DNA ANALYSIS: स्वच्छ शहरों की रेस में इंदौर सबसे आगे, सिखाए स्वच्छता के ये 'सबक'

कहते हैं कि एक साफ शरीर में ही साफ मन का वास होता है. लेकिन एक साफ शरीर और साफ मन किसी गंदे शहर में नहीं रह सकता. इसलिए आज हम देश के उन शहरों की बात करेंगे जो इस साल के स्वच्छ सर्वेक्षण में देश के सबसे साफ सुथरे शहर साबित हुए हैं और हम आपको उन शहरों के बारे में भी बताएंगे जो इस रैंकिंग के हिसाब से देश के सबसे गंदे शहर हैं.

DNA ANALYSIS: स्वच्छ शहरों की रेस में इंदौर सबसे आगे, सिखाए स्वच्छता के ये 'सबक'

नई दिल्ली: कहते हैं कि एक साफ शरीर में ही साफ मन का वास होता है. लेकिन एक साफ शरीर और साफ मन किसी गंदे शहर में नहीं रह सकता. इसलिए आज हम देश के उन शहरों की बात करेंगे जो इस साल के स्वच्छ सर्वेक्षण में देश के सबसे साफ सुथरे शहर साबित हुए हैं और हम आपको उन शहरों के बारे में भी बताएंगे जो इस रैंकिंग के हिसाब से देश के सबसे गंदे शहर हैं. इस सर्वेक्षण के अनुसार देश का सबसे साफ सुथरा शहर मध्य प्रदेश का इंदौर है जबकि 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में पटना को देश का सबसे गंदा शहर माना गया है.

देश की राजधानी दिल्ली के कई इलाके रैंकिंग में काफी पीछे
पिछले तीन वर्षों की तरह इंदौर को इस साल भी स्वच्छ सर्वेक्षण में पहला स्थान मिला है यानी इंदौर देश का सबसे साफ सुथरा शहर है. दूसरे नंबर पर गुजरात का सूरत और तीसरे नंबर पर महाराष्ट्र का नवी मुंबई शहर है. हैरानी की बात ये है कि देश की राजधानी दिल्ली के कई इलाके इस रैंकिंग में काफी पीछे हैं.दक्षिण दिल्ली को इस रैंकिंग में 31वां स्थान मिला है, जबकि उत्तरी दिल्ली 43वें और पूर्वी दिल्ली 46वें नंबर पर है. हालांकि इस रैंकिंग में सबसे साफ राजधानियों के मामले में Union Teritorry Of New Delhi यानी नई दिल्ली पहले स्थान पर है.

एक लाख से कम जनसंख्या वाले शहरों की श्रेणी में महाराष्ट्र के तीन शहर Top Three में हैं. इन शहरों के नाम हैं- कराड, सासवाड और लोनावला.

जिन राज्यों में शहरों की संख्या 100 से ज्यादा है उन राज्यों में साफ सफाई के मामले में पहले नंबर पर छत्तीसगढ़ है. वहीं जिन राज्यों में शहरों की संख्या 100 से कम है उनमें पहले स्थान पर झारखंड है. अब आप सोचिए ये वो दो राज्य हैं जिन्हें अक्सर भारत के सबसे पिछड़े राज्यों में गिना जाता है. लेकिन साफ सफाई के मामले में झारखंड और छत्तीसगढ़ देश के बड़े-बड़े राज्यों से आगे निकल चुके हैं. 100 से ज्यादा शहरों वाले राज्यों में कर्नाटक आखिरी नंबर पर है, जबकि 100 से कम शहरों वाले राज्यों में सबसे बुरी स्थिति अरुणाचल प्रदेश की है.

गंगा के किनारे बसे जिन शहरों की जनसंख्या 1 लाख से ज्यादा है, उनमें वाराणसी पहले नंबर पर है. दूसरे नंबर पर कानपुर है और सबसे आखिरी नंबर पर उत्तर प्रदेश का गाजीपुर शहर है.

ये है भारत का सबसे गंदा शहर
अगर भारत के सबसे गंदे शहरों की बात की जाए तो 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में बिहार की राजधानी पटना पहले नंबर पर है. दूसरे नंबर पर पूर्वी दिल्ली और तीसरे नंबर पर चेन्नई है. 10 लाख से कम आबादी वाले शहरों में सबसे बुरी स्थिति बिहार के गया की है. दूसरे नंबर पर बिहार का बक्सर शहर है और तीसरे नंबर पर पंजाब का अबोहर शहर है. अब इन गंदे शहरों के लोगों को अपने स्थानीय विधायक और सांसदों से ये पूछना चाहिए कि वो इन शहरों को साफ सुथरा बनाने में असफल क्यों रहे हैं.

