"मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना" इस पंक्ति को भूल गए हैं बीएचयू के छात्र

विश्वविद्यालयों में आपने अब तक यह सुना होगा कि छात्र पाखंड और कुरीतियों के विरूद्ध खड़े हुए हों. लेकिन कभी ऐसा भी हो कि छात्र खुद ही रूढ़ीवादी मानसिकता के हो जाएं और गुरूजी को ही यह कह कर रिजेक्ट कर दें कि यह तो फलां संप्रदाय से हैं, हम इनसे संस्कृत जैसा विषय कैसे पढ़ सकते हैं, जिसमें हमारे धर्म-ग्रंथ लिखे हुए हैं.  

"मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना" इस पंक्ति को भूल गए हैं बीएचयू के छात्र

नई दिल्ली: महामना मदन मोहन मालवीय की बनाई बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में छात्रों ने यह कह कर वर्ग लेने से मना कर दिया कि संस्कृत के शिक्षक मुस्लिम हैं. छात्रों के यह हरकत बस यहीं बयां कर रही है कि शिक्षा-विक्षा होती रहेगी लेकिन पवित्रता और धर्म जिसका शायद वह मतलब भी जानते हैं या नहीं, उसको बचाना पहले जरूरी है. 21वीं शताब्दी का भारत विविधता से भरा भारत है. अब का भारत अध्यात्म को भी तब मानता है जब वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उसे तर्क के साथ साबित किया जाए. आज का भारत इस बात पर बल देता है कि शिक्षा पर हर उस व्यक्ति का हक है और इसका प्रचार-प्रसार करना असल धर्म. संप्रदाय, जात-पात, वर्ग से इतर बस कुछ मायने रखता है तो वह है हासिल करना.

बीएचयू में मुस्लिम प्रोफेसर से अभद्र व्यवहार

दरअसल, बीएचयू में जिस मु्स्लिम प्रोफेसर के साथ यह अभद्रता वाला व्यवहार किया गया, वह संस्कृत के विद्वानों में से एक हैं. भारत में संस्कृत से पूरे विषयों का उदभव माना जाता है और डॉ फिरोज खान उसी संस्कृत विषय के प्रचार-प्रसार के लिए देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में कार्यरत हैं. डॉ फिरोज को संस्कृत के इंटरव्यू में 10 में से पूरे 10 स्कोर मिले थे. आपको इस बात की जानकारी जरूर होनी चाहिए कि 7-8 के बीच का स्कोर काफी अच्छा माना जाता है. अब इस बात का अंदाजा लगा लीजिए कि जिस प्रोफेसर से संस्कृत पढ़ने को छात्रों ने हाय तौबा मचा दिया, उसके ज्ञान की क्या सीमा रही होगी.

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पढ़े-लिखे रूढ़िवादी लोग हैं छात्र

लेकिन, सच यह भी है कि इस निंदनीय घटना के पीछे चाहे जो भी तर्क दिया जा रहा हो, सच्चाई यह है कि अगर बीएचयू गुरूकूल भी होता तो इस तरह किसी विद्वान गुरू का अपमान करने की हिमाकत न होती. उन बेचारे छात्रों को तो यह भी नहीं पता कि जिस प्रोफेसर का वह अपमान कर रहे हैं, उसके परिवार में ही संस्कृत की संस्कृति का संचार होता है. धर्म के जिस रूढ़िवादी कल्पना में कैद हो कर वह बेचारे छात्र किसी विद्वान की उपेक्षा कर बैठे, उसका मतलब भी ठीक-ठीक उनको नहीं पता होगा शायद. बेचारे छात्र इसलिए कि वे अनजाने में या अगर जानबूझ कर जिस धर्म और पवित्रता की दुहाई देते हुए पढ़ने से मना कर विरोध किया, एक बार डॉ. फिरोज की पृष्ठभूमि जान लेते तो संभव था कि उनके दिमाग में भरी यह रूढ़िवादी सोच पैदा ही न हो सकती थी.

धर्म की दुहाई देने वाले मतलब भी नहीं जानते

डॉ. फिरोज के पिता भी संस्कृत भाषा के जानकार थे और तो और वे गौशाला की देखरेख के लिए भजन गा कर चंदे से अपना गुजारा करते थे. हाल ही में डॉ फिरोज को पद्म श्री सम्मान से नवाजा गया था. छात्रों ने उस सम्मान की भी कद्र नहीं की. पवित्रता और धर्म की जिस मर्यादा पर हाय-तौबा करते हुए विरोध किया, उसी धर्म की मर्यादा को ही भूल बैठे. धर्म का शाब्दिक अर्थ है धारण करना. यहां धारण करने का अर्थ अपने कर्म से है.
 
पाठ पढ़ा और भूल भी गए

खैर, बात यहां सिर्फ इतनी सी है कि बचपन के किताबों में जो एकता और समन्वय का पाठ पढ़ाया जाता रहा वह क्या किताबों तक ही रह गया ? "मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना" जैसी गीतों को बस मुंह से गा कर काम निकाल लिया गया और दिल में उतरने से पहले ही उसके मायने भुला दिए गए ?