भारतीय लेखिका ने कश्मीर मामले पर अमेरिकी सदन में कर दी सबकी बोलती बंद

आपने अमेरिका के निचले सदन 'हाउस ऑफ रिप्रजेन्टेटिवस' में एक भारतीय लेखिका को कश्मीर मुद्दे पर गरजते देखा होगा. नहीं देखा तो अब देख लीजिए सोशल मीडिया में सुनंदा वशिष्ठ का यह वीडियो खूब वायरल हो रहा है जिसमें उन्होंने कश्मीर से अनुच्छेद 370 के हटाए जाने के खिलाफ बोलने वालों की जमकर धुनाई की है तर्क और टिप्पणियों के सहारे.   

भारतीय लेखिका ने कश्मीर मामले पर अमेरिकी सदन में कर दी सबकी बोलती बंद

नई दिल्ली: भाजपा आईटी सेल ने सुनंदा वशिष्ठ का वीडियो अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से शेयर किया है. इस वीडियो में सुनंदा वशिष्ठ ने कश्मीर मामले पर भारत सरकार के कदमों की आलोचना करने वालों को आड़े हाथों लिया. सुनंदा ने अमेरिकी निचली सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेन्टेटिव में अपनी बात रखते हुए कहा है कि "कश्मीर में मानवाधिकार की दुहाई देने से पहले अंतर्राष्ट्रीय समुदाय और पश्चिमी देशों का ध्यान घाटी में पहले जिस तरह की बर्बरता और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादी गतिविधियों पर जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि हम(भारत) कश्मीर में आतंकवाद से लड़ रहे हैं जिसका पोषण पाकिस्तान कर रहा है. घाटी में मौतों का बड़ा कारण पाक के ट्रेन किए गए आतंकियों के कारण हो रहा है जो वहां के लोगों का इस्तेमाल कर रहे हैं."

आतंकवाद के खिलाफ भारत का साथ दे दुनिया

सुनंदा वशिष्ठ ने भारतीय पक्ष की वकालत करते हुए सदन में अपील की और कहा कि "यह उपयुक्त समय है दुनिया के लिए वह भारत के साथ आतंकवाद को खत्म करने और कश्मीर में अराजकता के खिलाफ लड़ने में साथ दे. कट्टरपंथी इस्लामी आतंक से निपटने के लिए भारत की सहायता करनी ही होगी तभी मानवाधिकार का असल संरक्षण किया जा सकता है."  सुनंदा वशिष्ठ एक लेखिका भी हैं और राजनीतिक टिप्पणीकार भी. इसके साथ ही उन्होंने अपना परिचय घाटी में नस्लीय हिंसा का शिकार हुई कश्मीरी पंडितों के रूप में दिया. उन्होंने कहा कि " मुझे खुशी है कि वह इस तरह की सुनवाई हो रही है और मैं इसका हिस्सा हूं. क्योंकि जब मेरे परिवार के साथ कश्मीर में जो कुछ हुआ था जिसकी वजह से उन्हें अपनी जीवनशैली को छोड़ना पड़ा था तब उस वक्त दुनिया खामोश बैठी थी." उन्होंने सवाल पूछते हुए कहा कि "तब मानवाधिकार की वकालत करने वाली दुनिया या लोग कहां थे ?" 

कश्मीर में कभी नहीं हो सकेगा जनमत संग्रह

सुनंदा वशिष्ठ जिस परिषद में बोल रहीं थी, उसमें उनके अलावा और भी 5 लोग थे जिन्होंने इसी मुद्दे पर अपनी राय रखी थी. उनमें से एक के सवाल का जवाब देते हुए सुनंदा वशिष्ठ ने कहा कि "कश्मीर में कभी जनमत संग्रह हुआ ही नहीं और न अब होगा. क्योंकि जनमत संग्रह के लिए जरूरी है कि पूरा समूह एक फैसले पर सहमत हो. लेकिन कश्मीर का एक हिस्सा तो भारत के पास है तो दूसरा पाकिस्तान और एक हिस्सा तो चीन के पास भी. ऐसें में किस बिना पर जनमत संग्रह की बात की जा रही है. भारत कश्मीर पर कब्जा करने वाला देश नहीं है. कश्मीर तो भारत का एक अभिन्न अंग था हमेशा से. भारतीय सभ्यता की पहचान जो 70 साल देखी जा रही है, असल में वह 5000 साल पुरानी है." 

विपक्षी पैरोकार ने मानवाधिकार का राग अलपा 

पैनल में शामिल अन्य लोगों ने भी कश्मीर मामले पर अपने विचार रखे. अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग आयुक्त अरूणिमा भार्गवा ने कहा कि भारत की ओर से 5 अगस्त के बाद से ही कश्मीर में काफी पाबंदियां लगा दी गईं हैं जिससे आम जनजीवन भी प्रभावित हुआ है. मानवाधिकार की वकालत करने वाली सेहला अशाई कहती हैं कि भारत सरकार कश्मीर का दमन कर रही है. घाटी से अनुच्छेद 370 के हटाए जाने के बाद से वहां के लोग काफी प्रभावित हुए हैं. 

क्या है टॉम लैंटोस एचआर कमिशन ?

इसके अलावा भी वहां पहुंचे अन्य पैनलिस्टों ने कश्मीर के मसले पर अपने-अपने विचार रखे. इसका आयोजन अमेरिकी सदन हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव की ओर से टॉम लैंटोस एचआर कमिशन ने कराया था. इसका लक्ष्य अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार के नियमों की वकालत से संबंधित है. इस कमिशन ने "भारत के पूर्व राज्य जम्मू और कश्मीर में ऐतिहासिक और राष्ट्रीय संदर्भ में मानवाधिकार की स्थिति की पड़ताल" विषय पर सुनवाई और तर्क करने का आयोजन किया था जिसमें अलग-अलग क्षेत्र से पैरोकार शामिल हुए थे.