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विधानसभा चुनाव: मानवेन्द्र सिंह और हरीश चौधरी की दोस्ती से बढ़ सकती हैं BJP की मुश्किलें

मानवेन्द्र सिंह जिस गाड़ी से कांग्रेस दफ्तर पहुंचे उसे हरीश चौधरी ड्राइव कर रहे थे . 

विधानसभा चुनाव: मानवेन्द्र सिंह और हरीश चौधरी की दोस्ती से बढ़ सकती हैं  BJP की मुश्किलें
हरीश 2009 के लोकसभा चुनाव में मानवेन्द्र को हरा चुके हैं

दिल्ली/मनोहर विश्नोई: प्रदेश में विधानसभा चुनाव का बिगुल बजते ही राजस्थान की राजनीति में हलचलें तेज हो गई. इसी कड़ी में बीजेपी के सीनियर नेता जसवंत सिंह के बेटे मानवेन्द्र सिंह भी कांग्रेस में शामिल हो गए. लेकिन जसवंत सिंह के पुत्र मानवेंद्र सिंह का कांग्रेस में शामिल होना जितना चर्चा के विषय बना हुआ है उतना ही चर्चा एक तस्वीर की भी हो रही है. इस तस्वीर के जरिए कांग्रेस ने कई संदेश एक साथ देने की कोशिश की है. 

जी हां हम बात कर रहे हैं उस तस्वीर की जब मानवेन्द्र का रथ पहली मर्तबा कांग्रेस दफ्तर पहुंचा तो उनके सारथी के रूप में हरीश चौधरी नजर आ रहे थे. दरअसल, मानवेन्द्र सिंह जिस गाड़ी से कांग्रेस दफ्तर पहुंचे उसे हरीश चौधरी ड्राइव कर रहे थे . 

कहानी को आगे बढ़ाने से पहले थोड़ा घटनाक्रम जान लेते हैं. मानवेंद्र सिंह अपने भाई और पत्नी संग करीब 10.30 बजे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के आवास पहुंचे. यहां राजस्थान के लगभग सभी बड़े कांग्रेसी नेता मौजूद थे. राहुल से मुलाकात और मानवेन्द्र सिंह के औपचारिक तौर पर कांग्रेस में शामिल होने के बाद तय किया गया मानवेंद्र सिंह की मौजूदगी में कांग्रेस मुख्यालय में एक बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस के आयोजन किया जाएगा. 

राहुल से मुलाकात के बाद मानवेन्द्र अपने दिल्ली स्थित घर के लिए रवाना हो गए. वहीं दूसरे कांग्रेसी नेता अपने पार्टी मुख्यालय के लिए. 12.30 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस के वक्त तय किया गया. इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल करने के लिए मानवेन्द्र सिंह को भी पार्टी मुख्यालय लाना था. मानवेन्द्र अपने घर थे और उन्हें लाने की जिम्मेदारी सौंपी गई हरीश चौधरी को. बता दें कि हरीश 2009 के लोकसभा चुनाव में मानवेन्द्र को हरा चुके हैं और दोनों का ताल्लुक बाड़मेर जिले से ही है. 

हालांकि हरीश शुरुआती विरोध के बाद मानवेन्द्र को कांग्रेस में शामिल करने के फैसले पर अपनी सहमति जता चुके थे. कांग्रेस संदेश देना चाहती थी कि मानवेंद्र के कांग्रेस में आने को लेकर हरीश को कोई आपत्ति नहीं है. ऐसे में हरीश को ही मानवेंद्र को पार्टी मुख्यालय लाने का जिम्मा सौंपा गया. दूसरा, पार्टी यह भी सन्देश देना चाहती थी कि मानवेन्द्र और हरीश दोनों का कद पार्टी में बड़ा है और दोनों समान कद के नेता हैं. पार्टी इसके जरिये जाट और राजपूत दोनों समुदायों को सन्देश देना चाहती थी.

साफ है पार्टी बतानी चाहती थी कि दोनों ही नेता और दोनों ही समुदाय पार्टी के लिए अहम हैं. लेकिन इस कदम से प्रदेश का एक तबका ऐसा है जो खुश नहीं है. दरअसल, बाड़मेर में लम्बे अरसे से जाट और राजपूत सियासी तौर पर प्रतिद्वंदी रहे हैं. जिसके कारण दोनों समुदायों के दो बड़े नेताओं की एक साथ इस तस्वीर से सियासी खलबली मच गई है. जिसका असर अब सोशल मीडिया पर दिखने लगा है.