इकोलॉजिकल सिस्टम मजबूत बनाने के लिए हल्द्वानी में हो रहा इस जापानी तकनीक का इस्तेमाल

मियावाकी टेक्नोलॉजी एक जापानी तकनीक है, इस तकनीक में छोटे पौधों से लेकर बड़े पौधे एक ही प्लॉट में रोपित किए जाते हैं, 

इकोलॉजिकल सिस्टम मजबूत बनाने के लिए हल्द्वानी में हो रहा इस जापानी तकनीक का इस्तेमाल
पीपल पड़ाव स्थित नर्सरी में मियावाकी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल

हल्द्वानी: पहाड़ों पर इकोलॉजिकल सिस्टम को मजबूत बनाने के लिए हल्द्वानी वन अनुसंधान केंद्र अब मियावाकी का इस्तेमाल कर रहा है. उम्मीद है कि आने वाले दिनों में अगर मियावाकी तकनीक के परिणाम सही आए तो पहाड़ी और मैदानी इलाकों में किसान भी पौधारोपण में इस तकनीक का इस्तेमाल कर सकेंगे. जिससे आपदा या भूकंप जैसी स्थितियों में छोटे और बड़े पौधों को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा.

क्या है मियावाकी टेक्नोलॉजी
मियावाकी टेक्नोलॉजी एक जापानी तकनीक है, जो जापान के वैज्ञानिक मियावाकी द्वारा तैयार की गई थी. इस तकनीक में छोटे पौधों से लेकर बड़े पौधे एक ही प्लॉट में रोपित किए जाते हैं और उसके बाद ऊपर से पुआल डाल दी जाती है. जिससे, ओंस या एसिड रेन से पौधों को कोई नुकसान नहीं पहुंचता. जैसे-जैसे पौधे बड़े होते जाते हैं पूरी नर्सरी एक परिवार के रूप में विकसित होती है. कोई सबसे छोटा पौधा होता है, तो कोई सबसे बड़ा. जो एक परिवार के रूप में सामने आती है. यानी, अगर कभी आपदा जैसी स्थिति आती है तो बड़ा पौधा अपने से छोटे पौधे का बचाव कर लेता है. यानी जमीनी स्तर पर सारे पौधों की जड़ें इतनी मजबूत हो जाती हैं कि एक सीमित अवस्था तक किसी पौधे को नुकसान नहीं पहुंचता. 

बता दें कि मियावाकी एक जापानी वैज्ञानिक थे. उन्होंने जापान में रहकर वनस्पतियों पर शोध किया तो पता चला कि भूकंप और आपदा से वहां की वनस्पतियों को काफी नुकसान हो रहा है. लिहाजा, उन्होंने इस तकनीक का प्रयोग वनस्पतियों पर किया, जो भूकंप जैसी आपदा में भी वनस्पतियों को बचाने में काफी हद तक सफल रहा.

पीपल पड़ाव स्थित नर्सरी में मियावाकी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल
हल्द्वानी वन अनुसंधान केंद्र ने 60 प्रजातियों के चार प्रकार के करीब 720 पौधे इस तकनीक के जरिए लगाए हैं. जिन पर शोध कार्य चल रहा है. उम्मीद है कि इस तकनीक के जरिए हो रहे शोध से नए परिणाम सामने आएंगे, जो आने वाले दिनों में आपदाग्रस्त क्षेत्रों में कारगर साबित होंगे. विशेषज्ञों के मुताबिक ये तकनीक उन जगहों के लिए बेहतर साबित हो सकती है जहां पेड़ पौधे कम उग पाते हैं. लेकिन, कभी-कभी ऐसा होता है कि एक पौधे की आड़ में दूसरा पौधा जल्दी विकसित हो जाता है. क्योंकि ये तकनीक पूरे इकोलॉजिकल सिस्टम पर निर्भर करती है. लिहाजा इस तकनीक पर काम किया जाना आने वाले दिनों में बेहतर साबित हो सकता है.