न्याय दिलाने के मामले में महाराष्ट्र टॉप तो बिहार और उत्तरप्रदेश फिसड्डी राज्य

भारत में न्याया व्यवस्था और न्याय दिलाने को लेकर हमेशा सवाल उठाए जाते हैं. पिछले दिनों टाटा ट्रस्ट ने एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें लोगों को न्याय दिलाने के मामले में महाराष्ट्र ओवरऑल पहले स्थान पर रहा. छोटे राज्यों में गोवा ने कमाल का प्रदर्शन किया था. इस सूची में भी बदहाल ग्राफ के साथ बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य ही रहे. 

न्याय दिलाने के मामले में महाराष्ट्र टॉप तो बिहार और उत्तरप्रदेश फिसड्डी राज्य

नई दिल्ली: टाटा ट्रस्ट ने India Justice Report 2019 का प्रकाशन किया था. इस रिपोर्ट को दो भागों में बांटा गया था. पहले सेक्शन में बड़े और मध्यम राज्य थे और दूसरे सेक्शन में छोटे राज्य जिनकी जनसंख्या 1 करोड़ के आसपास या उससे कम थी. बड़े और मध्यम राज्यों की श्रेणी में महाराष्ट्र ने न्याय दिलाने के मामले में पहला स्थान हासिल किया. वहीं छोटे राज्यों में गोवा इस सूची में पहले पायदान पर है. और हर बार की तरह इस बार भी फिसड्डी राज्यों में बिहार और उत्तर प्रदेश ही हैं. 

पुलिसिया व्यवस्था और न्याय दिलाने में तामिलनाडु टॉप 

इस रिपोर्ट को 4 मुख्य बिंदुओं पर तैयार किया गया. पहला पुलिसिया व्यवस्था, दूसरा सक्षम न्यायपालिका, तीसरा कितनों को सजा और चौथा कानूनी मदद. इन सभी फैक्टर्स का आकलन अलग-अलग राज्यों के प्रदर्शन पर किया गया. पुलिसिया व्यवस्था में तामिलनाडु 10 के स्कोर में 6.49 पा कर पहले स्थान पर है, वहीं बड़े और मध्यम राज्यों की सूची में उत्तर प्रदेश सबसे अंतिम नंबर पर है जिसका स्कोर 2.98 है. बिहार में भी पुलिसिया व्यवस्था कुछ खास अच्छी नहीं. सूबे का स्कोर 3.77 है. न्याय व्यवस्था की बात करें तो इस सूची में भी तामिलनाडु पहले स्थान पर है जिसका स्कोर 6.99 है. पीड़ितों को न्याय दिलाने के मामले में बिहार फिसड़्डी राज्यों में सबसे नीचे है. बिहार का स्कोर 2.41 है, जबकि उत्तर प्रदेश का 3.7, कर्नाटक का 3.76, उत्तराखंड का 4.17 और झारखंड का 4.3 है. 

दोषियों को सजा दिलाने और कानूनी मदद में केरल अव्वल

इसके अलावा दोषियों को सजा दिलाने या दिए जाने के मामले में दक्षिण भारत का ही राज्य केरल टॉप परफार्मर है. केरल दोषियों को सजा दिलाने के मामले में 7.18 के स्कोर के साथ पहले स्थान पर है. वहीं झारखंड 3.46 के न्यूनतम स्कोर के साथ सबसे आखिरी पायदान पर है. फिसड्डी राज्यों में झारखंड से के बाद उत्तराखंड 3.72, पंजाब और आंध्र प्रदेश 4.35 और उत्तर प्रदेश 4.42 भी हैं. बात करें अगर राज्यों में न्याय दिलाने के लिहाज से कानूनी मदद की तो केरल इसमें भी 6.58 के स्कोर के साथ पहले पायदान पर है. जबकि सबसे खराब रैंकिग उत्तर प्रदेश की है. उत्तर प्रदेश के बाद बिहार, उत्तराखंड और ओडिशा का नंबर है. 

भारत में जजों की भी है काफी कमी

रिपोर्ट में उन चार प्रमुख बिंदुओं पर फोकस किया गया था जिसकी बदौलत किसी भी राज्य या क्षेत्र में न्याय व्यवस्था को बनाया जा सकता है. अभी कुछ ही दिनों पहले राष्ट्रीय अपराध अन्वेषण ब्यूरो की 2017 की रिपोर्ट आई थी. इस रिपोर्ट ने भी देश के बहुतेरे राज्यों की कानून व्यवस्था और महिला सशक्तिकरण के झूठे छलावे की पोल खोली थी. अब इस रिपोर्ट के बाद बिहार, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड और ओडिशा में अपराध और जंगलराज के छीटाकंशियों पर शायद ब्रेक लगे. इस रिपोर्ट से न सिर्फ व्यवस्था की पोल खुली है बल्कि न्याय के मंदिरों में भी जो कुछ कमियां हैं, वह भी सामने आईं हैं. रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक पूरे देश में कुल 18,200 जज हैं जबकि अब भी कुल 23 फीसदी पोस्ट पर रिक्तियां हैं हीं. 

भारत में महिला पुलिस मात्र 7 फीसदी

रिपोर्ट यह भी बताता है कि इन न्याय के स्तंभों में महिलाओं की मौजूदगी काफी कम है और इसे कमजोर भी कर रही है. इसी रिपोर्ट में यह मालूम चल सका कि भारत में महिला पुलिसकर्मियों की संख्या कुल पुलिसकर्मियों की 7 फीसदी ही है. ज्यादातर जेल ठूंस-ठूंस कर भरे गए हैं. कई केसों में अब तक सिर्फ जांच और पूछताछ ही चल रही है और बजट की समस्या तो लगभग सभी स्तंभों के साथ है. ज्यादातर राज्यों ने तो केंद्र सरकार की दी हुई बजट को पूरी तरह से इस्तेमाल तक नहीं किया है. ऐसे में आधी-अधूरी व्यवस्थाओं के सहारे कितना अच्छा प्रदर्शन हो सकेगा न्याय दिलाने के मामले में, यह आप खुद भी समझ सकते हैं. यह रिपोर्ट टाटा ट्रस्ट के साथ समाजिक न्याय केंद्र, कॉमनवेल्थ मानवाधिकार पहल, दक्ष, टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस और कानूनी नीतियों का निर्धारण करने वाले विधि केंद्रों के तत्वावधान में किया गया.