पशु की सोहबत में 'इंसानी मोहब्बत'

पशु की सोहबत में 'इंसानी मोहब्बत'

देश के नामचीन शायर जिगर मुरादाबादी ने एक बड़ा ही खूबसूरत शेर लिखा है। इक लफ्जे मोहब्बत का अदना सा फंसाना है , सिमटे तो दिले आशिक फैले तो जमाना है। प्यार-मोहब्बत इंसानी रिश्ते की उस पाकीजगी को दर्शाता है जिसमें दूरियां नजदीकियां बनती है। मोहब्बत से कोई भी रिश्ता बनता, सजता और संवरता है। मोहब्बत दिलों को समेट जरूर देता है लेकिन इसका दायरा इतना बड़ा है जो इंसानी दिमाग की कल्पना से भी परे है। आम तौर पर ऐसे लफ्जों का इस्तेमाल हम नायक-नायिका के प्रेम-संबंधों को लेकर ही करते है। जबकि प्रेम की विशालता संबंधों से परे होकर हर उस पवित्र रिश्ते को प्रगाढ़ करती है जो बिना किसी स्वार्थ के इंसानियत को पल-पल बुलंद करती नजर आती है। क्योंकि मोहब्त किसी भी व्यक्ति, या किसी के साथ भी पनप सकता है। इसके होने और पनपने में कोई भेदभाव नहीं है।

इस इंसानी मोहब्बत के बीच हम पशु प्रेम के भी किस्से सुनते है। जब एक व्यक्ति पालतू के तौर पर किसी जानवर को घर में पालता है। सिर्फ चंद दिनों में ही उसके प्रति आशक्ति का ऐसा समंदर हिलोरे लेता है जो नए प्रेम की रूपरेखा को रेखांकित करता है। इस नए प्रेम संबंधों में वो पालतू पशु उस अमुक व्यक्ति के परिवार के सदस्य की तरह हो जाता है। वह बोल भले ना पाता हो लेकिन उसकी प्रेम भरी भावनाएं घर के हर कोने में अपनी जगह बना लेती है। यहां तक कि मानव समुदाय में वन्य जीवों के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए विश्व वन्य जीव दिवस भी मनाया जाता है। वेद, रामायण और महाभारत जैसे धार्मिक ग्रंथ हमें ना सिर्फ इंसानों से बल्कि पशुओं से प्यार करने की सीख देते है। प्रकृति में सभी पशु, पक्षी, जानवर आदि सभी जीव भी आते हैं। पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक संसार के सभी पशु, पक्षी व जीवों के प्रतिनिधि भगवान शिव ही हैं। भगवान शंकर का नंदीश्वर अवतार हमें पशुओं से प्रेम करने की सीख देता है।

घर में आमतौर पर लोग पपी या फिर डॉगी पालते है। किसी पालतू जानवर को पालने का यकीनन यह बड़े शौक और मॉडर्न क्रेज के रूप में शुमार होता है। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन भी अपने विशालकाय डॉगी के साथ कभी-कभी अपने ट्वीटर हैंडल पर फुर्सत के पलों में दिख जाते है। मैंने किसी डॉग से इंसानी रिश्ते को लेकर कई स्टोरी बनाई होगी। लेकिन जिंदगी की आपाधापी में कभी गहराई से इनपर गौर करने का मौका नहीं मिला। लेकिन शायद ईश्वर मुझे इसका ऐहसास करीब से कराना चाहता था। तभी चंद साल पहले मेरी जिंदगी में टोबो आया।

टोबो एक प्यारा डॉगी जो मेरे बड़े भाई जैसे मित्र का घरेलू डॉगी। मेरे मित्र पर्यावरणविद है और उन्हें देखकर ऐसा लगता है मानो पर्यावरण का हर आवरण उनमें सिमट सा गया हो। पर्यावरण के मसले पर वह गहरी दखल रखते हैं । वह ऐसे पर्यावरण प्रेमी है जो प्रकृति के हर जीव से प्यार करते है।

