जैसलमेर का बड़ा भूभाग आज भी पानी के लिए कर रहा संघर्ष, यह है वजह

मरूस्थल का नाम सामने आते ही तस्वीर उभरती है, राजस्थान के पश्चिमी इलाके की जहां पर दूर-दूर तक पसरे रेत के समंदर ने बरसों तक अभावों को झेला है.

जैसलमेर का बड़ा भूभाग आज भी पानी के लिए कर रहा संघर्ष, यह है वजह
फाइल फोटो

मनीष रामदेव, जैसलमेर: मरूस्थल का नाम सामने आते ही तस्वीर उभरती है, राजस्थान के पश्चिमी इलाके की जहां पर दूर-दूर तक पसरे रेत के समंदर ने बरसों तक अभावों को झेला है. साथ ही, प्रकृति के विपरीत हालातों में भी जिजीविषा को नहीं छोड़ते हुए प्रकृति से अपने संघर्ष की कई कहानियां लिखी है.

अभाव में लोगों ने झेली आपदा
जी हां, हम बात कर रहें है सरहदी जिले जैसलमेर की, जो भारत-पाक सीमा पर बसा है और अपने रेतीले धोरों के चलते दुनियाभर के सैलानियों के लिए भी आकर्षण का प्रमुख केंद्र माना जाता है. दूर से देखने में ये रेत का दरिया जितना खूबसूरत दिखाई देता है, वास्तव में उसकी हकीकत संघर्षों की लम्बी कहानी को बयां करती है, जो कि रूह को कंपा देने वाली है कि, किस तरह यहां के लोगों ने अभावों को अपने जीवन का हिस्सा बनाते हुए, अकाल सहित कई प्राकृतिक आपदाओं को झेला. साथ ही, इस वीरान रेगिस्तान में जीवन की उम्मीद के फूल खिलाएं है.

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यह कहावत होती थी चरितार्थ
दरअसल, आज हम रेगिस्तानी इलाके जैसलमेर की बात इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि बुधवार को विश्व सूखा एवं मरूस्थल रोकथाम दिवस है. इस मौके पर अगर जैसलमेर की चर्चा नहीं की जाए तो, इस दिन की सार्थकता पूरी नहीं हो सकती है. 'घोड़ा कीजे काठ का, पिंड कीजे पाषाण, बख्तर कीजे लौह का तब देखो जैसाण', ये कहावत उस जमाने में जैसलमेर के परिपेक्ष्य में कही जाती थी, जिसका अर्थ है कि, जिसके पास घोड़ा लकड़ी का हो, जो पानी नहीं पीता हो और शरीर पत्थर का हो, जो यहां की विषम भौगोलिक परिस्थितियों से लड़ कर और उस शरीर पर बख्तर यानि कपड़े लोहे के बने हो, तब जाकर जैसाण यानि जैसलमेर पहुंचा जा सकता था.

विकास से था अछूता
देश के सबसे बड़े भूभाग में बसा जिला जैसलमेर जो केन्द्र और राज्य की राजधानियों से लम्बी दूरी पर बसा हुआ था और किनारे पर होने के चलते विकास के लिहाज से भी हासिए पर ही था. ऐसे में यहां न तो सड़कों का जाल था और न ही यहां आने के लिए परिवहन के उपयुक्त साधन थे.

कई वर्षों तक नहीं हुई वर्षा
उस जमाने में ऊंट और घोड़ों के माध्यम से, यहां के लोग एक जगह से दूसरी जगहों पर जाते थे. अथाह रेगिस्तान होने के चलते अकाल का यहां से पूराना नाता रहा है. ऐसे में बरसों बरस यहां पर बारिश नहीं होती थी, जिससे पशुपालन व खेती पर निर्भर यहां के लोगों के लिए, जिविकोपार्जन भी बड़ा समस्या हुआ करती थी. लेकिन कहते हैं ना कि, 'आवश्यकता अविष्कार की जननी है'. तो यहां के लोगों ने अकाल को अपना भाग्य मानते हुए, प्रकृति से संघर्ष कर अपने जीवन को सुखद बनाया, जो आज दुनिया भर के लिए उदाहरण के रूप में है.

पीने का पानी बड़ी समस्या
पीने का पानी यहां की सबसे प्रमुख समस्या रही है, जिसके लिए यहां के लोगों ने रेगिस्तान का सीना चीर कर अपने व अपने पशुओं के पीने योग्य पानी की आवश्यकता को पूरा करने के लिे बेरियां खोदी, जिसमें बारिश के दौरान भूगर्भ में सिंचित जल रिस-रिस कर आता था.

इस तरह हुई पानी की व्यवस्था
बेरियों व कुओं की खुदाई के लिए आज आधुनिक संसाधन मौजूद है, जो कुछ ही घंटों में लम्बी गहराई तक खुदाई कर सकते हैं. लेकिन उस जमाने के लोगों ने अपने पशुओं और बाजुओं के दम पर गहरी बेरियां खोदी और पीने के पानी का प्रबंध किया.

घी सस्ता और पानी मंहगा
पानी के उपयोग को लेकर भी यहां एक कहावत थी की 'घी सस्ता और पानी मंहगा'. ऐसे में यहां के लोग पानी का बहुउपयोग करते थे, जिसमें नहाने के पानी से कपड़े धोना और कपड़े धोने के बाद बचे हुए पानी को पौधों को दे देना ताकि पानी व्यर्थ नहीं जाए.

