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लापरवाही! अस्पताल ने बेड न होने के चलते कैंसर मरीज को इलाज के बाद भेजा घर, फिर फरार किया घोषित

महिला का पति अस्पताल में इधर से उधर चक्कर काटता रहा, लेकिन उनकी किसी ने नहीं सुनी. जबतक शाम के 4 बज चुके थे. 

लापरवाही! अस्पताल ने बेड न होने के चलते कैंसर मरीज को इलाज के बाद भेजा घर, फिर फरार किया घोषित
डॉ. निर्मल शर्मा को मामले का पता चला तो उन्होंने मरीज को वार्ड में भर्ती करवाने में मदद की.

मुकेश सोनी, कोटा: स्टेशन क्षेत्र के रोटेदा रोड पर सिद्धि टाउन निवासी 55 वर्षीय आशा कैंसर से पीड़ित हैं. जांच में आशा के हीमोग्लोबिन 5.5 ग्राम रह गया. महिला मरीज को 22 अगस्त को दोपहर 12 बजे जिला रामपुरा अस्पताल से एमबीएस रैफर किया गया था. एमबीएस में उसे महिला मेडिकल डी वार्ड में शिफ्ट किया गया था. वार्ड में बेड खाली नहीं होने के कारण बेड नम्बर-6 के सामने बैंच पर लेटाकर उसे एक यूनिट ब्लड चढ़ाया गया.

महिला के पति रामवतार ने बताया कि बेड की परेशानी को देखते हुए रात करीब 12 बजे नर्सिंग स्टाफ ने मरीज को घर ले जाने की सलाह देते हुए सुबह जल्दी आने को कहा. नर्सिंग स्टाफ की सलाह पर मरीज को रात को 1 बजे घर ले गए. दूसरे दिन जब सुबह 8 बजे वापस अस्पताल लेकर पहुंचे तो नर्सिंग स्टाफ ने मरीज को अब्स्कोंड (फरार) बताते हुए भर्ती करने से इनकार कर दिया. महिला का पति अस्पताल में इधर से उधर चक्कर काटता रहा, लेकिन उनकी किसी ने नहीं सुनी. जबतक शाम के 4 बज चुके थे. इस बीच लापरवाही का आलम देखिए महिला मरीज बिना भर्ती टिकट के ही चार घंटे तक महिला मेडिकल वार्ड डी के एक बेड पर लेटी रही. इस दौरान नर्सिंग स्टाफ भी ये नहीं जान पाया कि मरीज वार्ड में भर्ती भी है या नहीं. वहीं मरीज के भर्ती टिकट में रात 10 बजे अब्स्कोंड बताया गया था.

नर्सिंग स्टाफ के कुछ लोगों ने दुबारा भर्ती टिकट बनवाने की सलाह दी. सलाह पर अमल करते हुए परिजनों ने मजबूरी में दोपहर 12 बजे रजिस्ट्रेशन काउंटर से पर्ची कटवाई और ओपीडी में डॉक्टर को दिखाया. डॉक्टर ने मरीज को ओपीडी में लाने की जरूरत बताई. जबकि महिला के पति ने मजबूरी बताते हुए कहा कि मरीज की हालत गंभीर है, ओपीडी में नहीं ला सकते हैं. मजबूरी और जरूरी के चक्कर में महिला मरीज वार्ड में लेटी रही. इसके चलते शाम तक उसको ब्लड नहीं चढ़ा और न उसे चिकित्सकों ने देखकर इलाज किया. बाद में डॉ. निर्मल शर्मा को मामले का पता चला तो उन्होंने गम्भीरता दिखाई और मरीज को वार्ड में भर्ती करवाने में मदद की.

डॉ. निर्मल शर्मा कहना है कि मरीज की कंडीशन देखे बिना कैसे भर्ती किया जाए, कैसे दवा लिखी जाए. जानकारी में आया कि मरीज का पति सुबह भी ओपीडी में जिद करता रहा कि मरीज को भर्ती कर दो. मरीज एक दिन पहले भर्ती था. इसके बारे में न तो इसने ओपीडी में जानकारी दी, ना ही उसके कागज थे. ओपीडी में बैठा डॉक्टर बिना कागज देखे मरीज को कैसे दवा लिख सकता है. भर्ती करना तो दूर की बात है. 

बाद में इमरजेंसी में रेजीडेंट डॉक्टर से भी बिना मरीज को देखे भर्ती करने की रट करता रहा. गुरुवार को एक यूनिट ब्लड चढऩे के बाद मरीज को अब्सकोंड कैसे किया गया. किन परिस्थतियों में किया गया. इसकी मुझे जानकारी नहीं है. वहीं डॉ. सीपी मीणा ने बताया कि गुरुवार को मेरी यूनिट थी. महिला मरीज आशा को वार्ड में भर्ती किया था, लेकिन बेड नहीं मिलने के कारण उसे बैंच पर ही ब्लड चढ़ाया गया. नर्सिंग स्टाफ ने उसे क्यों रवाना किया, यह गलत है. यदि घर भेजा तो दूसरे दिन वापस महिला को भर्ती करना था. दूसरे दिन यूनिट बदल गई. इस कारण दूसरे चिकित्सकों को देखकर भर्ती करना था लेकिन उन्होंने क्यों भर्ती नहीं किया ये वो ही बता सकते हैं.