टोबा लेब्राडोर नस्ल का था जो अपनी दोस्त ब्लू के साथ रहता था। मस्ती ,अल्हड़पन और संजीदगी लेब्राडोर नस्ल के डॉगी की खूबी होती है। इन वफादार साथियों को ऐतिहासिक मछुआरों के साथी के रूप में भी जाना जाता है। ये उनके साथी होने के साथ उनकी मछलियां वापस लेकर भी आया करते थे इसीलिये इन्हें रिट्रीवर भी बोला जाता है। इस नस्ल के डॉगी पूरी दुनिया में मशहूर है। लंदन की स्कॉटलैंड यार्ड की पुलिस बीते कई वर्षों में पेचीदा मामलों को इसी नस्ल के डॉगीज की बदौलत चुटकियों में सुलझाती आई है। यह ऑस्ट्रेलिआ की पसंदीदा नस्ल है जो स्वभाव से नेकदिल, प्यार बरसाने वाला और एक सच्चा सहायक के रूप में जाना जाता है।

मेरे मित्र के घर में टोबो का आना किसी परीकथा से कम नहीं था। एक बड़े बक्से से निकले दो छोटे-छोटे बच्चे एक टोबो और दूसरा ब्लू। 23 दिसंबर , 2006 ...इस परिवार के लिए खुशियों भरा दिन था जब उनके घर के आंगन में दो और 'बच्चे' आ गए। ये इंसानी बच्चे नहीं थे लेकिन इन मासूम पपीज के चेहरे की मासूमियत और संजीदगी को देखकर बरबस किसी को भी इनके प्रति प्यार उमड़ आए। टोबो और ब्लू के साथ खुशियां जरूर आई लेकिन साथ में इनके आगमन ने 'मीठे आतंक' के साथ घर में 'नटखट अंदाज' को भी बखूबी पिरोया। मेरे मित्र के परिवार ने इन्हें बच्चों की तरह अपनाया और इन्होंने अपने पड़ोसियों को सख्त हिदायत भी दे डाली। 'ये डॉगी तो है लेकिन हमारे लिए हमारे घर के बच्चे है, अब हमारे घर में दो नहीं बल्कि चार बच्चे हो गए है, आप इन्हें इनके नाम यानी टोबो और ब्लू से पुकारे'।

समय ने अपनी रफ्तार में कुछ करवट ली तो फिर इनकी मीठी शरारतों का दौर शुरु होकर बढ़ता चला गया। इनके दांतों में ताकत आई और इन दोनों ने अपनी ताकत की आजमाइश रिमोट, जूते, कपडे, कुर्सी, मेज के पाये और मोबाइल पर करना शुरू कर दिया।

इस नस्ल के डॉगीज भोंक-भोंक कर प्यार जताना चाहते है। टोबो और ब्लू ने भी उसी कुदरती तकनीक का अनुसरण किया जो इनकी रगों में बसता था। इस दौरान इनकी ट्रेनिंग भी होती रही। इनकी शरारतों में भी इजाफा होता रहा। टोबो शारीरिक रूप से थोड़ा निर्बल रहा। उसे बीमारियां जल्द पकड़ लेती थी और वह इन्फेक्शन का शिकार जल्दी हो जाता । इन सबके बावजूद टोबो बेहद एक्टिव रहा। वह बीमार होने के बावजूद चंद दिनों में फिर उसी नटखट शरारतों के साथ सबका मन मोह लेता। ब्लू और टोबो । ऐसा लगता जैसे दोनों एक दूसरे के बगैर नहीं रह सकते। बीमारी टोबो को जरूर घेरती लेकिन कुछ ही दिनों वह सेहतमंद हो जाता । लिहाजा मेरे मित्र का परिवार भी उसकी शरारत भरी अटखेलियों में खो जाता। लेकिन परिवार उस खौफ को लेकर अनजान था क्योंकि टोबो की जिंदगी की डोर कमजोर होती चली जा रही थी। हम जन्म में तो खुशियां और उत्सव मनाते है लेकिन मौत के बारे में सोचने या विचार करने से भी ही डरते है। क्योंकि विचारों में पनपने वाली मौत कभी-कभार हकीकत के मौत के सामान ही नजर आती है।

इसी साल 2015 को होली के दिन पूरे परिवार ने नाश्ता किया। परिवार के सभी सदस्य टीवी देख रहे थे तभी टोबो अचानक लड़खड़ा कर गिर पड़ा। टोबो की नाक में जोर-जोर से सांस दी गई। चंद मिनटों में वह ठीक हो गया। फिर पहले की तरह शरारती अंदाज में घर में उधम मचाने लगा। लेकिन टोबो की बीमारी ठीक होने का नाम नहीं ले रही थी। उसे उल्टियां होती। वह पहले की तरह कुछ भी खाता-पीता नहीं था। टोबो का इलाज चल रहा था लेकिन इस बार उसकी बीमारी ठीक होने का नाम नहीं ले रही थी। उसकी हालत बिगड़ती चली गई। टोबो का शरीर टूटता जा रहा था लेकिन खुद को वह हमेशा एक शेरदिल की तरह दिखाने की कोशिश भी कर रहा था।

