केजरीवाल के 5 साल और 6 सवाल...

कोई राजनीतिक दल जनता के सरोकार का निकाय ही होता है सो यह देख लेने में हर्ज क्या है कि इस समय आम आदमी पार्टी और राजनीतिज्ञ केजरीवाल कहां तक पहुंचे हैं. इस बहाने मौजूदा राजनीतिक माहौल पर भी नज़र पड़ जाएगी. सरसरी तौर पर देखना चाहें तो छह सवालों पर सोच सकते हैं. 

सुविज्ञा जैन | Updated: Nov 13, 2017, 04:30 PM IST
केजरीवाल के 5 साल और 6 सवाल...

आम आदमी पार्टी पांच साल की हो गई. लगभग इतनी ही उम्र राजनीति में केजरीवाल की भी हुई. वैसे किसी राजनीतिक दल के लिए पांच साल कुछ नहीं होते. हालांकि एक क्षेत्रीय दल के रूप में इतने कम भी नहीं होते. कोई राजनीतिक दल जनता के सरोकार का निकाय ही होता है सो यह देख लेने में हर्ज क्या है कि इस समय आम आदमी पार्टी और राजनीतिज्ञ केजरीवाल कहां तक पहुंचे हैं. इस बहाने मौजूदा राजनीतिक माहौल पर भी नज़र पड़ जाएगी. सरसरी तौर पर देखना चाहें तो छह सवालों पर सोच सकते हैं. केजरीवाल का प्रस्थान बिंदु. शुरू में उनके लक्ष्य. पार्टी बनाने की उनकी जरूरत. पार्टी बनाने के बाद दिल्ली की गद्दी मिल जाना. दूसरे प्रदेशों में पैर फैलाने में नाकामी. और छठवां सवाल कि वे आज कहां हैं...

कहां से चले थे केजरीवाल
अन्ना आंदोलन के सिपाही बनकर चलना शुरू किया था. उसके पहले उनके खाते में एक मैग्सेसे अवॉर्ड था. 5 साल पहले देश में यूपीए सरकार को उखाड़ने की मुहिम में अन्ना के आंदोलन के जरिए उन्हें देश में अपनी दृश्यता बनाने का मौका मिला. अन्ना आंदोलन ने यूपीए सरकार की छवि को तहस-नहस करने में आश्चर्यजनक सफलता पाई. लोगों में एक यकीन पैदा किया जा सका कि लोकपाल आएगा, भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा. यह पहले ही लोगों के दिमाग में बैठाया जा चुका था कि जनता के सारे कष्टों का कारण सिर्फ भ्रष्टाचार होता है. सरकार को भ्रष्टाचार का कारण समझाते हुए जनमत बदलने का राजनीतिक काम शुरू हुआ था. इस मुहिम ने अपने प्रबंधन कौशल से रातोंरात रफ्तार पकड़ ली थी. प्रबंधन में केजरीवाल की बड़ी भूमिका थी. इतनी ज्यादा कि समझा जाने लगा कि अन्ना आंदोलन के सबसे बड़े कर्ताधर्ता केजरीवाल ही हैं. कहते हैं कि आंदोलन का वित्तीय प्रबंधन भी केजरीवाल ने अपने पास रखा था. सो आंदोलन के बीसियों नेताओं की तुलना में केजरीवाल का प्रभुत्व कुछ ज्यादा था.

शुरू में उनके लक्ष्य
अन्ना आंदोलन का लक्ष्य लोकपाल तक सीमित था. यानी आंदोलन का लक्ष्य भ्रष्टाचार का खात्मा दिखाया गया था, लेकिन अन्ना आंदोलन का काम जब अधूरा ही था उसी समय ही आंदोलन कई कारणों से उतार पर भी आने लगा. यह बात केजरीवाल ने सबसे पहले भांपी. तात्कालिक लक्ष्य को दीर्घकालिक अभियान में तब्दील करने की बात उनके ही दिमाग में आई. उन्होंने भ्रष्टाचार के खात्मे के नाम पर खुद ही सरकार बनाने का अपना लक्ष्य घोषित कर दिया. आंदोलन छोड़कर उन्होंने आम आदमी पार्टी बना डाली. अन्ना आंदोलन के ज्यादातर साथी राजनीतिक रुझान के ही थे सो वे, राजी भी हो गए. 

