बिहार को गरीबी से दूर करने के लिए मिले विशेष श्रेणी का दर्जा: नरेंद्र कुमार
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बिहार को गरीबी से दूर करने के लिए मिले विशेष श्रेणी का दर्जा: नरेंद्र कुमार

अगर केंद्र राष्ट्रीय भावना से अनुच्छेद 370 को खत्म कर सकता है तो बिहार को विशेष श्रेणी के राज्यों में जोड़ने के लिए अनुच्छेद 371 में समान स्तर का संशोधन क्यों नहीं? 

बिहार को गरीबी से दूर करने के लिए मिले विशेष श्रेणी का दर्जा: नरेंद्र कुमार

वित्त वर्ष 2020-21 में बिहार की विकास दर 10 प्रतिशत से अधिक थी लेकिन अभी भी 50 फीसदी से अधिक आबादी गरीब है और जीवन की बुनियादी जरूरत के लिए लड़ रही है, इसे सुधारने का समाधान है, या तो एक बड़ा केंद्रीय अनुदान या विशेष श्रेणी के राज्य का दर्जा होना चाहिए. 14वें योजना आयोग के अनुसार बिहार विशेष राज्य बनने की पात्रता नहीं रखता, लेकिन इन निर्धारित पात्रताओं के अंतर्गत आने वाले राज्यों से भी बिहार की स्थिति बदत्तर है.

केंद्र नियमों में संशोधन करने से हिचकिचा रही
निर्धारित पात्रताओं के अनुसार विशेष राज्य बनने के लिए राज्य का भौगोलिक रूप से वंचित और विरल आबादी वाला होना आवश्यक है. पहाड़ी क्षेत्रों वाले राज्यों को इन शर्तों के तहत अहर्ता प्राप्त है, जबकि बिहार में पहाड़ी इलाके ना होने के कारण बिहार के पास यह योग्यता नहीं है. और केंद्र सरकार विशेष राज्य के लिए निर्धारित की गई पात्रताओं में संशोधन करने से हिचकिचा रही है.

बिहार को क्यों मिलना चाहिए 'विशेष राज्य' का दर्जा? 

बिहार भारत का सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित राज्य है. यहां देश की कुल बाढ़ प्रभावित आबादी का 22.1 प्रतिशत हिस्सा बिहार का ही है. अगर भौगोलिक क्षेत्र की बात करें तो यहां का 73.06 फीसदी इलाका बाढ़ की मार झेलने को विवश है. 

राज्यों में, बिहार में गरीब लोगों का अनुपात सबसे अधिक है-इसकी आबादी का 51.91 प्रतिशत-जो बहुआयामी गरीब हैं. बिहार के ग्यारह जिलों में गरीबी अनुपात 60 फीसदी से ऊपर है, जिसमें किशनगंज में 64.75 फीसदी की उच्चतम दर है, इसके बाद अररिया (64.65%), मधेपुरा (64.43%), पूर्व चंपारण (64.13), और सुपौल (64.10%) हैं. 

अगर भारत के दूसरे विशेष राज्यों में प्रति व्यक्ति आय देखें तो उसके मुकाबले बिहार की प्रति व्यक्ति आय बेहद कम है. 2019-20 के वित्तीय वर्ष में बिहार में प्रति व्यक्ति औसत आय Rs. 50,735 रही है. जाहिर है निर्धारित प्रति व्यक्ति आय के अनुसार बिहार की प्रति व्यक्ति आय विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त अन्य राज्यों से काफी कम है. जिस भी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा मिला उन सभी राज्यों ने तेज गति से विकास किया है.

बिहार में जनसंख्या का घनत्व 1307 व्यक्ति/ वर्ग किमी से अधिक है, जो देश की औसत से लगभग तीन गुना अधिक है. जनसंख्या में 25 वर्ष से कम आयु वर्ग की हिस्सेदारी 58 प्रतिशत है और जनसंख्या वृद्धि दर भी सर्वाधिक है. इससे स्पष्ट है कि बिहार में मानव संसाधन विकास के प्रयासों की अधिक आवश्यकता है. 

अगर वैश्विक आबादी 100 है, तो कम से कम 90 लोगों का जीवनस्तर बिहार के एक औसत व्यक्ति से बेहतर है. संतुलित क्षेत्रीय विकास करने के लिए नीतियों में बड़े बदलाव की जरुरत है. साल 1952 में, औद्योगीकरण के रूप में सस्ते प्राकृतिक संसाधनों वाले बिहार व भारत के कई हिस्सों में शुरू हुआ, लेकिन बिहार को इसका लाभ नहीं मिला, वर्ष 2000 में झारखंड बनने के बाद हालात और भी बदत्तर हो गए हैं. बिहार ने औद्योगीकरण के साधन खो दिए हैं. अब राज्य के पास रोजगार और आर्थिक विकास के लिए संसाधन सीमित हैं, अपने बजटीय संसाधनों को पूरा करने के लिए बिहार केंद्र पर अधिक निर्भर है. 

