सरकार बनाने की देरी से शिवसेना में फूट, अब क्या करेंगे ठाकरे ?

महाराष्ट्र का सियासी समीकरण पल-पल बदलता जा रहा है. कभी पार्टियों के बीच की तनातनी तो कभी सीट बंटवारे को लेकर तालमेल की कमी, कभी मुख्यमंत्री पद को लेकर जिद तो अब विधायकों की किसी पार्टी से गठबंधन को लेकर नाराजगी. इन सभी मामलों पर सरकार अब तक अधर में लटकी है. अब संकेत यह भी मिलने लगे हैं कि हंग असेंबली की यह तस्वीर अब और लंबे समय तक खींच सकती है. 

सरकार बनाने की देरी से शिवसेना में फूट, अब क्या करेंगे ठाकरे ?

मुबंई: इस पूरे खेल का रिंगमास्टर बनने की चाह रखने वाली शिवसेना के विधायकों ने ही पार्टी को विचारधारा से परे गठबंधन न करने की चेतावनी दे डाली है. राजनीतिक हलकों में ऐसी खबर है कि एनसीपी और कांग्रेस से शिवसेना का गठबंधन कर लेने की सूरत में 17 विधायक पार्टी से रिश्ता तोड़ सकते हैं.

मातोश्री डील करने पहुंचे 17 विधायक

महाराष्ट्र की राजनीति में बवाल कहीं कर्नाटक के पुराने खेल पर ला कर ना छोड़ दे. इसका सबसे ज्यादा डर शिवसेना को सता रहा है. शिवसेना नेता मनोहर जोशी ने पहले 17 विधायकों से बातचीत कर मामले को सुलझाने की कोशिश की. पानी जब सर के ऊपर से गुजरने को हुआ तब उन्होंने सभी 17 नाराज विधायकों संग मातोश्री को कूच करने का फैसला किया. मातोश्री जाने का मतलब कि अब शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे सभी 17 विधायकों के खुलेआम बगावत कर देने से पहले उन्हें शांत करने का फॉर्मूला ढूंढ निकालेंगे. हालांकि ऐसा लगता नहीं कि शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस के गठबंधन के बैनर तले यह विधायक अपना भविष्य और पार्टी की राजनीतिक विचारधारा से समझौता करने को राजी होंगे.

हिंदु्त्व विचारधारा से कोई समझौता नहीं करना चाहते विधायक

दरअसल, शिवसेना के बागी बनते जा रहे विधायकों का कहना है कि पार्टी अपने हिंदुत्व के विचारधारा से सत्ता पर काबिज होने के लिए समझौता नहीं कर सकती. कांग्रेस और एनसीपी दोनों ही दल शिवसेना से राजनीतिक विचारधारा और हिंदु्त्व को लेकर काफी अलग हैं. यहां तक कि प्रदेश में चुनाव के दौरान भी शिवसेना हिंदुत्व के मुद्दे पर चुनाव लड़ी थी. बताया जा रहा है कि पार्टी के सभी 17 विधायक पश्चिमी महाराष्ट्र से या फिर मराठावाड़ा क्षेत्र से हैं. इनमें से ज्यादातर भाजपा के साथ शिवसेना के गठबंधन से काफी खुश थे. लेकिन पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने जब भाजपा को छोड़ कांग्रेस-एनसीपी से गठबंधन करने का फैसला किया तो इन विधायकों को हिंदुत्व की विचारधारा को खतरा लगने लगा. लेकिन इसके अलावा भी एक सिरा ऐसा है जो एनसीपी प्रमुख शरद पवार के बयान तक पहुंचता है. 

शरद पवार के राजनीतिक खेल से परेशान हैं विधायक

सूत्रों के हवाले से खबर आ रही है कि शिवसेना विधायक अपने पार्टी सुप्रीमो से पूछ रहे है कि जब कांग्रेस-एनसीपी शिवसेना की गठबंधन को लेकर बातचीत चल रही है तो शरद पवार ऐसा क्यों कह रहे है कि गठबंधन को लेकर कोई बातचीत नही चल रही है? पवार क्यों खुलकर नहीं बोल रहे हैं? क्या पवार कोई चाल तो नही चल रहे हैं? कांग्रेस-एनसीपी शिवसेना को  समर्थन देने मे क्यो समय लगा रही है, जबकि कॉमन मिनिमम प्रोग्राम को लेकर चर्चा आखिरी चरण में है? आखिर गठबंधन को लेकर इतना ज्यादा कन्फ्यूजन क्यों है? 

दो धड़ों में बंट गई है शिवसेना 

झगड़े की वजह ये थी कि विधायकों का एक गुट कांग्रेस-एनसीपी से गठबंधन का पक्षधर था, वहीं दूसरा गुट इसका विरोध कर रहा था. विरोध करनेवाले विधायकों का कहना था कि जिस कांग्रेस एनसीपी के विरोध में जनता ने उन्हें चुनकर भेजा है, वह उनका ही समर्थन कैसे कर सकते हैं. ऐसे में वे जनता को क्या जवाब देंगे? शिवसेना के विधायकों ने अपने प्रमुख उद्धव ठाकरे से ये विनती भी की है कि अब वह कहीं भी बैठक करने के लिए नहीं जाएं. जब बात फाइनल हो जाए तभी किसी बैठक के लिए निकलें.

ऐसे में अब यह देखना है कि क्या महाराष्ट्र की सियासी हलचल गाहे-बगाहे ही सही लेकिन कर्नाटक में जो हुआ, उस ओर रूख कर रही है ? एक सवाल यह भी है कि अगर शिवसेना के विधायकों को एनसीपी और कांग्रेस के साथ गठबंधन में दिक्कत थी तो शुरुआती दिनों में ही बगावत क्यों नहीं किया ?