मेरे मित्र कहते है- टोबो की आंखों में मेरे परिवार ने प्यार करने और प्यार देने की ख्वाहिश देखी। वह अपनी बीमार और बोझिल होती आंखों से भी जिंदगी जीना सीखा रहा था। जिंदगी और मौत के इस जंग में अब जिंदगी की डोर टूट रही थी और मौत ने अपने कदम तेजी से बढ़ाए थे। टोबो इस बीमारी में भी अपने आखिरी दिनों में खुद बाहर जाता था। उसकी बढ़ती बीमारी ने परिवार को बेचैन कर दिया। उसके इलाज की तमाम दवाइयां उसपर बेअसर साबित हो रही थी। टोबो का शरीर टूट रहा था लेकिन उसकी आंखों में अब भी वहीं निर्निमेष प्यार दिखता। मानो वो कहा रहा हो - 'मैं चला भी गया तो मेरी यादें यहीं रहेंगी'।

फिर इस परिवार ने अपने 'बच्चे' यानी टोबो की खातिर उसके मूड को बदलने के लिए भरतपुर और ओखला पक्षी विहार ले जाने का फैसला किया। इस नस्ल के डॉगीज अच्छे तैराक होते है। पानी से अटखेलियां करना उन्हें खूब भाता है। टोबो ओखला विहार में घंटों घूमा। पानी में मजे लेकर तैरता रहा। पानी के साथ इस अटखेलियां भरे छपाकों में मौत के आहट की वो गूंज तेज होती चली जा रही थी। लेकिन किसे मालूम था कि टोबो जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहा था। उसे तकलीफ होती थी लेकिन उसे वह अपनी आखों या फिर चेहरे के भावों पर नहीं आने देता।

जिदंगी का फलसफा अब बुरे दिनों को तेजी से बुन रहा था। टोबो की दोनों किडनियां जवाब दे रही थी। पूरे एक महीने तक उसकी डायलिसिस चली। इस दौरान वह दर्द से कराहता जिसे परिवार के सदस्यों के लिए देख पाना मुश्किल दौर था। टोबो के इलाज के साथ बुढ्ढे दरजी बाबा, पान वाले सब उसके लिए दुआएं कर रहे थे। लेकिन अब टोबो पर ना तो दवा और ना ही दुआ का असर होता दिख रहा था। देखते-देखते 28 दिन बीत गए थे और उसने कुछ भी नहीं खाया था। ना वह कुछ खाता ना उसने कुछ पीया। इसी बीच टोबो एक दिन डॉक्टर के यहां जा रहा था तभी अचानक से वह कई सीढ़ियों चढ़ गया। मेरे मित्र यह देखकर हैरान रह गये। फिर टोबो ने पलटकर देखा मानो वह कह रहा हो - अलविदा दोस्त।

अंतिम चार दिन उसके लिए काफी भारी थे जब वह बेहद तकलीफ में रहा। 12 अप्रैल की रात उस परिवार के लिए बेहद बुरी रात साबित हुई। टोबो की सांसें जवाब दे रही थी। उस वक्त मेरे मित्र और उनका बेटा घर पर नहीं थे। जब आए तो उनके बेटे ने गोद में लेकर उसका हालचाल पूछा। टोबो ने आंखें खोली और आखिरी हिचकी लेकर अपनी सांसें हमेशा के लिए रोक ली। चंद सेकेंड में टोबो ने आंखों से कुछ कहते हुए दुनिया को अलविदा कह दिया था। टोबो नहीं रहा यह उस परिवार के साथ उसकी बहन जैसी ब्लू पर भी उतना ही भारी था। वह उसके करीब बैठी रही । उसे एकटक देखती रही। शायद उसने परिवार को हौसला देने के लिए अपने आंसुओं को समेट लिया था। हर वक्त खुशियां देने वाले टोबो के लिए अब सब रोने लगे। ऐसा हो गया जिसपर यकीन करना इतना सहज नहीं था। ब्लू हौसले की खातिर आंसुओं को सोखकर बैठी रही।

