शिवलिंग का वास्तविक अर्थ वह नहीं जो आप समझते हैं!

शिवलिंग का अवास्तविक अर्थ जहां भ्रमित करने वाला है, वहीं इसका वास्तविक अर्थ मार्गर्शन करता है..  

शिवलिंग का वास्तविक अर्थ वह नहीं जो आप समझते हैं!

बनारस. धर्मविरोधी कुछ लोग शिव पूजा के विरोधी हैं. वे शिवलिंग की पूजा की निंदा करते हैं और अज्ञानी लोगों के बीच यह प्रचारित करते हैं कि हिन्दू लोग लिंग और योनी की पूजा करते है, दरअसल यह न केवल उनकी सोच का दोष है बल्कि भाषा की अज्ञानता का दोष भी है. हिंदी तो लोगों को समझ में आती है पर आदिकाल से चले आ रहे सनातन धर्म की जड़ें संस्कृत भाषा से जुडी हैं. इन लोगों को संस्कृत का ज्ञान नहीं होना ही सारी समस्या को जन्म देता है चाहे वह समस्या लक्ष करके पैदा की गई हो या अपनेआप हुई हो.

शिव-लिंग का संस्कृत में अर्थ देखिये 

शिव लिंग शब्द का अर्थ जानना सबसे पहले ज़रूरी है. संस्कृत भाषा में जाएँ और लिंग का अर्थ देखें तो इसका अर्थ चिन्ह या प्रतीक होता है. जिस लिंग का अर्थ अज्ञानियों को समझ में आता है वह पुरुष की जननेंद्रिय है जिसे संस्कृत मे शिश्न कहा जाता है. लिंग शब्द पुरुष जननेन्द्रिय से जुड़ा होता तो हमारे दक्षिणभारतीय भाइयों के सरनेम में लिंग शब्द की आवृत्ति देखने में नहीं आती, जैसे कि लिंगास्वामी, ,रामलिंगम, नागलिंगम, इत्यादि.

लिंग का अर्थ पुरुष या नारी होने का संकेत 

इस बात को आप हिंदी में भी सीधे ही समझ सकते हैं. ट्रेन में आरक्षण का फ़ार्म या नौकरी में आवेदन पत्र भरते समय आप और हम लिंग नामक एक कालम से अक्सर रूबरू होते हैं. अगर इसमें कोई आपत्तिजनक या अश्लील बात होती तो हम इसमें पुरूष या स्त्री क्यूं लिखते? दरअसल यह प्रतीक केलिए रूढ़ शब्द है, शरीर के किसी अंग को लक्षित करने के लिए नहीं!

वास्तविक अर्थ जननेन्द्रिय से जुड़ा नहीं है 

अब बात करते हैं शिवलिंग शब्द की. शिवलिंग का अर्थ इस तरह होता है शिव का प्रतीक. बिलकुल ठीक ऐसे ही हिंदी व्याकरण में में पुर्लिंग कर अर्थ हो जाता है पुरुष का प्रतीक और स्त्रीलिंग का अर्थ होता है स्त्री का प्रतीक. यहां नपुंसक लिंग भी प्रयोग में आता है जिसका अर्थ नपुंसक के प्रतीक से चिन्हित होता है. अतएव लिंग शब्द को सीधे सीधे न देख कर इसके वास्तविक अर्थ को देखना चाहिए जो कि संस्कृत में प्रतीक या चिन्ह को दर्शित करता है, जननेन्द्रिय को नहीं!

शिवलिंग शब्द में शिव का अनंत अस्तित्व अन्तर्निहित है 

”शिवलिंग” शब्द बहुत गहरा है. इसमें शिव के अनंत अस्तित्व की परिभाषा दर्शित है. शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से शिव लिंग शब्द को प्रयोग में लाया जाता है. यदि स्कन्दपुराण में देखें तो वहां स्पष्ट किया गया है कि आकाश स्वयं ही लिंग है. शिवलिंग वह धुरी है जिस पर वातावरण सहित घूमती हमारी धरती और समस्त ब्रह्माण्ड टिका है. शिवलिंग का एक पर्याय अनन्त भी होता है अर्थात जिसका कोई आदि या अन्त न हो.

शिव-पार्वती अनादि एकल रूप हैं 

शिवलिंग शब्द में भगवान शिव और देवी शक्ति अर्थात मां पार्वती के आदि-आनादी एकल रूप का चित्रण भी है. इसमें पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतीक भी जिसे ऐसे कह सकते हैं कि इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है बल्कि दोनों का ही समान अस्तित्व है. आइये अब बात कर लेते हैं इसके समानांतर शब्द योनि की. यदि आप हिन्दू धार्मिक ग्रंथ पढ़ें तो आपको योनि का अर्थ स्पष्ट हो जाएगा. योनि  मनुष्य या प्राणी के जन्म से जुडी हुई है न कि किसी स्त्री के स्त्रीत्व से. कहा जाता है मानव योनि हज़ारों जन्मों के बाद हासिल होती है..या ये भी कहा जाता है कि बुरे कर्म करने से पशुयोनि में जन्म लेना पड़ता है, आदि..सुस्पष्ट है कि योनि का अर्थ संस्कृत में प्रादुर्भाव, प्रकटीकरण आदि होता है. प्राणी को उसके कर्मों के अनुसार विभिन्न योनियों में अगला जन्म प्राप्त होता है.

समस्या मूलतः भाषा के अज्ञान की है 

अतएव समस्या भाषा न जानने की है, लिंग या योनि शब्द को समझ पाने में असफलता की नहीं. हम सभी जानते हैं कि हिन्दू धर्म मे 84 लाख योनियाँ अर्थात 84 लाख प्रकार के जन्म होते हैं. अब तो मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, कृमि, वृक्ष, आदि 84 लाख प्रकार के जीवन का अस्तित्व भी मान लिया गया है. अतः साफ़ है कि मनुष्य योनी में दोनों ही सम्मिलित हैं पुरुष भी और स्त्री भी. पुरुष और स्त्री दोनों ही मानव योनि में जन्मे हैं. सिर्फ पुरुष या सिर्फ स्त्री के लिए मनुष्य योनि शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता है.

शिवलिंग का मूलार्थ दिव्यता का द्योतक है 

अतः लिंग का मूल अर्थ प्रतीक चिन्ह है. शिवलिंग इस तरह पवित्रता का प्रतीक है. इसकी प्रारम्भि हठयोगियों के द्वारा हुई. उन्हें हवन के समय ध्यान लगाने के लिए वे दीपक की प्रतिमा बनाते थे और तब ये हठ योगी दीपशिखा पर ध्यान लगाते हैं. चूंकि हवा में दीपक की ज्योति टिमटिमा जाती है और स्थिर ध्यान लगाने की प्रक्रिया में बाधा पहुँचती है इस कारण दीपक की प्रतिमा स्वरूप उसके विकल्प रूप में शिवलिंग तैयार किया गया ताकि अबाध एकाग्रचित्त ध्यान सम्पन्न हो सके. किन्तु मुगलिया दौर में कुछ दुर्बुद्धि या कहें विकृत मस्तिष्क के लोगों ने शिवलिंग और योनि शब्द में में जननांगों की कल्पना कर ली और हिन्दू धर्म विरोधी कुत्सित कहानियां बना डालीं और भोले-भाले हिन्दू इन शब्दों के पीछे के रहस्य को न समझ पाने के कारण भ्रमित हो गए. 

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