आज हम ये समझने की कोशिश करेंगे कि साफ सफाई के मामले में जो काम 4 साल से इंदौर कर रहा है, वो काम पटना, पूर्वी दिल्ली, गया या चेन्नई जैसे बाकी शहर क्यों नहीं कर पा रहे हैं.

इसके लिए आपको इंदौर के प्रशासन और वहां के नागरिकों के प्रयासों के बारे में जानना होगा.

इंदौर ने इस तरह किया काम
इंदौर में सबसे पहला काम ये किया गया कि वहां के नागरिकों से अलग-अलग प्रकार के कूड़े का अलग-अलग निस्तारण करने के लिए कहा गया. उदाहरण के लिए लोगों से कहा गया कि वो गीला कूड़ा एक जगह पर जमा करें , सूखा कूड़ा एक जगह पर. और जिस कूड़े में खाने पानी की चीजें होती हैं, जैसे फल और सब्जियां उन्हें अलग से जमा किया जाए.

इंदौर का कोई भी नागरिक अगर ऐसा नहीं करता तो सफाई कर्मचारी फौरन इसकी सूचना अधिकारियों को देते हैं और अधिकारी ऐसे नागरिकों पर जुर्माना लगा देते हैं.

इंदौर के लोगों में साफ सफाई की आदत पैदा करने के लिए वहां का Municipal Corporation लगातार नागरिकों से संवाद करता है और उन्हें साफ सफाई का महत्व बताता है. इसके लिए एनजीओ की मदद भी ली जाती है.

इसके अलावा इंदौर में जमा किए गए कूड़े पर नजर रखने के लिए एक कमांड सेंटर भी बनाया गया है और कूड़ा इकट्ठा करने वाली सभी गाड़ियों पर जीपीएस ट्रैकर्स लगाए गए हैं. इन जीपीएस ट्रैकर्स की मदद से सभी रूटों पर नजर रखी जाती है और किसी कूड़े वाली गाड़ी के खराब होने पर फौरन दूसरी गाड़ी वहां भेज दी जाती है.

इसके अलावा इंदौर से बड़े बड़े सार्वजनिक कूड़ेदान हटा दिए गए हैं और इसकी जगह घर-घर जाकर कूड़ा इकट्ठा किया जाने लगा. इंदौर के ज्यादातर लोग अपनी गाड़ियों में भी डस्टबिन रखते हैं ताकि वो कोई भी कूड़ा करकट सड़क पर न फेंके.

इंदौर में सड़कों की साफ सफाई सुबह की बजाय रात में की जाने लगी है. अब वहां दुकानों से कूड़ा शाम को इकट्ठा किया जाता है और रात में सड़कों की साफ सफाई शुरू हो जाती है. इसका एक फायदा ये होता है कि जब इंदौर के लोग सुबह अपने घरों से बाहर निकलते हैं तो उन्हें अपना शहर साफ सुथरा दिखाई देता है और सफाई के दौरान उठने वाली धूल भी उन्हें परेशान नहीं करती.

इंदौर में कूड़ा उठाने वाली गाड़ियों के ​कंटेनर्स के आकार और क्षमता को भी बढ़ाया गया. पहले एक गाड़ी 300 घरों से कचरा जमा कर पाती थी लेकिन अब एक गाड़ी 1 हजार घरों से कूड़ा इकट्ठा करती है.

इंदौर में जब किसी का विवाह होता है तो कई बार पति पत्नी सात की जगह 8 फेरे लेते हैं और 8वें फेरे में वो अपने घर और शहर को साफ रखने का वचन देते हैं. यहां तक कि कई बार विवाह समारोह में आने वाले मेहमानों को तोहफे के तौर पर डस्टबिन भी दिए जाते हैं.

इंदौर के प्रशासन ने लोगों को साफ सफाई के प्रति जागरूक करने के लिए बच्चों का सहारा लिया और बच्चों को स्वच्छता का ब्रांड एम्बेसडर बनाकर बड़ों को साफ-सफाई की सीख दी.

