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राजस्थान: छात्रावास में नहीं मिल रही छात्रों को सुविधाएं, कराया जाता है झाड़ू-पोछा

छात्रावास में बच्चों के भोजन की व्यवस्था तो और भी खराब है. छात्रों के लिए मीनू के अनुसार प्रत्येक दिन नाश्ते में पोहा और दूध आदि देना चाहिए. लेकिन यह सब बच्चों को कभी-कभार ही मिल पाता है.

राजस्थान: छात्रावास में नहीं मिल रही छात्रों को सुविधाएं, कराया जाता है झाड़ू-पोछा

अमित यादवजयपुर: राजस्थान की राजधानी जयपुर के दूदू के राजकीय अम्बेडकर छात्रावास में विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, वातावरण मुहैया कराने के लिए छात्रावासों का प्रबंध किया गया है. जिसमें रहकर छात्र अच्छे से पढ़ लिख सकें. जिस पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं लेकिन स्थानीय अधिकारियों की मनमानी के चलते छात्रावास में रह रही छात्राओं को इन योजनाओं और सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है. यहां मासूमों के हाथों में पेन कॉपी किताब की जगह मजदूरी की आंच थमा दी गई है और इन बच्चों से बड़े एक हाली जे सा काम कराया जा रहा है.

यहां पेयजल की उचित व्यवस्था नहीं है और न ही छात्रों को अपने कक्षों में पानी भर कर रखने के लिए कोई बर्तन उपलब्ध करवाए गए हैं. ऐसे में छात्र रात के समय 2 किलोमीटर दूर से पानी लाकर पीने के लिए मजबूर हैं. छात्रावास में सफाई की भी बेहद कमी है और महिनों से छात्रों की बेडशीट तक साफ नहीं की गई है. ऐसे में बच्चे गंदे बिस्तरों पर सोने के लिए मजबूर हैं.

छात्रावास में बच्चों के भोजन की व्यवस्था तो और भी खराब है. छात्रों के लिए मीनू के अनुसार प्रत्येक दिन नाश्ते में पोहा और दूध आदि देना चाहिए. लेकिन यह सब बच्चों को कभी-कभार ही मिल पाता है. जिनमे से फल तो साल भर में कभी नजर ही नही आते हैं. जली हुई रोटियां और पानी जैसी पतली सब्जी से ही छात्रों को पेट भरना होता है. नियम के अनुसार बच्चों को मिठाई और फल भी देना अनिवार्य है लेकिन यह भी बच्चों की थाली से गायब ही रहता है.

छात्रवास परिसर में नियमानुसार कोई भी पशु नहीं रख सकता लेकिन यहां वॉर्डन को किसी अधिकारियों डर ना ही किसी अफसर का डर. वॉर्डन ने खेल मैदान पर भैसे के लिए ज्वार ओर रंजका बोह रखा है और भैसे की देखभाल के लिए बच्चों से काम करवाता है. चाहे गोबर हो, चारा पानी, या झाड़ू हो अन्य काम बच्चों से करवाया जाता है. यही नहीं जब बच्छे इस बात का विरोध करते है तो उन्हें गालियां दी जाती हैं और तो और उन्हें हॉस्टल से बाहर का रास्ता तक दिखा दिया जाता है.

मामले पर जब जिले के आला अधिकारियों से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मामला अभी संज्ञान में आया है. इस पर जल्द ही टीम बनाकर जांच की जाएगी. जो भी दोषी पाया जाएगा उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी. वॉर्डन का खौफ बच्चों में इतना है कि मीडिया के सामने बच्चे चाहकर भी कुछ नहीं बोल पा रहे थे. मजबूरी है कि इन्हें अपना घर-द्वार, मां-बाप, परिवार छोड़ छात्रावास में जो रहना है. यहां कहावत भी चरितार्थ होती है कि तालाब में रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं लिया जाता और यही आलम यहां इन बच्चों का भी है. अब देखना होगा कि क्या आला अधिकारी इन बच्चों की आवाज को सुन पाएंगे या ये बच्चे ऐसी ही जिंदगी जीते रहेंगे.