फिल्मी परदे पर जेलें और मानवाधिकार

जेल में आसाराम हो, राम रहीम या पीटर मुखर्जी- खबर का संसार उस एक तस्वीर को पाने के लिए लालायित रहता ही है जो एक्सलूसिव हो और तुरंत बिके, इस बात की परवाह किए बिना कि कई बार ऐसी खबरों का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ता है जिनका इन सहूलतों से कोई सरोकार नहीं.

Vartika Nanda वर्तिका नंदा | Updated: Mar 12, 2018, 08:54 PM IST
फिल्मी परदे पर जेलें और मानवाधिकार

दुनिया भर में कई फिल्मों ने जेलों के अंदर के सच को उभारा है और एक तरह के जनांदोलन के माहौल को बनाने में मदद की है. जेलों की त्रासदी, कैदियों की मनोदशा, जेलों के अंदर के विद्रूप माहौल, भीड़, शोषण और अभिव्यक्ति के घुटे माहौल को फिल्मों ने अपने-अपने तरीके से उभारा है. बॉलीवुड और मीडिया इस बात से आश्वस्त रहा है कि जेलें खबर बनती हैं, जनता को खींचती हैं और अंतत: मालिक की झोली में व्यापार लाती हैं. इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि जेलों को बड़े परदे या फिर मीडिया के किसी पायदान में उतारने का एक बड़ा मकसद व्यापार ही रहा है .

लेकिन जेल जैसे विषय पर फिल्म, डॉक्यूमेंट्री या फिर किसी खबर तक को शूट करना आसान नहीं. 2015 में दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी जेल तिहाड़ में बीबीसी की डाक्यूमेंट्री को लेकर बड़ा विवाद हुआ था जिसमें एक पत्रकार ने निर्भया मामले के एक दोषी का इंटरव्यू कुछ इस अंदाज में दिखा दिया था मानो वह आरोपी की तरफ से ही बात कहने लगा हो. जेलें 2017 में शशिकला की आरामतलबी को लेकर भी खबर बनीं. मनु शर्मा के तिहाड़ में आराम के किस्से, सुब्रत राय सहारा के लिए विशेष इंतजाम, चौटाला के लिए रियायतें, संजय दत्त के लिए पिघलती सलाखें- सब खबरों के केंद्र में रहीं. इनमें से बहुत- सी खबरें अपने असली रूप में बाहर आ ही न सकीं जबकि कुछ के सिर्फ सिरे ही पकड़े जा सके.

जेल में आसाराम हो, राम रहीम या पीटर मुखर्जी- खबर का संसार उस एक तस्वीर को पाने के लिए लालायित रहता ही है जो एक्सलूसिव हो और तुरंत बिके, इस बात की परवाह किए बिना कि कई बार ऐसी खबरों का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ता है जिनका इन सहूलतों से कोई सरोकार नहीं. जेल में वीआईपी स्टेटस का बंदी जेल के अंदर रहकर भी खबर बनाने की जुगत में रहता है ताकि अरूण गवली की तरह बाहर आने पर राजनीतिक समाज में उसका दखल बन सके. इस कहानी में एक कड़ी यह भी है कि जब ऐसे किरदारों पर फिल्में बनती हैं तो अपराध और अपराधियों का बाजार-भाव भी तय होने लगता है.

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लेकिन फिल्म के सेट और जेल में फर्क है. देखने और दिखाने के नजरिए में भी. बालीवुड बखूबी जानता है कि मानस की दिलचस्पी जेलों में हमेशा रही है. यहां कौतुहल है, सलाखों के पीछे के परछाईं भरे समाज को देखने की उत्सुकता भी लेकिन यह भी जरूरी नहीं कि ऐसी फिल्में जेल सुधार को लेकर जनता में सजगता, जागरूकता या संवेदनशीलता का कोई स्थायी भाव जगाने में सफल रह पाती हों. इसके बावजूद यह भी एक सच है कि फिल्मों की वजह से जेलें एक विस्तृत आकार में जनता के सामने आ सकी हैं और गंभीर चर्चाओं को जन्म देती रही हैं.

1957 में व्ही शांताराम निर्मित दो आंखें, बारह हाथ जेल सुधार को लेकर एक बड़े प्रयोग को सत्यापित करती है. इस फिल्म में आदीनाथ नाम का जेल का युवा वॉर्डन पैरोल पर छूटे 6 दुर्दांत कैदियों को सुधारने में एक बड़ा काम कर दिखाता है. एक बंजर जमीन को हरे खेत में तब्दील कर यह कैदी आखिर में खुद को भी बदला हुआ पाते हैं.

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1963 में आई बिमल रॉय की फिल्म बंदिनी जेल में महिला बंदियों की मानसिक स्थिति और उनके अकेलेपन की कहानी को कहती चलती है. दो बीघा जमीन और देवदास जैसी फिल्मों को बना चुके बिमल रॉय ने इस फिल्म के जरिए आजीवन कारावास में जेल बंद महिला कैदी के मजबूत और बेहद कमजोर – दोनों ही पक्षों को उजागर किया है. उत्तरी बंगाल में जेलर रहे चारू चंद्र चक्रवर्ती के लिखे उपन्यास तामसी पर आधारित यह फिल्म उस साल फिल्म फेयर अवार्ड्स में अपनी धाक जमा गई थी. अपने शीर्षक के ही मुताबिक फिल्म बंदिनियों की जिंदगी की मार्मिकता को कहने में आज भी सफल मानी जाती है. इस फिल्म का संगीत बरसों बाद भी कथानक पर सटीक बैठता है. एक बंदी पिंजरे में बंद

पंछी के जरिए जेल की पीड़ा को गाती दिखती है. आशा भोंसले के गाए गाने ओ पंछी प्यारे और अब के बरस भेज भैया को बाबुल में जेल की बंदिनी कल्याणी जब उसे गाती है तो सिनेमा हाल का दर्शक जेल की त्रासदी को अपने भीतर तक और गहराई से महसूस कर पाता है.

