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बिहार में कुपोषण, अधिक तापमान बनता है नौनिहालों का काल!

आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं कि जिस वर्ष 40 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान लंबे समय तक रहा, उस साल मृतकों की संख्या में वृद्धि देखी गई है.

बिहार में कुपोषण, अधिक तापमान बनता है नौनिहालों का काल!
तापमान और कुपोषण हो रही है बच्चों की मौत.

मुजफ्फरपुर : बिहार में पिछले कई वर्षो से गर्मी के मौसम में बच्चों के लिए काल बनकर आ रहा चमकी बुखार या एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) बीमारी का कहर इस साल भी जारी है. इस बीमार से अबतक 150 से अधिक बच्चों की मौत हो गई है. इस बीमारी के सही कारणों का तो अबतक पता नहीं चल सका है, परंतु जानकारों का कहना है कि इसका मुख्य कारण कुपोषण और तापमान व वातावरण में अधिक नमी है. 

आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं कि जिस वर्ष 40 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान लंबे समय तक रहा, उस साल मृतकों की संख्या में वृद्धि देखी गई है. मुजफ्फरपुर के वरिष्ठ शिशु रोग चिकिसक डॉ. अरुण शाह बताते हैं कि बच्चों की मौतों के इस सिलसिले के पीछे गरीबी और कुपोषण असली वजह है.

इस बीमारी को लेकर काम कर चुके शाह कहते हैं कि यह बीमारी न तो किसी वायरस से हो रही है, न बैक्टीरिया से और न ही संक्रमण से. इस बीमारी के लक्षणों में बुखार, बेहोशी और शरीर में झटके लग कर कंपकंपी छूटना शामिल हैं. 

उन्होंने बताया कि एईएस से पीड़ित बच्चों में अधिकांश गरीब तबके से आते हैं. उन्होंने कहा, "कुपोषित बच्चों के शरीर में रीसर्व ग्लाइकोजिन की मात्रा भी बहुत कम होती है, इसलिए लीची खाने से उसके बीज में मौजूद मिथाइल प्रोपाइड ग्लाइसीन नामक न्यूरो टॉक्सिनस जब बच्चों के भीतर एक्टिव होते हैं, तब उनके शरीर में ग्लूकोज की कमी हो जाती है."

शाह हालांकि लीची को बच्चों की मौतों के लिए जिम्मेदार नहीं मानते. वह इसके लिए मुख्य रूप से कुपोषण को जिम्मेदार बताते हैं. डॉ. शाह आगे कहते हैं, "तापमान, कुपोषण और टाक्सिक पदार्थ मिल कर बच्चों को हाइपोग्लाइसिमिया का शिकार बना देते हैं, जिससे बच्चे इस बीमारी की चपेट में आ जाते हैं."

चर्चा यह भी है कि पेस्टीसाइड भी इसकी एक वजह हो सकती है. लेकिन शाह इससे इंकार करते हैं. उन्होंने कहा कि अभी तक ऐसा कुछ नहीं पाया गया है.

मुजफ्फरपुर के श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (एसकेएमसीएच) के शिशु रोग विभाग के प्रमुख डॉ़ जी़ एस़ सहनी कहते हैं, "इस साल एईएस से पीड़ित पंजीकृत मरीजों में से 90 प्रतिशत हाइपोग्लाइसिमिया (रक्त में शुगर की कमी) के मामले हैं. पिछले वर्षो में भी ऐसे 60-70 प्रतिशत मामले आए थे."

सहनी तापमान में वृद्धि और वातावरण में नमी को भी एईएस का कारण मानते हैं. वह कहते हैं, "गरमी के दिनों में यहां का अधिकतम तापमान आमतौर पर 38 डिग्री सेल्सियस और आद्र्रता 60 प्रतिशत बनी रहती है. आद्र्रता का प्रतिशत रात में भी ऐसा ही बना रहता है, जो एईएस के लिए मुजफ्फरपुर को अतिसंवेदनशील बनाती है."

उन्होंने कहा कि कई जगहों पर दिन गर्म रहता है, परंतु रातें अपेक्षाकृत ठंडी हो जाती हैं. लेकिन मुजफ्फरपुर में रात में भी वातावरण में नमी बनी रहती है.

उन्होंने कहा, "मैं यहां 2005 से एईएस से पीड़ित बच्चों का इलाज कर रहा हूं. वर्षो से उपचार के दौरान इसके मुख्य कारण गर्मी, कुपोषण और आद्र्रता ही सामने आए हैं." 

उल्लेखनीय है कि मुजफ्फरपुर में एईएस का पहला मामला 1995 में प्रकाश में आया था. इस बीमारी को लेकर कोई निश्चित कारण अब तक सामने नहीं आया है. लेकिन जिन सालों के दौरान उच्च तापमान और वातावरण में अधिक नमी (आद्र्रता) रही, इस बीमारी का कहर ज्यादा देखने को मिला है. 

इस बारे में मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच के मेडिकल सुपरिटेंडेंट सुनील शाही भी समय से अच्छी बारिश होने को इस बीमारी से बचाव मानते हैं. उन्होंने आईएएनएस से कहा, "वर्ष 1995 से यही हो रहा है कि अगर बारिश समय से हुई तो यह बीमारी अपने आप खत्म हो जाती है. अगर आज अच्छी बारिश हो जाए तो यह बीमारी समाप्त हो जाएगी."

आंकड़ों को देखें तो वर्ष 2012, 2013, 2014 और 2019 में एईएस से बच्चों की सबसे अधिक मौतें हुईं. इन वर्षो में मई और जून का अधिकतम तापमान 40 डिग्री या इससे ऊपर रहा. वर्ष 2012 में जब मई महीने का तापमान 42 डिग्री और जून का 41 डिग्री सेल्सियस रहा, तो 275 बच्चों की मौत हुई. वहीं, 2014 में मई और जून माह में 41 डिग्री सेल्सियस तापमान रहा तो सर्वाधिक 355 बच्चों की मौतें हुईं. जबकि वर्ष 2019 में मई माह में में पिछले 10 सालों में सर्वाधिक तापमान 43 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है.