 
विशेष आर्थिक पैकेज नहीं विशेष श्रेणी राज्य के दर्जे की मांग  
बिहार की गरीबी की तुलना अन्य राज्यों से नहीं की जा सकती है. बिहार में 51% से अधिक लोग गरीब है दूसरी तरफ विशेष श्रेणी के राज्यों जैसे हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड ने गरीबी सूचकांक में अच्छा सुधार दिखाया है, लेकिन दोहरे अंकों में जीडीपी विकास दर के बावजूद बिहार राष्ट्रीय औसत गरीबी सूचकांक को पूरा करने में सक्षम नहीं है. यदि केंद्र गरीब राज्यों पर ध्यान दे रहा है तो अन्य राज्यों को भी बिहार को विशेष श्रेणी राज्य की मान्यता दिए जाने से कोई समस्या नहीं होनी चाहिए.  

राज्य में निवेश को आकर्षित करने एवं उद्यमियों को अन्य राज्यों के उद्यमियों से प्रतिस्पर्धा  करने के लिए यह दर्जा मिलना आवश्यक है. इसके साथ ही करों में भी छूट मिलनी चाहिए. 

बाढ़ से होने वाले नुकसान
बिहार में हर साल आने वाली बाढ़ से कई हजार करोड़ का नुक्सान होता है. केंद्र सरकार से मिलने वाला पैसा इन्हीं नुकसानों की भरपाई में जाता है जब कोसी और बागमती नदी में आई बाढ़ से बिहार उबरता है तब गंगा में बाढ़ आ जाती है इसके बाद किसी और में ऐसे ही केंद्र सरकार से मिलने वाला पैसा इन्ही नुकसानों की भरपाई में जाता है. अभी बिहार को केंद्र सरकार से जो सहायता मिलती है उसमें 70 फीसदी कर्ज होता है और 30 फीसद अनुदान मिलता है और अगर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिल जाए तो केंद्र सरकार से जो सहायता बिहार को मिलेगी उसमे 90 प्रतिशत अनुदान होगा और 10 प्रतिशत ही कर्ज होगा. इसके बाद जो पैसा बचेगा उसे केंद्र सरकार को वापस नहीं करना पड़ेगा. उस धन राशि को बिहार अगले वर्ष में विकास कार्यों में इस्तेमाल कर सकता है.

बेरोजगारी होगी दूर
विशेष श्रेणी के राज्य के रूप में मान्यता के साथ, बिहार में औद्योगीकरण को बढ़ावा मिलेगा क्योंकि बिहार में स्थापित करने के इच्छुक उद्योग के लिए अन्य राजस्व प्रोत्साहन के साथ-साथ आयकर कम होगा, निश्चित रूप से यह बिहार को वर्तमान बेरोजगारी को हल करने में मदद करेगा.
  
नीति आयोग की रिपोर्ट में भी जिक्र 
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार बिहार सबसे पिछड़ा राज्य है. जबकि बिहार ने बिना किसी उद्योगिकीकरण और विशेष अनुदान के 15-16% का विकास दर प्राप्त किया है. जिसे नीति आयोग ने साफ अनदेखा किया है ऐसे में अगर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त हो जाए तो यह संभव है की 100% की विकास दर भी प्राप्त कर ले. हरियाणा और पंजाब से कृषि के मामले में बिहार की तुलना करने पर साफ पाएंगे की कम संसाधन और बजट के बावजूद बिहार में विकास की दर काफी अच्छी रही है. 

बिहार का विभाजन पिछड़ेपन का कारण
जब बिहार और झारखण्ड का विभाजन हुआ और उस विभाजन के फलस्वरूप करीब 67 प्रतिशत राजस्व स्रोत झारखंड में चले गए, और केवल 33 प्रतिशत बिहार में रह गए जबकि कुल आबादी का 65 प्रतिशत बिहार में था और मात्र 35 प्रतिशत झारखंड में गया.

कल-कारखाने, खनिज सम्पदा और बहुमूल्य लकड़ियों का जंगल झारखंड में है तो कृषि आधारित अर्थव्यवस्था जो कहीं बाढ़ तो कहीं सूखे से तबाह रहती है वो बिहार का हिस्सा बनी है. 

(Disclaimer: ये लेखक के निजी विचार हैं. इससे संस्थान और यहां संबंधित किसी भी व्यक्ति का कोई लेना-देना नहीं हैं.)

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