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2009 में लीक से हटकर समाज के सच को अपनी फ़िल्मों में पेश करने वाले मधुर भंडारकर ने अपनी दिलचस्पी चांदनी बार की बालाओं, पेज 3 के लोगों, ट्रैफिक की लाइट्स और फैशन की चकाचौंध से हटाकर जेल की चारदीवारी में दिखाई. करीब डेढ़ साल की रिसर्च के बाद बनी फिल्म 'जेल' काफी हद तक सच के करीब थी. यह कहानी मध्यम वर्ग के उस नौजवान की है जो किसी कारण से जेल में फंस जाता है. पूरी कहानी भीड़ भरी जेल में उसके अनुभवों को दिखाते हुए आगे बढ़ती है. इसमें नील नितिन मुकेश और मनोज वाजपेयी मुख्य किरदारों में दिखते हैं. 2017 में आई फिल्मों डैडी, लखनऊ सैंट्रल और फिर दाऊद इब्राहिम की बहन पर बनी फिल्म हसीना पार्कर ने भी जेलों को फिर से शहरी चौपालों की जिज्ञासा का विषय बना दिया.

2017 में रंजीत तिवारी की निर्देशित फिल्म 'लखनऊ सैंट्रल' की मुख्य महिला किरदार एक जगह जोर देकर यह पूछती है कि बंदी क्या कोई नुमाइश की चीज हैं. इस एक डायलाग के साथ फिल्म एक बड़े मुद्दे की तरफ ध्यान दिलाती है जहां बंदियों को फैशन शो में धकेल कर नुमाइश बनाने की कोशिशें होती हैं. लेकिन लखनऊ सेंट्रल के जरिए मंत्री की जिस छवि को दिखाया गया है, वह सच से परे दिखती है. उत्तर प्रदेश के पूर्व जेल मंत्री ने अपने कार्यकाल में यूपी की ज्यादातर जेलों को झांककर भी नहीं देखा. जेल मंत्रियों के रिपोर्ट कार्ड अक्सर अनदेखे कर दिए जाते हे. कई राज्यों में मंत्रालयों की बंदरबांट के समय जेल मंत्री बनने की इच्छा रखने वाले नेता को ढूंढना मुश्किल लगता है. जेल भले ही राज्य का विषय है और राज्य सरकारें चाहें तो जेलों का कायाकल्प कर दें लेकिन उसके लिए इच्छाशक्ति कहां से लाई जाए? पर ऐसा लगता है कि कई बार लखनऊ सैंट्रल जैसी फिल्में किसी राज्य विशेष की फटेहाल इमेज को दुरुस्त करने के लिए ही बना दी जाती हैं.

फिल्मी परदे पर जब जेल दिखती है तो कई बार जेल पर्यटन के शुरू हो जाने की आशंका भी दिखने लगती है क्योंकि एक बड़ा समाज अब जेल को एक बार देख आना चाहता है मानो बंदी की छटपटाहट किसी चिड़ियाघर की मानिंद हो. एक बार देखने के बाद वह अक्सर यह भूल जाता है कि जाते वक्त वह बंदियों के भले के लिए कुछ करने का वादा करके वहां गया था. वह खबर लेता है और पान चबाने के इत्मीनान के साथ बाहर चला आता है. किसी की मायूसी उसे यह सुख दे देती है कि वह जेल से बाहर आजाद है.

फिल्में भी अपने हरे-भरे कथानक और तकनीक के बेहतरीन इस्तेमाल के बीच कहीं यह भरोसा नहीं देतीं कि फिल्म से हुई कमाई का कोई हिस्सा जेल सुधार पर खर्च किया जाएगा. फिल्मी जगत जेल में शूंटिग तक मुफ्त में कर आता है. न बंदी को कुछ हासिल होता है, न जेल को. 2016 में संजय दत्त की जिंदगी पर बन रही फिल्म के मुख्य किरदार में रणवीर कपूर और अनुष्का शर्मा हैं और शूट भोपाल भी पुरानी जेल में हुआ लेकिन निर्देशक की तरफ से राज्य सरकार को कोई भुगतान नहीं दिया गया. सवाल यह है कि जब कलाकार अपनी कला का पूरा मूल्य चाहता है तो जेलों का क्या यह हक भी नहीं बनता कि वे किसी किराए को पाने की हकदार बनें और उसका एक हिस्सा बंदियों पर खर्च करें.

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(डॉ वर्तिका नन्दा जेल सुधारक हैं. जेलों पर एक अनूठी श्रृंखला- तिनका तिनका- की संस्थापक. खास प्रयोगों के चलते दो बार लिम्का बुक ऑफरिकॉर्ड्स में शामिल. तिनका तिनका तिहाड़ और तिनका तिनका डासना- जेलों पर उनकी चर्चित किताबें) 

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)