पंजाब में कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने से लेकर कुर्सी छोड़ने तक कैसा रहा अमरिंदर सिंह का सफर
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पंजाब में कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने से लेकर कुर्सी छोड़ने तक कैसा रहा अमरिंदर सिंह का सफर

पंजाब में 10 साल बाद मिली जीत से कांग्रेस को नई ऊर्जा मिलने की उम्मीदें जग गई थीं, लेकिन अब पार्टी की प्रदेश इकाई में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है और इसी आपसी उठापटक के चलते आखिरकार आज अमरिंदर सिंह को सीएम के पद से इस्तीफा देना पड़ा.

Amarinder Singh, File Photo

चंडीगढ़: कांग्रेस के सबसे मजबूत क्षेत्रीय छत्रपों में गिने जाने वाले अमरिंदर सिंह वो नेता हैं जिन्होंने पंजाब में पिछले विधानसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल और आम आदमी पार्टी से कड़े मुकाबले में दोनों को शिकस्त देकर कांग्रेस की राज्य की सत्ता में वापसी कराई.

कांग्रेस में सम्मानित और मशहूर नेता की शख्सियत रखने वाले 79 वर्षीय अमरिंदर ने 2017 के चुनाव में 117 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस को जबरदस्त जीत दिलाई और दूसरी बार रियासत के मुख्यमंत्री बने और इस तरह उन्होंने दिल्ली से बाहर अपनी जड़ें जमाने की कोशिश कर रही आम आदमी पार्टी के सपनों का जनाज़ा निकाल दिया.

पंजाब में 10 साल बाद मिली जीत से कांग्रेस को नई ऊर्जा मिलने की उम्मीदें जग गई थीं, लेकिन अब पार्टी की प्रदेश इकाई में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है और इसी आपसी उठापटक के चलते आखिरकार आज उन्हें सीएम के पद से इस्तीफा देना पड़ा. इससे पहले 50 से ज्यादा विधायकों ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाने की मांग थी.

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इस बीच सिंह ने शनिवार को कांग्रेस विधायक दल की बैठक से पहले मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. सेना में रहते हुए भारत-पाक की जंग में हिस्सा ले चुके सिंह की मुश्किलें नवजोत सिंह सिद्धू के पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद बढ़ गईं. पिछले विधानसभा चुनाव से पहले सिद्धू ने भाजपा छोड़कर कांग्रेस का दामन थामा था और अटकलें थीं कि उन्हें उप मुख्यमंत्री बनाया जाएगा. लेकिन उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया. सिद्धू और अमरिंदर सिंह के बीच रिश्ते कभी गर्मजोशी वाले नहीं रहे.

कांग्रेस के हुकूमत में आने के दो साल बाद जून 2019 में मंत्रिमंडल में हुई फेरबदल में सिद्धू से अहम मंत्रालय ले लिए गए और उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया. सिद्धू से स्थानीय शासन और पर्यटन तथा सांस्कृतिक मंत्रालय लेकर उन्हें ऊर्जा और अक्षय ऊर्जा मंत्रालय सौंपे गये और सिद्धू ने नये विभाग के मंत्री के रूप में कामकाज ही नहीं संभाला.

इसके कुछ दिन बाद सिद्धू ने तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से राब्ता किया और उन्हें इस हालात से वाकिफ कराया. सिंह और सिद्धू का टकराव खुलकर सामने आ गया. मुख्यमंत्री ने जहां सिद्धू को स्थानीय शासन विभाग ठीक से नहीं चला पाने का जिम्मेदार ठहराते हुए दावा किया कि इसकी वजह से 2019 के लोकसभा चुनाव में शहरी इलाकों में कांग्रेस का प्रदर्शन खराब रहा, वहीं पूर्व क्रिकेटर ने कहा, 'राहुल गांधी मेरे कप्तान हैं. राहुल गांधी कैप्टन (सिंह) के भी कप्तान हैं.'

इसके बाद सूरते हाल खराब से खराब तर होती गई और आखिरकार सिद्धू को सिंह के कड़े विरोध के बावजूद प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंप दी गई. एक समय अकाली दल के नेता रहे सिंह 'पटियाला राजघराने' से ताल्लुक रखते हैं और सेना के अपने मुख्तसर कॅरियर में वह 1965 की लड़ाई में भाग ले चुके हैं.

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पटियाला के दिवंगत महाराज यादविंदर सिंह के बेटे अमरिंदर ने लॉरेंस स्कूल, सनावर और दून स्कूल, देहरादून से पढ़ाई की. इसके बाद उन्होंने 1959 में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए), खड़गवासला में दाखिला लिया और वहां से 1963 में ग्रेजुएट हुए.

1963 में भारतीय सेना में शामिल हुए सिंह दूसरी बटालियन सिख रेजीमेंट में तैनात हुए. इस बटालियन में उनके पिता और दादा दोनों सेवाएं दे चुके थे. सिंह ने दो साल तक भारत तिब्बत सीमा पर सेवाएं दीं और पश्चिमी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल हरबख्श सिंह के सहयोगी बनाए गए.

दिवंगत राजीव गांधी के करीबी दोस्त माने जाने वाले सिंह का राजनीतिक कॅरियर जनवरी 1980 में सांसद चुने जाने के साथ शुरू हुआ. लेकिन उन्होंने 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान स्वर्ण मंदिर में सेना के दाखिले के खिलाफ लोकसभा और कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. अगस्त 1985 में वह अकाली दल में शामिल हो गए और 1995 के चुनाव में अकाली दल (लोंगोवाल) के टिकट पर स्टेस विधानसभा में पहुंचे.

कांग्रेस में वापसी के बाद वह पहली बार 2002 से 2007 तक मुख्यमंत्री रहे थे और इस दौरान उनकी सरकार ने 2004 में पड़ोसी राज्यों से पंजाब के जल बंटवारा समझौते को खत्म करने वाला राज्य का कानून पास किया. पिछले साल उनकी सरकार संसद से पास केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ चार विधेयक लाई, जिन्हें बाद में पास कर दिया गया.

अमरिंदर सिंह ने 2014 का लोकसभा चुनाव अमृतसर से लड़ा था और भाजपा के अरुण जेटली को एक लाख से ज्यादा मतों के फर्क से हराया था. इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने सतलुज-यमुना लिंक (एसवाईएल) नहर समझौते को खत्म करने वाले पंजाब के 2004 के कानून को गैर-आइनी बताया तो सिंह ने संसद की रुक्नियत से इस्तीफा दे दिया. कुछ दिन बाद उन्हें पंजाब में विधानसभा चुनाव से पहले राज्य इकाई का प्रमुख बनाया गया. 

याद रहे कि कई मुल्कों का सफर करने वाले सिंह ने 1965 की भारत-पाक जंग के अपने संस्मरण के अलावा कई किताबें भी लिखी हैं.
(इनपुट- भाषा के साथ भी)

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