सोनभद्रः दो दशक से हो रहा है आदिवासियों को भारतीय संस्कृति से जोड़ने का काम

सोनभद्र में  पिछले दो दशकों से सोनभद्र जैसे अति पिछड़े जिले में कला संस्कृति और शिक्षा के माध्यम से आदिवासी एवं ग्रामीण समुदाय को भारतीय संस्कृति से जोड़ रहा है.

सोनभद्रः दो दशक से हो रहा है आदिवासियों को भारतीय संस्कृति से जोड़ने का काम
सोनभद्र के अचलेश्वर महादेव मंदिर में कार्यक्रम.

सोनभद्रः प्राचीन काल में मंदिर सिर्फ पूजा-पाठ तक ही सीमित नही होते थें, बल्कि कला, संस्कृति और शिक्षा के केंद्र भी हुआ करते थे. लेकिन वर्तमान में मंदिरों से यह परंपरा धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है. मंदिरों की इसी परंपरा को पुनर्जीवित कर रहा है उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के डाला में स्थित श्री अचलेश्वर महादेव मंदिर. यह मंदिर पिछले दो दशकों से सोनभद्र जैसे अति पिछड़े जिले में कला संस्कृति और शिक्षा के माध्यम से आदिवासी एवं ग्रामीण समुदाय को भारतीय संस्कृति से जोड़ रहा है. इसी क्रम में प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी मंदिर ने शिवरात्रि महोत्सव को संगीत-साहित्य उत्सव के साथ मनाया गया. 

इस बार साहित्य उत्सव को सोनभद्र पर केंद्रित करते हुए "सोनभद्र की कला चेतना" विषय पर व्याख्यान हुआ. साहित्यकार भोलानाथ मिश्र ने सोनभद्र की धीरे-धीरे विलुप्त होती आदिवासी परंपरा पर चिंता व्यक्त की उन्होने कहा कि सोनभद्र के बारे में स्थानीय साहित्यकारों ने बहुत लिखा है, इसलिये जो लिखा जा चुका है उसे बताना उतना जरूरी नही है लेकिन जो नही लिखा जा सका उसे बताना है. 

उन्होंने आदिवासी कलाओं को लोक गीतों के माध्यम से प्रस्तुत किया. लेखक और पत्रकार मिथिलेश द्विवेदी ने कहा कि हमारे यहाँ की कलाये विलुप्त हो रही है लेकिन लोग उसके बारे में जागरूक नही हैं. सरकारें उसे संरक्षित करती हैं अपनी राजनीति के लिये लेकिन समाज उसे संरक्षित करता है अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिये. 

लेखक और समाजसेवी रामनाथ शिवेंद्र ने कहा कि हमें चिंतन करना चाहिये कि हो क्या रहा है? खंडित समाज को जोड़ने की जरूरत है. हमारे समाज से लोक् विद्या हट गई है. लोकविद्या से हटने की वजह से हम असंगठित हुए हैं. इसी समाज में रहते हुए बच्चे बहुत सारी चीजें सीखते हैं. आदिवासी समाज तो इस लोक विद्या का सबसे अच्छा उदाहरण है, जहां बहुत सारी कलाएं बच्चों को सीखानी नहीं पड़ती, बल्कि वो उनकी जिंदगी में अपने-आप शामिल रहती है. 

इस मौके पर संगीत उत्सव के अंतर्गत ध्रुपद रजनी का आयोजन किया गया. इस बार ध्रुपद रजनी में प्रयाग से आये संगीत नाटक अकादमी 'युवा' पुरस्कार प्राप्त विशाल जैन ने प्रस्तुति दी. अपने गायन का आरम्भ राग बागेश्वरी -डागुर-परंपरावाणी में आलाप, जोड़, झाला से किया. सदानन्द का पद आदि महादेव देव बीन बजाई एवं दोनों करतार तुम राज साज के बंदिशें गाई, जिसे सुनकर श्रोतागण अभिभूत हो गये. राग मालकौंस में शिव स्तुति शंकर गिरिजापति गाकर शिव को समर्पित किया.