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राजस्थान: देवताओं की ड्यौढ़ी भी असुरक्षित, मंदिरों की एक तिहाई जमीन पर दबंगों का कब्जा

देवस्थान विभाग के अधीन मंदिरों की करीब 7104.84 हेक्टेयर कृषि भूमि है, जिसमें से करीब आधी भूमि पर लोगों ने कब्जा कर रखा है.

राजस्थान: देवताओं की ड्यौढ़ी भी असुरक्षित, मंदिरों की एक तिहाई जमीन पर दबंगों का कब्जा
देवस्थान विभाग के 10 कार्यालयों के अधीन 139 मंदिर हैं.

जयपुर: इतिहास के मुताबिक भले ही औरंगजेब को मंदिरों का सबसे बड़ा दुश्मन माना गया हो. जिसने अपने शासन काल में सैकड़ों मंदिर तुड़वाए. पर अब तो राजस्थान के अंदर ही एक ऐसा वर्ग पनप चुका है. जो भगवान को उन्हीं की जमीन से उखाड़कर विदा करने को तैयार है. यहां देवताओं को संकटमोचन नहीं मिल रहे. ऊपर से वह कानून के फेरे में फंसे जा रहे हैं. प्रदेश में 'प्रभु' स्थल से जुड़े अमूनन मामले अदालतों में चल रहे हैं. एक तरफ दबंग कब्जाधारी तो दूसरी ओर तरफ लुंज-पुंज अंदाज में देवस्थान महकमा देवभूमियों की पैरवी करता रहा.

राज्य सरकार प्रदेश में देवस्थान की एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा कीमती जमीनों से अवैध कब्जे नहीं हटवा पा रही है. बड़े मंदिरों के नाम दर्ज 32 हजार बीघा जमीन में से 14 हजार बीघा पर लोगों ने दशकों से अवैध कब्जे कर रखे हैं. अमूमन मामले न्यायालयों में विचाराधीन हैं. सरकारी मंदिरों की जमीनों को माफियाओं से बचाने के लिए जिलों के कलेक्टर और तहसीलदारों को भी कार्रवाई के आदेश दिए, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पा रही. 

वहीं दूसरी ओर देवस्थान विभाग के सहायक आयुक्त कार्यालयों की जमीनों, भवनों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में करीब दो हजार किराएदार हैं. जिनसे अप्रैल 2019 तक विभाग के करीब 9 करोड़ रुपए किराया बकाया है. 200 से ज्यादा मामले विभाग और किराएदारों के बीच न्यायालय में हैं. देवस्थान विभाग के आयुक्त का तो साफ मानना है कि प्रदेश में देवताओं को विस्थापित होने से बचाने के लिए अदालत ही एकमात्र रास्ता है. हमारा महकमा अपनी संपति को लेकर गंभीर है, नहीं तो आज सैकड़ों मामले अदालत में नहीं होते.

देवस्थान विभाग के आयुक्त कृष्ण कुनाल ने बताया कि मंदिरों के नाम हटाने के मामले में कलेक्टर और मंदिर भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू हो चुकी है. जो केस अब तक दर्ज हुए हैं उनका हमारे इंस्पेक्टर्स से फॉलोअप करवा रहे हैं. हमने तहसीलदार और देवस्थान के जमीन रिकॉर्ड का संयुक्त सर्वे के लिए सरकार को प्रस्ताव भेजा है. बाकी मंदिरों और धर्मशालाओं के रखरखाव को लेकर भी बजट प्रस्ताव भेज रहे हैं. 

देवस्थान विभाग के अधीन मंदिरों की करीब 7104.84 हेक्टेयर कृषि भूमि है, जिसमें से करीब आधी भूमि पर पुजारियों के साथ अन्य लोगों ने कब्जा कर रखा है. विभागीय अधिकारियों की उदासीनता के चलते प्रभु मूर्ति के नाम दर्ज इन जमीनों को कब्जा मुक्त करवाने और इनकी मेढ़बंदी करने की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा. इसका नतीजा है कि भगवान की जमीनों पर लगातार कब्जे बढ़ते जा रहे हैं. देवस्थान विभाग के 10 कार्यालयों के अधीन 139 मंदिर हैं. इनकी करीब 7104.84 हेक्टेयर कृषि भूमि है. इसमें से मंदिरों के कब्जे में 3811.35 हेक्टेयर भूमि है. प्रभु मूर्ति के नाम दर्ज करीब 3293.49 हेक्टेयर कृषि भूमि पर पुजारियों और अन्य ने कब्जा कर रखा है.

देवस्थान विभाग के अधीन वृंदावन में भी सहायक आयुक्त कार्यालय है. मंदिरों की परंपराओं को निर्वहन एवं मंदिरों की भूमि के संरक्षण का जिम्मा इन कार्यालयों पर है, लेकिन करीब 906.53 हेक्टेयर भूमि को पुजारियों और अन्य अतिक्रमियों ने अपने नाम पर नामांतरण करवा लिया है. देवस्थान विभाग के मंदिरों में कई पुजारी वंशानुगत सेवा करते हैं. मंदिरों की कृषि भूमि के साथ ही पुजारियों को जागीरी भूमि प्रदान की गई थी, इस पर पुजारी अपने गुजारे के लिए खेती करते हैं. इनको पुजारी किराये व गिरवी नहीं दे सकते हैं या बेचान नहीं कर सकते हैं. 

वहीं, देवस्थान विभाग की कृषि और चरागाह की भूमियों में से काफी भूमियों का नामांतरण पुजारियों और अतिक्रमियों ने अपने नाम से करवा लिया है. इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश भी दिए थे. उस समय अधिकतर भूमि का नामांतरण रद्द करवाकर 1985 के पूर्व की स्थिति में लाया गया, लेकिन कई भूमियां इस प्रक्रिया से वंचित रह गई. इनमें से कई भूमियों पर लोगों ने कब्जे कर रखे हैं और धीरे-धीरे इनको खुर्द-बुर्द भी कर रहे हैं.

खैर बची जमीन की रखवाली तो देवस्थान महकमे को करनी ही है, लेकिन उसकी उदासीनता और स्टाफ  की कमी ने कब्जेधारियों के हौसले इतने बुलंद कर दिए हैं कि विभाग की कार्रवाई की भनक लगने पर वे पहले ही अदालत की ड्योढ़ी पर पहुंच जाते हैं. स्टाफ  की कमी से जूझ रहा महकमा उसके बाद और भी कागजी कार्रवाइयों की उलझन में फंस जाता है. विभागीय उदासीनता का पूरा फायदा अवैध कब्जेधारियों को मिलता है क्योंकि सरकार ठीक से लड़ ही नहीं पाती. कहने को विभाग के पास निरीक्षकों के पद भी हैं लेकिन वे विभागीय और अदालती कामों में बुरी तरह उलझे हुए हैं. शहरी क्षेत्र की कीमती जमीन पर तो भूमाफियाओं की नजर लग चुकी है. ग्रामीण इलाकों में अवैध कब्जेधारियों और शहरी क्षेत्र में भूमाफियाओं तथा अतिक्रमणकारियों से देवस्थान को ज्‍यादा लड़ना पड़ रहा है.