भारत में अभी हर साल 56 करोड़ किलोग्राम कूड़ा जेनरेट होता है
भारत में प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 900 ग्राम कूड़ा जमा होता है यानी साल भर में भारत का एक नागरिक औसतन 325 किलोग्राम कूड़ा जमा करता है. इस मामले में चेन्नई सबसे आगे है जहां प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 710 ग्राम कूड़ा जमा होता है यानी साल भर में 260 किलोग्राम कूड़ा. दूसरे नंबर पर कोलकाता है जहां हर व्यक्ति हर साल 240 किलोग्राम कूड़ा जमा करता है. प्रति व्यक्ति 228 किलोग्राम कूड़े के साथ दिल्ली और हैदराबाद तीसरे स्थान पर हैं.

भारत में अभी हर साल 56 करोड़ किलोग्राम कूड़ा जेनरेट होता है. लेकिन पर्यावरण मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2030 तक भारत में प्रतिवर्ष पैदा होने वाले कूड़े की मात्रा 1 लाख 45 हजार करोड़ किलोग्राम हो जाएगी, जबकि वर्ष 2050 तक भारत में आज के मुकाबले 7 गुना ज्यादा कूड़ा होगा और इस कूड़े का वजन होगा 4 लाख करोड़ किलोग्राम.

आप सोच रहे होंगे कि जब भारत में इतना कूड़ा पैदा होता है, तो फिर सड़कों पर हर जगह कूड़े के ढेर क्यों नहीं दिखाए देते. तो इसके लिए आपको कूड़ा इकठ्ठा करने वाले सफाई कर्मचारियों को थैंक यू कहना चाहिए.

ये लोग न सिर्फ आपके घर का कचरा जमा करते हैं, बल्कि उसका वर्गीकरण भी करते हैं. यह एक असंगिठत क्षेत्र है फिर भी ये लोग बड़े संगठित तरीके से कूड़ा इकट्ठा करते हैं.

इसलिए अब सरकार भी इन्हें संगठित करने की योजना शुरू कर चुकी है. जिसके तहत इन्हें वैज्ञानिक तरीके से कूड़े उठाने की ट्रेनिंग दी जाने लगी है.

तीन तरीकों से मैनेज किया जाता कूड़ा
यहां हम आपको एक और जानकारी देना चाहते हैं. आपके घरों से जो कूड़ा निकलता है उसे तीन तरीकों से मैनेज किया जाता है. पहला तरीका है कूड़े से खाद बनाना. दूसरा तरीका है उसे रिसाइकल करना जैसे प्लास्टिक को रिसाइकल करके फिर से इस्तेमाल करने लायक बनाया जाता है.

जबकि तीसरे तरीके के तहत कूड़े को ऊर्जा में बदल दिया जाता है और उससे बिजली बनाई जाती है. इंदौर इन सभी तरीकों का इस्तेमाल करके और अपने शहर के सफाई कर्मियों को ज्यादा सक्षम बनाकर लगातार 4 साल से देश का सबसे स्वच्छ शहर बना हुआ है. स्वच्छ शहर का खिताब शहर के सफाई कर्मचारियों की मेहनत का नतीजा है और स्वच्छता के मामले में इंदौर के मिसाल बनने बनने की कहानी किसी प्रेरणा से कम नहीं है.

स्वच्छता आंदोलन की नींव सफाई कर्मचारियों पर
बहुत पुरानी नहीं बात नहीं है, जब वर्ष 2015 में इंदौर शहर साफ-सफाई के मामले में 149वें नंबर पर था. लेकिन महज दो वर्षों में इंदौर, देश का सबसे साफ सुथरा शहर बन गया. ये किसी चमत्कार से कम नहीं है, और ये चमत्कार हुआ है - इंदौर के 32 लाख से ज्यादा लोगों के सामूहिक प्रयासों से.

-इंदौर के इस स्वच्छता आंदोलन की नींव टिकी है उन सफाई कर्मचारियों पर, जो दिन-रात शहर को साफ रखने के मिशन में जुटे रहते हैं और उन नीतियों पर जिनका पालन आज इंदौर का हर नागरिक पूरी निष्ठा के साथ करता है.

-साढ़े आठ हजार से ज्यादा सफाईकर्मी, लगातार काम करते हुए शहर को चकाचक रखते हैं.

-इंदौर म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन यानी IMC की गाड़ियों से हर घर और दुकान से गीला और सूखा कचरा अलग-अलग जमा किया जाता है.

-इंदौर में करीब 35 हजार घरों में गीले कचरे से खाद बनाने वाली इकाइयां लगी हैं.

-इंदौर में कचरा साफ करने के सात प्रोसेसिंग प्लांट्स हैं.