लोगों के सामने आई भूखमरी की समस्या
अकाल को जैसलमेर का पर्याय ही कहा जाता है. ऐसे में उस जमाने में जब कई सालों तक पानी नहीं बरसता था, जैसलमेर ने उस जमाने में कई विपरीत परिस्थितयों को देखा है, जिसमें इलाके में पड़े भीषण अकाल आज भी यहां के बुजुर्गों को याद है, जिसमें लोगों के सामने भूखमरी की समस्या आ गई थी और यही वह कालखंड था, जब लोगों ने ग्रामीण इलाकों से पलायन कर पानी की उपलब्धता वाले इलाकों की ओर कूच किया था.

पलायन को मजबूर हुए लोग
जानकारों के अनुसार, इस कालखंड में कई लोग गांव छोड़कर शहरों की ओर गए और कई लोगों ने जैसलमेर छोड़कर देश के अन्य हिस्सों में जाकर रोजगार के अवसर ढूढे. हालांकि, रियासतकाल में जैसलमेर के तत्कालीन महारावलों ने यहां के लोगों को अकाल की विभिषिका से लड़ने के लिये अलग-अलग इलाकों में रोजगार के अवसर भी उपलब्ध करवाए, जिसमें राजाओं द्वारा विभिन्न भवनों का निर्माण करवाया गया. ताकि स्थानीय लोग मजदूरी कर अपना जीवनयापन कर सकें और आज भी वो भवन व ईमारतें इस बात की जींवत गवाह भी है.

इंदिरा गांधी ने किया था दौरा
रियासत काल में यहां के राजाओं ने इलाके की पानी वाली जगहों पर कई कुएं, बावड़ियां व तालाब खुदवाए जिनमें एकबार बारिश का पानी एकत्र हो तो, कई महीनों तक लोगों की प्यास बुझ सके. वहीं, देश आजाद होने के बाद 80 के दशक के बाद जैसलमेर जिले ने विकास की रफ्तार पकड़ी, जब देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) ने जैसलमेर का दौरा किया और यहां की विषम परिस्थितियों से रूबरू हुई.

सड़क और नहर का हुआ इंतजाम
इसके बाद यहां पर सड़कों का जाल भी बिछा और पीने के पानी के लिए इंदिरा गांधी नहर परियोजना भी पहुंची और जैसलमेर के पर्यटन ने विकास के इन पंखों के सहारे ऐसी उड़ान भरी कि, आज जैसलमेर दुनियाभर की नजरों में हैं और दुनिया के हर कोने में बैठा व्यक्ति यहां आना चाहता है.

कई कंपनियों का यहां के लिए झुकाव
पर्यटन नगरी के रूप में विख्यात जेसलमेर में अब पर्यटन व्यवसाय अपने चरम पर है. साथ ही, यहां का पीला पत्थर जिसके कारण इसे स्वर्णनगरी कहा जाता है कि, मांग देश व दुनिया में है. साथ ही, पवन व सौर उर्जा के हब के रूप में जैसलमेर देश की बड़ी विद्युत आवश्यकता को पूरा कर रहा है और कई नामी गिरामी कंपनियां अब जैसलमेर की तरफ लगातार बढ़ रही हैं.

जैसलमेर भूजल विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक नारायण इंणखिया की मानें तो, जैसलमेर जिले में बरसातें कम होने के चलते यहां का औसत भूजल स्तर वर्ष पहले 25 से 30 मीटर था. वहीं, अब बढ़कर कई स्थानों पर 50 मीटर के करीब पहुंच गया है.

पानी के लिए संघर्ष जारी
उन्होंने बताया कि, अब जैसलमेर में इंदिरा गांधी नहर का पानी पहुंच रहा है, जिससे नहरी इलाकों में हरियाली बढ़ी है, लेकिन आज भी जिले का बड़ा भूभाग पानी के लिए संघर्ष कर रहा है. अत्याधुनिक वैज्ञानिक संसाधनों की उपलब्धता के कारण अब यहां पर बड़ी संख्या में बोरवैल भी खुद गए हैं, जिससे भूजल का दोगुनी गति में दोहन हो रहा है और वर्षा जल जो पारंपरिक तरीकों से संवर्धन किया जाता था, वो बिल्कुल नहीं हो रहा है. साथ ही, परम्परागत जल स्त्रोतों की अनदेखी की जा रही है और वनों की कटाई के कारण पर्यावरण पर विपरीत असर पड़ रहा है, जो जिले के भविष्य के लिए किसी बड़े खतरे से कम नहीं है.

कम हुई ऊंटों की संख्या
विजय बल्लाणी ने बताया कि, जैसलमेर जिले में पहले जो राज्य पशु ऊंठों के कारवां चलते थे और ऊंठ परिवहन का मुख्य साधन होते थे, लेकिन अब जैसलमेर सहित राजस्थान में बहुत कम सख्या में ही ऊंठ दिखाई देते है और जैसलमेर में अब इसका प्रयोग पर्यटकों के लिए केमल सफारी तक ही सीमित हो गया है, जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है.

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