जयपुर: 20 पंचायतों के लिए एक 'बीमार' अस्पताल, बदहाल हो रहे हैं मरीज

करीब 20 ग्राम पंचायतों का भार उठाने वाला यह अस्पताल बदहाली पर आंसू के बहा रहा है.   

जयपुर: 20 पंचायतों के लिए एक 'बीमार' अस्पताल, बदहाल हो रहे हैं मरीज
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर तकरीबन ढ़ाई लाख की आबादी निर्भर करती है.

जयपुर: स्वास्थ्य महकमे की कथनी और करनी में बड़ा फर्क होता है, ये सिर्फ बात ही नहीं बल्कि हकीकत भी है. जयपुर जिला मुख्यालय से 60 किलोमीटर दूर पहुंचते- पहुंचते स्वास्थ्य संबंधी सरकार के सभी दावों की पोल खुलने लगती हैं. भले ही मरीजों को हर तरह की सुविधाएं मुहैया करवाए जाने की बातें कही जा रही हैं. लेकिन राजधानी की मौजमाबाद तहसील में स्थित राजकीय स्वस्थ्य केन्द्र का हाल बुरा है. है तो ये सीएचसी यानि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लेकिन हालात प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से भी बदतर हैं.

भले ही स्वास्थ्य महकमा तमाम दावे कर ले, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी हकीकत कुछ और ही नजर आती है. हम बात कर रहे हैं राजधानी जयपुर में आने वाले मौजमाबाद सीएचसी की. कहने को ये क्षेत्र राजा सवाईमानसिंह की जन्म स्थली है, लेकिन यहां बना सरकारी स्वास्थ्य केंद्र बुरे हाल में हैं. करीब 20 ग्राम पंचायतों का भार उठाने वाला यह अस्पताल बदहाली पर आंसू के बहा रहा है. 

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर तकरीबन ढ़ाई लाख की आबादी निर्भर करती है. हर दिन मरीजों औक तीमारदारों का तांता यहां लगा रहता है. लेकिन तमाम सुविधाओं की कमी यहां मरीजों को झेलनी पड़ती है. सीएचसी को क्रमोन्नत करने की मांग पर सरकार ने कदम भी उठाए फिर भी अस्पताल में अव्यवस्थाओं का आलम पसरा है. यहां ना तो नर्सिंग स्टाफ है. ना वो आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं जो एक सीएचसी में होनी चाहिए. 

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बदहाल व्यवस्था का आलम ये हैं कि अस्पताल में 30 बेड मंजूर हैं लेकिन मौजूदा वक्त में सिर्फ पांच बेड हैं. कई बार तो एक ही बेड पर दो या तीन मरीजों का इलाज कराना पड़ता है. मौजमाबाद हॉस्पिटल को विभाग ने केवल कागजों में ही पीएचसी से सीएचसी किया, लेकिन सुविधाओं में कोई बदलाव यहां नहीं दिखाई पड़ता है. 

इस स्वास्थ्य केंद्र में ना तो पूरे डॉक्टर है. ना सोनोग्राफी, एक्सरे मशीन, ना ही बल्ड टेस्ट की सुविधा. अस्पताल की दुर्दशा पर स्थानीय लोगों ने कई बार विधायक और विभागीय अधिकारी के सामने अपनी परेशानियां रखीं, लेकिन जनता के इन शिकायतों पर कोई सुनवाई नहीं की गई. 

अस्पताल में नर्सिंग स्टाफ नहीं होने के चलते कई बार तो तीमारदार मरीजों को अपनी गोद में उठाकर डॉक्टर के पास तक पहुंचते हैं. यहां तक की स्वास्थ्य केंद्र में  डॉक्टर से मिलना भी मरीजों के लिए एक चुनौती है. अगर लंबी लाइन के बाद मुलाकात हुई भी तो दवाएं बाहर की लिखी जाती हैं. जांच भी हॉस्पीटल के बाहर ही होती है. ऐसे में मराजों को पैसे खर्च करने के बाद सही इलाज नहीं मिल पा रहा है.