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Valentine's Day Special: वैलेनटाइन डे पर पढ़ें आशिक के वो खत, जो माशूक तक नहीं पहुंच सके

Valentine's Day Special 2023: आज पूरी दुनिया वैलेनटाइन डे (Valentine's Day) मना रही है. इस दिन पार्टनर एक दूसरे को गिफ्ट देते हैं. प्यार का इज्हार करते हैं. कुछ लोग अपने पार्टनर को खत लिखते हैं. एक ऐसे ही आशिक ने वैलेनटाइन डे पर खत लिखे हैं जो उसकी माशूका नहीं पहुंच सके हैं. आप भी पढ़ें.

 

Valentine's Day Special: वैलेनटाइन डे पर पढ़ें आशिक के वो खत, जो माशूक तक नहीं पहुंच सके

Valentine's Day Special 2023: मोबाइल और गैजेट्स से के जमाने में कम ही लोग ऐसे हैं जो अपने प्यार का इज्हार करने के लिए खत का सहारा लेते हैं. लेकिन भारत के सुदूर इलाकों में अभी भी खत का चलन है. एक आशिक ने वैलेनटाइन डे (Valentine's Day) पर अपनी महबूबा की याद में कई खत लिखे हैं. आज इन्हें यहां पेश कर रहे हैं. पढ़ें.

पहला खत

इतने सिक्के इकट्ठा किए मैंने. ये सारे सिक्के तुम्हारे दिए हुए हैं.
तुम्हें शायद पता नहीं लेकिन मैं हर रोज़ तुम्हारा पीछा करता हूं. उसी ऑटो में तुम्हारे साथ बैठता हूं जिसमे तुम बैठती हो.
कभी तुम्हारे दाएं तो कभी बाएं. तुम्हें शायद यह भी पता नहीं कि मैं तुम्हारे पास बैठकर तुम्हारी भीनी ख़श्बू से सराबोर होता रहता हूं.
कभी जब तुम्हारे पास जगह नहीं मिलती तो अगली वाली सीट पर ड्राइवर के बगल में बैठ जाता हूं. लेकिन वहां से भी तुम्हारा चेहरा दिखता रहता है, सामने लगे आईने में. 
इंतिज़ार करता रहता हूं कि यह 10 मिनट का रास्ता कितनी जल्दी कटे और तुम अपने हाथ में दबे सिक्के मुझे दो.

आख़िर स्टॉप आ ही जाता है और तुम ड्राइवर को किराए के रूप में पांच रुपए के सिक्के देती हो. मैं भी ड्राइवर को 10 रुपए देकर वह पांच रुपए ले लेता हूं, जो तुमने ड्रइवर को दिए होते हैं.
असल में ड्राइवर से यह सिक्के लेने की वजह बस इतनी है कि इन सिक्कों की गर्माहट मुझे अच्छी लगती है. वह जो तुम काफ़ी देर से अपने हाथ में दबाए रहती हो, इसलिए.
अब ये सिक्के लेकर मैं अपने हाथ में दबा लेता हूं. इस तरह तुम्हारे हाथ से गरम हुए सिक्कों की गर्माहट आधे घंटे तक बनी रहती है.
और देखो ऐसा करते हुए मैंने कितने सिक्के इकट्ठा कर लिए हैं. कभी तुम ध्यान दोगी तो मैं तुम्हें दिखाउंगा कि तुम्हारे दिए हुए सिक्के मैंने कितने संभाल के रखे हैं. 
ख़ास बात यह कि ये सिक्के मैंने उस जगह पर रखे हैं जहां मैं आईने में अपने आपको देखता हूं.
यह बात मेरी समझ में नहीं आई कि तुम हमेशा छुट्टे पैसे ही देती हो. कहीं तुम्हें पता तो नहीं कि मैं इन सिक्कों को इकट्ठा कर रहा हूं?

