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जलवायु परिवर्तन के कारण विफल हो सकता है भारतीय मानसून

वातावरण में व्यापक मानवीय हस्तक्षेप से उत्पन्न ग्लोबल वार्मिंग अगले 200 वर्षों में भारतीय मानसून को विफल कर सकता है और ऐसा होने पर खाद्य आपूर्ति को गंभीर संकट पैदा हो सकता है। एक नए अध्ययन में यह चेतावनी दी गई है।

ज़ी न्यूज ब्यूरो/एजेंसी
ओस्लो : वातावरण में व्यापक मानवीय हस्तक्षेप से उत्पन्न ग्लोबल वार्मिंग अगले 200 वर्षों में भारतीय मानसून को विफल कर सकता है और ऐसा होने पर खाद्य आपूर्ति को गंभीर संकट पैदा हो सकता है। एक नए अध्ययन में यह चेतावनी दी गई है।
अध्ययन में कहा गया है कि जीवाश्म ईंधनों के जलने एवं उष्णकटिबंधीय वायु प्रवाह से संबंधित बदलाव जैसी व्यापक मानव गतिविधियों ने जलवायु परिवर्तन पर काफी असर डाला है और इससे 2150 और 2200 के बीच प्रत्येक पांच साल पर मानसून विफल हो सकता है।
कृषि पर आधारित समाज होने के नाते भारत पूरी तरह से मानसून पर निर्भर है। भारत में मानसून की बारिश जून से सितम्बर महीने तक होती है। वर्ष 2009 में भारत के बड़े भूभाग को सूखे का सामना करना पड़ा और चीनी का आयात करना पड़ा था। सूखे के ही कारण वैश्विक स्तर पर खाद्यान्न की कीमतें 30 साल के ऊंचे स्तर पर पहुंच गईं।
अनुसंधानकर्ताओं ने सामान्य स्तर से नीचे हुई बारिश (40-70% के बीच) को मानसून की ‘विफलता’ के रूप में देखा है। अनुसंधानकर्ताओं के मुताबिक भारतीय मौसम विज्ञान विभाग द्वारा 1870 से जुटाए गए आंकड़ों में किसी भी वर्ष मानसून में इतनी कमी नहीं पाई गई है।
एक समाचार एजेंसी ने ‘पोट्सडैम इंस्टीट्यूट फार क्लाइमेट इम्पेक्ट रिसर्च’ में लेखकों में से एक और जलवायु प्रणाली के प्रोफेसर एंडर्स लीवरमैन के हवाले से बताया, तापमान के बढ़ने पर ‘मानसून की विफलता अक्सर बढ़ जाती है।’
उन्होंने कहा,‘पिछली सदी में भारतीय मानसून काफी स्थिर रहा है। यहां पहले से ही संकट है क्योंकि यहां औसत से 10 प्रतिशत कम बारिश हो रही है।’
यह अध्ययन ‘इन्वायरमेंटल रिसर्च लेटर्स’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।