फिर मेरे मित्र के परिवार ने टोबो को सम्मानजनक अंतिम विदाई देने का फैसला किया । उन्हें यह पता चला कि दिल्ली के छतरपुर के पास 'पॉश टू हेवन' एक जगह है जहां बिजली के द्वारा शवदाह किया जाता है। टोबो का अंतिम संस्कार कर दिया गया। मित्र के परिवार में हर सदस्य के आंसू नहीं थम रहे थे। टोबो की अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए पूरा पड़ोस आया था। टोबो की अस्थियां हरिद्वार के गंगा में विसर्जित कर दी गई।

जिंदगी की पटकथा अब मौत ने हमेशा के लिए छीन ली थी। टोबो चला गया लेकिन उसकी यादें घर में हर जगह वहां की फिजाओं में तैरती है। कंप्यूटर के डी ड्राइव में 13 दिन से उसके बड़े होने की हर यादें मौजूद है। उसके खाने का बरतन अब नहीं खनकता। बर्तन भी टोबो की तरह खामोश हो गया। ब्लू की शरारतें अब पहले जैसी नहीं । टोबो के नहीं होने से उसके भौंकने का अंदाज भी अब अधूरा लगता है। मीठी शरारतों और नटखट से भरपूर अंदाजों का वह पुराना डबलडोज वाला माहौल फीका और नीरस हो गया है। अब इन फिजाओं में ना जाने कौन सी बेचैनी है । वो रवानी नहीं जिसमें कभी टोबो और ब्लू की शरारातों का कभी ना खत्म होने वाला वक्त गूंजा करता था। ब्लू अकेलेपन में खुद के साथ उस परिवार को भी मजबूत करने में जुटी है जिस परिवार के घर-आंगन में वह अबतक अठखेलियां करती आई है।

टोबो से मेरा लगाव चंद साल पहले से रहा। जब मैं उनके घर जाता तो वह मेरे पास आता। शुरुआत में मुझे डर लगता। क्योंकि मैं उसके भारी-भरकम शरीर से डरता था लेकिन बाद में उसकी आंखों में मैंने दोस्ती की चाहत देखी। टोबो मॉर्निंग वॉक करता तो मैं भी कभी-कभी उसके साथ हो लेता। वह तेज दौड़ता था और मुझे थका देता था। लेकिन फिर तब तक रुका रहता जबतक की मेरी सांसे फूलनी बंद नहीं हो जाती। फिर दौड़ जाता और यह सिलसिला चलता रहता। टोबो ने मुझसे दोस्ती की खातिर जितने कदम बढ़ाए थे शायद मैं उसे समझ नहीं पाया। 11 अप्रैल मेरा जन्मदिन होता है। अमूमन मैं इसे मनाने से परहेज करता हूं। लेकिन 12 अप्रैल को टोबो के जाने की खबर सुनकर मुझे धक्का लगा। मैं एक ऐसे अंतद्वंद के बीच जी रहा था कि जब मुझे लगा कि आसक्ति हमें किसी के भी करीब ला खड़ा करती है। जिंदगी की इन अजीबोगरीब कुलांचों के बीच मन में एक कसक तो रह ही गई कि काश टोबो के साथ मैं उन शरारतों में शामिल होता जो उस परिवार के लिए खुशियों के सबब और जीने की चाह थे।

मेरे मित्र कहते हैं- 'टोबो के बगैर अब जीवन सूना है। मैंने टोबो से जिंदगी की कुछ बारीकियां सीखी जिसे अब मैं अपने जीवन के कई क्षेत्रों में इस्तेमाल कर रहा हूं। टोबो की कहानी जिंदगी के उस फलसफे को कहने की कोशिश भर है कि प्यार सिर्फ इंसानी रिश्ते में ही नहीं होता। अगर ऐसा होता तो प्यार का यह सबसे संकुचित रूप होता। इंसानियत जिंदगी के हर उस जीव को प्यार करना सिखाती है जो धरती पर जन्म लेता और निवास करता है। जिंदगी के इसी मरहले में इंसानियत की एक अहम जिम्मेदारी मोहब्बत भी है जिसके लिए देश-काल और पात्र बेमानी हो जाते हैं।