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दूसरा खत

ये छोटे पीले इमोजी भले ही इतनी दूर से तुम्हारे चेहरे की हालत बताते हैं. लेकिन कहां अच्छा लगता है ऐसे व्हाट्सएप पर बात करना, वह भी इतनी दूर से.
यहां न तो तुम्हारी हंसी दिखती है, ना तो तुम्हारा चेहरा, जो हर बार के साथ अलग एक्सप्रेशन लिए होता है. तुम्हारी भीनी ख़ुशबू भी तो नहीं आती यहां. न तुम्हारी हंसी की किलकारी सुनाई देती है.
मुझे तुम्हारे सामने बैठकर ही बात करना अच्छा लगता है. जब तुम हर बात पर अपने चेहरे का एक्सप्रेशन देती हो. कोई बात अच्छी न लगे तो गुस्सा वाला चेहरा बनाती हो. जैसे तुम्हारी पूरी दुनिया ही हमसे रूठ गई हो. फिर तुम्हें मनाने की हमारी मजबूरी हो जाती है.
किसी बात पर तुम भौं चढ़ाकर खिलखिलाकर पूरे मन से हंस देती हो. जैसे तुम्हारे घर की सारी दीवारें हंसने लगी हों. किसी बात पर तुम माथा सिकोड़ कर सोचने लगती हो, ऐसा लगता है जैसे तुम मेरे मन का चोर टटोल रही हो या मेरी नियत पर शक कर रही हो.

फिर एक वक्त आता है कि तुम अपनी धारदार नजरों से हमें चेतावनी दे रही हो कि बस, अब बहुत हुआ, अपनी हद में रहो. फिर शुरू होता है तुम्हें मनाने का दौर कि जैसा तुम समझ रही हो वैसा नहीं है. मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं. मैं तुम्हे परेशान नहीं कर रहा.
तुम्हारे साथ चलते हुए बात करने का तो मजा ही अलग है. जब तुम अपने जिस्म का अंग देख-देख कर चलती हो कि कहीं कोई अंग उघड़ा सा तो नहीं दिख रहा. यक़ीन मानो तुम चलती हुई जब बात करती हो तो बहुत बेबाक लगती हो. और जो हाथ हिलाकर अपनी बातों में दावा पेश करती हो वो तो बहुत ही गजब है. 
ये सब कहां मिल पाता है व्हाट्सएप पर. अजीब सा सन्नाटा पसरा रहता है. हरा व्हाट्सएप होते हुए भी यहां हरियाली नहीं रहती. हां इतना जरूर है कि वो थोड़ा सा इंतिज़ार अच्छा लगता है, जब मैं तुम्हें मैसेज कर चुका होता हूं और तुम टाइप कर रही होती हो. मन में बेचैनी होती है कि तुम क्या टाइप कर रही होगी.

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तीसरा खत

काश नींद भी उधार ली जा सकती तो मैं आपसे आपकी नींद लेकर आपसे पूरे 40 मिनट तक बात कर लेता.
चूंकि आप 10 मिनट तक ही जगी रहीं इसलिए मेरी आपसे सिर्फ़ इतनी ही देर बात हो सकी.
हैदराबाद के एल. बी. नगर से कोटी तक 40 मिनट का ही तो रास्ता है. दिवाली की सुबह सूरज भी लाल और थोडा ठंडा. बस ख़ाली थी, सुबह की वजह से शोर शराबा भी कम था, बात करने का अच्छा माहौल.
मैं आपसे कहता सुनो, आपने कहा कि मैं रात को पटाखों की वजह सो नहीं सकी.
अक्सर नींद में लोग ख़लल डालते हैं, आज नींद ने हमारी बात में ख़लल डाल दी.
काश मैं आपसे आपकी नींद उधार ले सकता, आप मेरे हिस्से का जाग लेती, मैं आपके हिस्से का सो लेता, इस तरह हमारी बात हो जाती.

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Siraj Mahi

सिराज माही युवा पत्रकार हैं. देश, दुनिया और मनोरंजन की खबरों पर इनकी अच्छी पकड़ है. ज़ी मीडिया से पहले वह 'ईटीवी भारत' और 'दि संडे पोस्ट' जैसे मीडिया हाउस में काम कर चुके हैं. लिखने-पढ़ने के अलावा ...और पढ़ें

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