कोटा: डेंगू से कम खतरनाक नहीं है 'स्क्रब टाइफस', 4 साल में बढ़ गए 20 गुना रोगी

पहाड़ी इलाके, जंगल और खेतों के आस-पास ये पिस्सू ज्यादा पाए जाते हैं. चार टांग के जानवरों के शरीर में भी पिस्सू पाए जाते हैं. ये पिस्सू जानवरों का खून पीकर अपना जीवनयापन करता है. 

कोटा: डेंगू से कम खतरनाक नहीं है 'स्क्रब टाइफस', 4 साल में बढ़ गए 20 गुना रोगी
पिस्सू जानवर के शरीर से बाहर निकल कर गंदी जगह ब्रीडिंग करते हैं.

मुकेश सोनी, कोटा: पहाड़ी इलाकों में पाई जाने वाली स्क्रब टाइफस (Scrub typhus) अब शहरी इलाकों में पहुंच गया है. शहरी इलाकों से भी स्क्रब टाइफस पॉजिटिव मरीज सामने आने लगे है. डेंगू (Dengue) के कहर के बीच कोटा शहर में साइलेंट मोड पर स्क्रब टाइफस भी तेजी से फैलता जा रहा है. 

चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2015 में कोटा जिले में सिर्फ 9 रोगी स्क्रब टाइफस पॉजिटिव मिले थे. जो साल दर साल बढ़ते हुए 2019 में 170 तक जा पहुंचे हैं यानि 4 सालों में स्क्रब टाइफस के मरीजों में करीब 20 गुना इजाफा हुआ है. 

स्क्रब टाइफस किस साल में ज्यादा फैला-

patients of scrub typhus increasing in kota rajasthan

शहरी इलाके में आतंक
चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग से मिले आंकड़ों में चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है. आंकड़ों में इस साल ग्रामीण इलाकों के मुकाबले शहर में करीब 59 स्क्रब टाइफस के पॉजिटिव मरीज मिले हैं. इनमें कोचिंग एरिया जैसे तलवंडी, महावीर नगर, केशवपुरा, दादाबाड़ी, कुन्हाड़ी भी शामिल हैं. शहर की डेढ़ दर्जन से ज्यादा कॉलोनियों में स्क्रब टाइफस के मरीज मिले हैं.

इन शहरी इलाकों में मिल रहे स्क्रब टाइफस पॉजिटिव (साल 2019)

patients of scrub typhus increasing in kota rajasthan

patients of scrub typhus increasing in kota rajasthan

ब्लॉक स्तर पर स्क्रब टाइफस का कहर
इटावा                33
सांगोद                26
चेचट                 19
सुल्तानपुर          16
कैथून                 11

क्या है स्क्रब टाइफस?
सीएमएचओ डॉ. बीएस तंवर ने बताया कि पहाड़ी इलाके, जंगल और खेतों के आस-पास ये पिस्सू ज्यादा पाए जाते हैं. चार टांग के जानवरों के शरीर में भी पिस्सू पाए जाते हैं. ये पिस्सू जानवरों का खून पीकर अपना जीवनयापन करता है. पिस्सू जानवर के शरीर से बाहर निकल कर गंदी जगह ब्रीडिंग करते हैं. इसकी लार में बैक्टीरिया होते हैं. पिस्सू के काटते ही उसके लार में मौजूद एक खतरनाक जीवाणु रिक्टशिया सुसुगामुशी मनुष्य के रक्त में फैल जाता है. पिस्सुओं के काटने से होने वाली इस बीमारी में भी डेंगू की तरह प्लेटलेट्स की संख्या घटने लगती है. इसकी वजह से शरीर के कई अंगों में संक्रमण फैलने लगता है. शहरों में कई लोग जानवर पालते हैं. कई लोग पशुपालन से जुड़े हैं. इस कारण मनुष्यों में इस बीमारी का फैलाव बढ़ता है. इस साल बारिश भी ज्यादा हुई, इस कारण भी स्क्रब टाइफस ज्यादा बढ़ा है. 

अनदेखी कहीं भारी नहीं पड़ जाए?
चिकित्सा विभाग डेंगू रोकथाम को लेकर अभियान चलाता रहा, इधर स्क्रब टाइफस बीमारी ने शहर में साइलेंट मोड़ पर पैर पसार लिए. विभाग द्वारा मौसमी बीमारियों की रोकथाम को लेकर चलाए गए अभियान में डेंगू पर नियंत्रण में जरूर सफलता हासिल की लेकिन स्क्रब टाइफस की रोकथाम को लेकर अलग से कोई भी अभियान नहीं चलाया, न ही पशुपालन किए जाने वाले क्षेत्रों में स्क्रीनिंग की. विभाग की इसी अनदेखी के चलते शहरी इलाकों में स्क्रब टाइफस के रोगी बढ़े. हां, विभाग द्वारा स्क्रब टाइफस पॉजिटिव मरीज मिलने पर जरूर आसपास के घरों का सर्वे करवाया गया. 

क्या हैं लक्षण?
पिस्सू के काटने के दो हफ्ते के अंदर मरीज को तेज बुखार, सिरदर्द, खांसी, मांसपेशियों में दर्द और शरीर में कमजोरी आने लगती है.  इसका समय रहते इलाज न हो तो रोग गंभीर होकर निमोनिया का रूप ले सकता है. कुछ मरीजों में लिवर और किडनी ठीक से काम नहीं कर पाते, जिससे वह बेहोशी की हालत में चला जाता है. रोग की गंभीरता के अनुरूप प्लेटलेट्स की संख्या भी कम होने लगती है.