-शहर को साफ रखने के लिए रोड क्लीनिंग मशीनें शहर की मुख्य सड़कों की सफाई करती हैं.

-पूरे शहर में तीन हजार से ज्यादा डस्टबिन सड़क किनारे लगे हैं, जिनसे रोज कचरा उठाया जाता है.

-कचरा कम करने के लिए इंदौर ने 3 R फॉर्मूले यानी Reduce, Recycle और Re-use को अपनाया है.

-इंदौर में सिंगल यूज प्लास्टिक उत्पादों के इस्तेमाल पर काफी पहले ही प्रतिबंध लगाया जा चुका है.

-डिस्पोजेबल फ्री मार्केट बनाने के लिए बर्तन बैंक और झोला बैंक खोले गए हैं.

-शहर की 16 हजार से ज्यादा इमारतों में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम है.

-सीवेज के शोधित पानी का करीब 12 प्रतिशत हिस्सा IMC के 24 बाग-बगीचों में दोबारा इस्तेमाल किया जा रहा है.

-नालों की सफाई कर स्वच्छता को अगले मुकाम तक पहुंचाया गया है.

-जलाशयों, पुल-पुलियाओं और चौराहों पर सौंदर्यीकरण का काम हुआ है.

अब शहर में कचरा एक बोझ नहीं
इंदौर प्रशासन की इन नीतियों और योजनाओं की वजह से अब शहर में कचरा एक बोझ नहीं, बल्कि एक कीमती संसाधन बन चुका है और अब स्वच्छता, इंदौर के हर नागरिक का स्वभाव बन चुका है.

कहते हैं कि कोई भी क्रांति जनता के सहयोग के बिना सफल नहीं हो सकती. इंदौर ने चार वर्षों में जो स्वच्छता क्रांति की है, उसमें इंदौर वासियों की मुख्य भूमिका है. जिन्होंने अपने शहर को देश का सबसे साफ शहर बनाने का सपना देखा और इस सपने को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और ये साबित कर दिया कि अगर मन में इच्छा हो, तो कोई भी काम मुश्किल नहीं होता. आज अपनी इस सफलता पर इंदौर खुशी से झूम रहा है.

यहां आपको एक बात और समझनी चाहिए और वो ये है कि इस सर्वेक्षण में 4 हजार से ज्यादा शहरों को शामिल किया गया है. इनमें बहुत कम आबादी वाले शहर भी हैं जिन्हें लोकल बॉडीज यानी स्थानीय निकाय भी कहा जाता है. ऐसा इसिलए किया गया है ताकि ज्यादा से ज्यादा नगर निगम इसमें शामिल किए जा सके और जवाबदेही तय हो पाए.

सफाई कर्मियों और उनके परिवारों के लिए इंश्योरेंस कवर की व्यवस्था
स्वच्छता के मामले में देश में पहले नंबर पर मौजूद इंदौर और दूसरे शहरों की विशेषता ये है कि यहां के लोगों ने भी अपने शहर को साफ बनाने की मुहिम में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और सफाई कर्मियों का सम्मान करना सीखा.

उदाहरण के लिए इंदौर जैसे शहरों में सफाई कर्मियों और उनके परिवारों के लिए इंश्योरेंस कवर की व्यवस्था की गई है. सफाई कर्मियों को प्रॉविडेंट फंड की सुविधा भी दी जा रही है. साथ ही सफाई कर्मियों को पहचान पत्र, ड्रेस और ग्लव्स जैसी सुविधाएं भी दी जाती हैं. इंदौर में स्वच्छ भारत मिशन के तहत 201 पब्लिक टॉयलेट्स और 128 कम्युनिटी टॉयलेट्स का निर्माण किया गया और इसकी वजह से ये शहर खुले में शौच की समस्या से मुक्त हो गया.

स्वच्छता सर्वेक्षण में जिन शहरों की रैंकिंग अच्छी है वहां जीरो सॉलिड वेस्ट का लक्ष्य निर्धारित किया गया है यानी इन शहरों में जरा सा भी सॉलिड वेस्ट बर्बाद नहीं किया जाता. जिस कचरे को रिसाइकल किया जा सकता है उसे बेच दिया जाता है, फल सब्जियों से पैदा होने वाले कूड़े को खाद में बदल दिया जाता है और प्लास्टिक के कचरे को क्रूड ऑयल प्लांट में भेज दिया जाता है या फिर इस प्लास्टिक से सड़कें और फुटपाथ बना दिए जाते हैं.

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