राजस्थान: लुप्त होने की कगार पर रावठे की धुन पर लोकगीत सुनाने वाला भोपा समाज

हाड़ौती क्षेत्र में इस जाति समाज के हजारों लोगों ने अपना रोजगार का संसाधन परिवर्तित कर दिया. कुछ चुनिंदा परिवार ही इस कला को अभी भी संजोए हुए हैं

राजस्थान: लुप्त होने की कगार पर रावठे की धुन पर लोकगीत सुनाने वाला भोपा समाज
प्रतीकात्मक तस्वीर

बारां: राजस्थान के बारां में आधुनिकता की चकाचैंध में लोग प्रचीन संस्कृतियों को बिसर रहे हैं तो लोक कलाकार इस भारतीय सांस्कृतिक धरोहर को बचाने का जतन कर रहे हैं. परिवार का पालन करने के लिए रावठे की मधुर धुन पर लोक गीत भजनों की स्वर लहरिया बिखेरने वाले कलाकार (भोपा समाज के लोग) भी अब बेरोजगारी की चपेट में आ रहे हैं. इसके साथ ही लोकानुरंजन की विरासत भी अब लुप्त होने के कगार पर पहुंच रही है. रावठे पर लोक गीत सुनाकर पेट पालन करने वाले भोपे भी अब यदा-कदा ही नजर आते हैं लेकिन राजस्थान के हाड़ौती के बारां जिले के सीसवाली क्षेत्र निवासी भोपा ओमप्रकाश इस कला के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं. इसमें उसकी पत्नी भी भरपूर सहयोग कर रही है.

सैकड़ों वर्षो से पीढ़ी दर पीढ़ी भोपा जाति समाज के लोग रावठें पर भजन और गीत सुना कर लोगों का मनोरंजन किया करते थे. यह लोग गांव, गांव घूमकर भजन सुनाया करते थे और उससे मिलने वाली बक्शीश से अपने परिवार का पालन पोषण किया करते थे. समय के साथ साथ टीवी रेडियो अन्य संसाधनों ने इनकी इस कला को काफी नीचे धकेल दिया. गांव में जहां कभी चबूतरों और चैपालों पर इनको बैठा कर लोग भजन सुना करते थे, गीत सुना करते थे. आज वह दृश्य सिर्फ स्मृतियों में ही शेष बसते हैं. इस अवस्था के चलते इस जाति समाज के लोगों ने भी धीरे-धीरे अपने परिवार के पालन-पोषण व रोजगार उदर पूर्ति के संसाधन परिवर्तित कर दिए हैं.

हाड़ौती क्षेत्र में इस जाति समाज के हजारों लोगों ने अपना रोजगार का संसाधन परिवर्तित कर दिया. कुछ चुनिंदा परिवार ही इस कला को अभी भी संजोए हुए हैं. बारां जिले के सीसवाली क्षेत्र निवासी ओम प्रकाश भोपा ने पीड़ा बयां करते हुए कहा कि उनका परिवार पीढियों से लोक संगीत को परम्परागत अपने कार्य करते आ रहे थे. जिससे हमारे परिवार का पालन पोषण होता था लेकिन अब इनके सुनने वाले नहीं रहे. जिसके चलते उसने भी अपने पिता से विरासत मे मिली इस कला को छोड़कर मेहनत मजदूरी के अन्य कार्य कर उधर पूर्ति का संसाधन जुटाना शुरू कर दिया. उसने बताया कि उसने थोड़ी सी जमीन मुनाफा काश्त पर जोकर परिवार की हालात को सुधारने के लिए प्रयास किया.

हालांकि, उसमें घाटा लग जाने के कारण उसे वापस अपनी पैतृक कला का ही सहारा मिला. इसी से अब वह अपना घर परिवार चला रहा है. उसने बताया कि वह और उसकी पत्नी इटावा और मांगरोल और बारां क्षेत्र में घ-घर जाकर बाबा रामदेव के भजन और गीत सुनाते हैं. उससे जो भी मिलता है, उससे गुजर-बसर कर रहे हैं.

हालांकि, उसने यह भी बताया कि सरकार से उन्हें उज्जवला योजना के तहत गैस कनेक्शन मिला. वही प्रधानमंत्रीं आवास योजना के तहत मकान भी उसने बनवा लिया लेकिन रोजगार के अभाव में उसकी हालात खराब है.