दिल्ली की सत्ता मिल जाना
दिल्ली के पिछले से पिछले चुनाव में यानी एएपी संस्करण एक में केजरीवाल के नेतृत्व में पार्टी चुनाव में उतरी. तब केजरीवाल की पार्टी को बहुमत तो नहीं मिला, लेकिन उसे सबसे ज्यादा सीटें मिल गईं. लेकिन उसे अन्ना आंदोलन में पीछे से रही मददगार भारतीय जनता पार्टी से मुकाबला करना पड़ा था, क्योंकि दिल्ली में सत्तारुढ़ कांग्रेस को उखाड़ने का माहौल तो अन्ना आंदोलन से पहले ही बन चुका था. भाजपा ही अपने को विकल्प मानती थी. भाजपा से इस राजनीतिक लड़ाई में केजरीवाल की छवि और भी ज्यादा जुझारू नेता की बन गई. जब सरकार बनाने लायक सीटें आम आदमी पार्टी के पास नहीं थीं, तब उसने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना ली. यह देश के लिए एक आश्चर्य का कारण बना. सत्ता में आने के बाद आंदोलन में साथ रहे नेताओं में विवाद होने लगे. पार्टी छितराने लगी, लेकिन केजरीवाल जमे रहे. उन्होंने इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव करवा लिए. और जब दोबारा चुनाव हुआ तो उन्हें सीधे ही भाजपा से टक्कर लेने का मौका मिला. तब तक भाजपा की अपनी कमजोरियां पनप गई थीं. मोदी लहर उतार पर थी. चुनाव नतीजों ने तहलका मचा दिया. भाजपा लगभग पूरी तौर पर धराशाही हो गई. लगा कि केजरीवाल अब अखिल भारतीय राजनीति के नव नक्षत्र हैं. उनका अगला लक्ष्य भारतीय राजनीति में अपना विस्तार करने का बना, लेकिन इसमें दिक्कत यह थी कि उन्हें दिल्ली सरकार चलाने में व्यस्त होना पड़ा. फिर भी बड़े नेताओं के साथ के अभाव में उन्होंने अपने कौशल और व्युत्पन्नमति से काम किया और दूसरे प्रदेशों में आम आदमी पार्टी को बढ़ाने का लक्ष्य बनाया. इधर, दिल्ली के पूर्ण राज्य न होने के कारण यानी केंद्र शासित होने के कारण उनके पास ज्यादा कुछ कर दिखाने की गुंजाइश पहले ही नहीं थी, ऊपर से उप राज्यपाल से हमेशा उलझाव की राजनीति के कारण वे उतना भी नहीं कर सके. उनकी मज़बूरी थी कि यह तर्क रखते रहें कि उन्‍हें काम नहीं करने दिया जा रहा है. केंद्र सरकार से समन्वय की राजनीति वे कर नहीं सकते थे, क्योंकि उनकी सारी उपलब्धियां विरोध संघर्ष और आक्रामक तेवरों से ही आई थीं. इस तरह से अपने काम-धाम का प्रदर्शन करने के मामले में वे कमज़ोर दिखते चले गए. 

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अपने देशव्यापी होने में नाकामी
उन्होंने अन्ना आंदोलन से मिली विरासत के सहारे देशव्यापी होने की कोशिश की, लेकिन देश में जब अन्ना ही हाशिए पर चले गए तो यह विरासत कितनी काम आती. पंजाब, हरियाणा, उप्र, मप्र जैसे कुछ राज्यों में अपनी पार्टी को जमाने की उन्होंने हरसंभव कोशिश की, लेकिन कहीं से भी सकारात्मक नतीजे नहीं आए. बल्कि जो शुरू में हासिल हुआ था उसे बचाए रखना ही मुश्किल हो गया, लेकिन उनकी कोशिश जारी दिखती हैं. भले ही वे अपूर्ण राज्य के मुख्यमंत्री हैं, लेकिन हैं तो मुख्यमंत्री ही. मुख्यमंत्री की हैसियत के नाते उनके पास मीडिया में खुद को बनाए रखने का मौका तो है ही, लेकिन इस स्थिति में हर समय यह सवाल उनसे टकरा जाता है कि दिल्ली में वे क्या कर रहे हैं. दिल्ली आखिर देश की राजधानी है. यहां की समस्याएं देश की सबसे बड़ी समस्याएं समझी जाती हैं. सो आए दिन सरकार अदालती आदेशों के पालन करने की चिंता में रहती हैं. मसलन इस समय वह दिनरात अपने नागरिकों को धुंआसे के नुकसान से बचाव के रास्ते ढूंढने में लगी है. 

