं देखा है मगर किताबों और कथाओं के अनुसार रावण के दस सिर थे.आज हम आपको बताएंगे रावण के 10 सिरों की कहानी..

कुछ विद्वानों का मानना है कि रावण के दस सिर नहीं थे वह केवल भ्रम पैदा करने के लिए ऐसा करता था. जैन शास्त्रों में इसे लेकर उल्लेख किया गया है. उसमें लिखा है कि  रावण के गले में बड़ी-बड़ी गोलाकार नौ मणियां होती थीं. जिसमें रावण का सिर दिखाई देता था. इसलिए कहा गया है कि रावण के दस सिर थे.

रावण को इसलिए कहा जाता है दशानन
हमारे शात्रों में कहा गया है कि रावण भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था.एक बार रावण भगवान शिव की अराधना कर रहा था. भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए रावण ने दस बार अपना सिर काट कर भगवान शिव को अर्पण कर दिया था. रावण की भक्तिभाव से भगवान शिव प्रसन्न हो गए और उन्होंने रावण को दशानन होने का वरदान दिया.

भगवान शिव ने दिया था ये वरदान
दशानन होने के वरदान के साथ-साथ भगवान शिव ने रावण को एक बड़ा वरदान दिया था. भगवान शिव ने रावण को वरदान दिया कि जब तक कोई रावण नाभि पर प्रहार नहीं करता तब तक रावण की की मृत्यु नहीं हो सकती.

यही कारण था कि युद्ध में प्रभु राम ने कई बार रावण का सर काटा और कई कोशिशें की मगर प्रभु राम रावण को नहीं मार पाए थे.कई कोशिश की फिर भी रावण को नहीं मार पाए. अन्त में विभीषण के कहने पर प्रभु राम ने रावण की नाभि में बाण मारा था जिसके बाद रावण ने प्राण त्याग दिए थे.

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भगवान शिव ने दिया था 'रावण' नाम 
एक बार रावण शिव को कैलाश से लंका लाना चाहता था और इसके लिए उसने पर्वत उठा लिया था. मगर भगवान शिव ने पर्वत पर अपना पैर रख दिया और अपनी एक पैर की अंगुली से रावण की अंगुली को कुचल दिया. रावण दर्द से तड़प उठा. वह शिव की शक्ति से वाखिफ था तो उसने शिव तांडव स्त्रोतम् शुरू कर दिया.

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रावण ने इस दौरान अपने 10 में से 1 सिर को वीणा की तुम्बी के रूप में, अपने एक हाथ को धरनी के रूप में और तंत्रिकाओं को स्ट्रिंग के रूप में इस्तेमाल कर एक वीणा को तैयार की. जो 'रूद्र-वीणा' के नाम से जानी जाती है. ये देख शिव प्रसन्न हो गए और उसे 'रावण' नाम दिया. 

रावण को थी संगीत में रुचि
रावण में बुराई के साथ-साथ कुछ गुण भी थे.कहा जाता है कि रावण एक अच्छा वीणा वादक और मृदंग वादक था.रावण को वीणा से बेहद प्रेम था,जिसके कारण उसके ध्वज में प्रतीक के रूप में वीणा का चिह्न था. 

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