आखिर कुपोषण पर क्या सोचा नीति आयोग ने

सत्ता में आने के बाद एनडीए सरकार के कामों और ऐलानों की लिस्ट बहुत लंबी है. इन कामों में एक यह था कि उसने योजना आयोग को खत्म करके नीति आयोग बनाया था.

सुविज्ञा जैन | अंतिम अपडेट: Sep 14, 2017, 11:58 AM IST
आखिर कुपोषण पर क्या सोचा नीति आयोग ने
नीति आयोग ने कहा है कि देश के आर्थिक विकास के रास्ते की बड़ी बाधाओं में एक रोड़ा कुपोषण है. (फाइल फोटो)

सत्ता में आने के बाद एनडीए सरकार के कामों और ऐलानों की लिस्ट बहुत लंबी है. इन कामों में एक यह था कि उसने योजना आयोग को खत्म करके नीति आयोग बनाया था. इसी नीति आयोग ने हाल ही में एक नया काम किया है. उसने नई पोषण रणनीति बनाई है. नई रणनीति के एक वक्तव्य पर नज़र डालें तो उसने कहा है कि देश के आर्थिक विकास के रास्ते की बड़ी बाधाओं में एक रोड़ा कुपोषण है. वाकई ये बिल्कुल नई बात है. इसलिए नहीं कि कुपोषण को उसने नई समस्या बताया है बल्कि इसलिए क्योंकि आयोग ने कुपाषण को आर्थिक विकास न हो पाने का कारण माना है. यानी कुपोषण को आर्थिक विकास से जोड़कर देखा है. आयोग का कहना है कि देश की आमदनी में 10 फीसद कमी देश में कुपोषण के कारण होती है. कुपोषण को आर्थिक विकास का बाधक तत्व मानने की बात को खाारिज करने के लिए अगर तर्क ढूंढने निकलेंगे तो बड़ी मुश्किल आएगी. ये तो कोई भी नहीं कह सकता कि रुग्ण या कुपोषित मानव संसाधन भी देश में उत्पादन या आमदनी बढ़ा सकते हैं. लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि देश की आर्थिक वृद्धि को सुनिश्चित करने वाले कई और बड़े बड़े निर्धारक तत्व हैं. खैर आयोग कि इस बात के विश्लेषण की दरकार है.

ज्य़ादा चिंता आर्थिक वृद्धि की या कुपोषण की?
अगर कुपोषण को आर्थिक वृद्धि का रोड़ा कहा गया है तो सुनने में ऐसा लगता है कि हमारी ज्यादा चिंता आर्थिक वृद्धि को लेकर है न कि कुपोषण को लेकर. फिर भी इस बात का शुक्ल पक्ष यह है कि आर्थिक वृद्धि को साधने के लिए कुपोषण को मिटाने की बात कही गई है. यानी जो लोग कुपोषण को अपने आप में एक बड़ी समस्या या चिंता मानते हैं उसे मिटाने का वायदा इस बात में है.

व्यावहारिकता का सवाल
कुपोषण से आर्थिक वृद्धि बाधित होती है यह मान भी लिया जाए पर कुपोषण मिटाकर आर्थिक विकास कर लेने का उपाय कितना व्यवहारिक है ये भी देखना पड़ेगा. अगर आंकड़ों पर ही नजर डालें तो इस समय देश में सारे बच्चों में एक तिहाई कुपोषण के शिकार हैं. इतना ही नहीं आधी से ज्यादा महिलाएं खून की कमी की शिकार हैं. यानी देश की आधी से ज्यादा आबादी कुपोषण की शिकार है. इतनी बड़ी आबादी में कुपोषण मिटाने के लिए जितने संसाधनों की जरूरत पड़ेगी वह देश अपनी वर्तमान आय में से नहीं निकाल सकता. क्या आगे चलकर यह सवाल सामने नहीं आएगा कि देश का आर्थिक विकास किए बगैर हम ऐसी समस्याओं का समाधान कैसे करेंगें. आखिर में बात यह निकलेगी कि कुपोषण से लड़ने के लिए देश की आमदनी में बढ़ोतरी चाहिए. आर्थिक वृद्धि हासिल करने के और भी उपाय उपलब्ध हैं लेकिन कुपोषण से लड़ने के लिए संसाधनों के आलावा और कोई उपाय फिलहाल नहीं दिखता.

क्या सुपोषित कार्यबल वृद्धि में योगदान दे पा रहा है?
कुपोषण की वजह से आर्थिक वृद्धि कम हो रही है इसके विपक्ष में एक तर्क ये भी आता है कि क्या देश में जो सुपोषित कार्यबल है उससे हम अपने आर्थिक विकास में योगदान ले पा रहे हैं. क्या उसके पास रोजगार के उतने अवसर हैं जिससे वह देश की आर्थिक वृद्धि में अपना योगदान दे सके.

कुपोषण कारण है या खुद में एक समस्या ?
बात यहां तक तो ठीक है कि किसी भी देश के आर्थिक विकास में उसके मानव संसाधनों का बहुत बड़ा योगदान होता है. इसीलिए उसके नागरिकों का स्वस्थ और पोषित होना अनिवार्य है. लेकिन इसके लिए कुपोषण को किसी समस्या का कारण ना मानते हुए अगर खुद में एक बड़ी समस्या का दर्जा दिया जाएगा तभी सही नीति का निर्माण हो सकता है. नहीं तो हम कुपोषण मिटाने के लक्ष्य को लेकर ध्यान दूसरे क्षेत्रों में लगाते रहेंगे. कुपोषण से लड़ने के लिए भारी संसाधनों की आवयश्कता है. मुश्किल ये है कि इतने संसाधन कहां से आएं? इस पर सुझाव दिया जा सकता है कि हम अपने उत्पादक कार्यों की प्राथमिकता सूची को सुधारकर इन्हें काफी हद तक हसिल कर सकते हैं.

लक्ष्य की समयबद्धता का सवाल
कुपोषण मिटाओ का लक्ष्य हासिल करने की समयबद्धता सन् 2030 बताई गई है, यानी लगभग तेरह साल. इसे दीर्घकालिक नज़रिया कहा गया है. लघुकालिक या तात्कालिक उपाय साफ साफ तो नहीं हैं, लेकिन अगर पूछें तो नीति आयोग बता सकता है कि उसने तात्कालिक उपाय के तौरपर महिला व बाल विकास मंत्री की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय न्यूट्रिशियन मिशन स्टीयरिंग ग्रुप बनाने का प्रस्ताव या सिफारिश की है. यह ग्रुप जो भी कार्यक्रम सुझाएगा उसे लागू करने के लिए इसी मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में अधिकार प्राप्त कार्यक्रम समिति भी बनेगी. इतना ही नहीं खुद नीति आयोग के उपाध्यक्ष और मुख्यमंत्रियों को प्रधानमंत्री की राष्ट्रीय परिषद में शामिल करने की भी बात है. यानी कुल मिलाकर नीति आयोग की नई रणनीति में यही सुझाव है कि नया कार्यक्रम बनाने के लिए सरकार नए सिरे से सोचे और नए सिरे से कुछ करे.

(लेखिका, खेल विशेषज्ञ और सोशल इंटरप्रेन्योर हैं.)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)