कहां खड़े हैं इस समय केजरीवाल
उनके अन्ना आंदोलन के साथियों में ज्यादातर नेता आजकल भाजपा में हैं. मसलन वीके सिंह, शाज़िया इल्‍मी जैसे कई नेता. प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव जैसे नेता केजरीवाल के साथ नहीं हैं. किरण बेदी जैसी नेता बाकायदा भाजपा की मुख्यमंत्री पद की दावेदार बनने और हारने के बाद दूर प्रदेश में राज्यपाल बनकर चली गई हैं. मंच के कवि कुमार विश्वास से वे लगातार परेशान हैं. ले-देकर मनीष सिसोदिया जैसे विश्वस्त नेता ही उनके पास बचे हैं, लेकिन दिल्ली सरकार के रखरखाव का काम भी अपने आप में भरा पूरा काम है. सो आम आदमी पार्टी के देशव्यापी विस्तार के काम में हाथ नहीं बंटा सकते. कुल-मिलाकर लगता है कि केजरीवाल जहां भी खड़े हैं, अकेले से खड़े हैं.

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क्या कर सकते हैं ऐसे में वे
यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे इस समय भी मुख्यमंत्री हैं. अन्ना आंदोलन के दिनों की याद दिलाने के वे अकेले निमित्त बचे हैं. उनके उस आम आदमी नुमा जनाधार में ही संभावना देखी जा सकती है जो अन्ना आंदोलन के समय उनके पास आया था. इस जनाधार का फिलहाल अता-पता नहीं है, लेकिन तलाशा जाएगा तो उसे फिर से जगाया भी जा सकता है. खासतौर पर भ्रष्टाचार के मुददे पर. इस मुददे पर फिर से देश को जगाने के नारे आजकल दूसरे दलों के पास भी हैं. लेकिन वे दल एक दूसरे के भ्रष्टाचार तक ही सीमित हैं. कांग्रेस पार्टी भाजपा के भ्रष्टाचार और भाजपा कांग्रेस के भ्रष्टाचार की बात करती रहती हैं. सो केजरीवाल के पास एक विकल्प तो ये है कि दोनों के भ्रष्टाचार पर हल्ला बोल दें. दूसरा विकल्प ये कि किसी एक के साथ होकर काम करने लगें, लेकिन दिल्ली की सत्ता के चक्कर में भाजपा उनका साथ ही नहीं ले सकती. रही बात कांग्रेस की तो एक बार कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के कारण कोई स्थिति बन भी सकती है, लेकिन उसके लिए वह आम आदमी मानसिक रूप से कैसे तैयार हो जाएगा, जिससे यूपीए सरकार के खिलाफ नारे लगवाए गए थे. सो हाल फिलहाल केजरीवाल के पास कोई आसान विकल्प भी दिखता नहीं है. हां, कोई दीर्घकालिक अभियान की तैयारी करनी हो तो बात अलग है. इस काम के लिए भी उन्हें पहाड़ सा बड़ा काम करना पड़ेगा. वह ये कि वर्तमान काल में दुर्लभ ईमानदार लोगों की तलाश में निकल पड़ें. खासतौर पर उस किस्म के ईमानदार लोगों की तलाश में, जिन्हें रातों रात अमीर बनाने का लालच दिया ही न जा सके.

(लेखिका, प्रबंधन प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ और सोशल ऑन्त्रेप्रेनोर हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)