मालवा क्यों साबित हो सकता है मध्य प्रदेश का 'सूरत'?

गुजरात चुनाव की खासियत यह थी कि पूरे गुजरात में दोनों पार्टियों के बीच कांटे का मुकाबला हुआ और दोनों को तकरीबन बराबर सीटें मिलीं, बल्कि कांग्रेस कुछ आगे ही निकल गई थी. लेकिन जब बात सूरत की 20 सीटों की आई तो भाजपा ने एकतरफा 18 सीटें जीत लीं.

मालवा क्यों साबित हो सकता है मध्य प्रदेश का 'सूरत'?

नई दिल्ली: मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए वोटिंग हुए चार दिन बीत चुके हैं. मुकाबले में शामिल दोनों मुख्य पार्टियां भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दम साधे बैठी हुई हैं. 230 विधानसभा सीटों में 116 का आंकड़ा हासिल करना उनका पहला लक्ष्य है. इसके ऊपर जो सीटें मिल जाएं वह जनता जनार्दन का आशीर्वाद होगा.

ऐसे में जो गणित लगाए जा रहे हैं, उसमें मध्य प्रदेश चुनाव की तुलना गुजरात चुनाव से अक्सर की जा रही है. गुजरात चुनाव की खासियत यह थी कि पूरे गुजरात में दोनों पार्टियों के बीच कांटे का मुकाबला हुआ और दोनों को तकरीबन बराबर सीटें मिलीं, बल्कि कांग्रेस कुछ आगे ही निकल गई थी. लेकिन जब बात सूरत की 20 सीटों की आई तो भाजपा ने एकतरफा 18 सीटें जीत लीं. 
बीजेपी ने सूरत में ये सीटें ऐसे समय जीतीं थी जब जीएसटी को लेकर व्यापारियों ने महीनों अपने दुकानें बंद रखी थी. करोड़ों का नुकसान उठाया था. पुलिस की लाठियां खाई थीं. चुनावी पंडित अनुमान लगा रहे थे कि बीजेपी यहां बुरी तरह मात खाएगी लेकिन जब नतीजा आया तो हर कोई हैरान रह गया.

सूरत का किस्‍सा
सूरत के इस दमदार प्रदर्शन की कई वजहें थीं. यह बीजेपी का पारंपरिक गढ़ था. इस दरकते गढ़ को बचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद की प्रतिष्ठा दांव पर लगाई. यहीं उन्होंने सी-प्लेन उड़ाया. आखिरी वक्त में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने बगावत की एक संभावना को पार्टी के प्रति सद्भावना में बदला. इस तरह सूरत जीतकर बीजेपी गुजरात जीत गई.

कुछ-कुछ यही हाल मध्य प्रदेश का है. एमपी में चंबल-ग्वालियर, बुंदेलखंड, बघेलखंड, महाकौशल और सेंट्रल मध्य प्रदेश में कांग्रेस और बीजेपी के बीच कांटे का मुकाबला है. इन इलाकों के एकतरफा किसी एक पार्टी की तरफ जाने की संभावनाएं कम ही नजर आ रही हैं. बल्कि राजनीतिक पंडितों की मानें तो कांग्रेस पहले से कहीं आगे बढ़ रही है.

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मालवा-निमाड़
ऐसे में सबकी निगाहें मालवा-निमाड़ पर हैं. मालवा-निमाड़ का मतलब हुआ इंदौर, उज्जैन और मंदसौर वगैरह का इलाका. इस इलाके में बीजेपी पारंपरिक रूप से ताकतवर है. लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन आठ बार से इंदौर की सांसद हैं. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के करीबी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय यहां के प्रमुख नेता हैं और उनके पुत्र भी इस बार चुनाव मैदान में हैं. मध्य प्रदेश बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता पारस जैन, अर्चना चिटनीस, अतर सिंह आर्य, विजय शाह और बालकृष्ण पाटीदार इसी इलाके से आते हैं.

उधर कांग्रेस की तरफ से चार पूर्व मंत्री सुभाष सोजतिया, नरेंद्र नाहटा, हुकुम सिंह कराड़ा और बाला बच्चन चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन सिंह वर्मा और विजय लक्ष्मी साधौ भी यही से चुनाव मैदान में हैं. इसके अलावा प्रदेश कांग्रेस के तेजतर्रार उपाध्यक्ष जीत पटवारी भी चुनाव लड़ रहे हैं. कांग्रेस ने जयस नेता डॉ हीरालाल अलावा को भी मैदान में उतारा है. आदिवासी इलाकों में अलावा एक नई अपील के साथ उभरे हैं.

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इस इलाके से विधानसभा की 66 सीटें आती हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी को इनमें से 56 सीटें मिली थीं, वहीं कांग्रेस के पास महज 9 सीटें थीं. यानी इस इलाके को हासिल करने के लिए कांग्रेस को बहुत ही ज्यादा मेहनत करनी होगी. अगर कांग्रेस इस इलाके में 30 से 35 सीटें नहीं जीतती तो उसके लिए भोपाल के वल्लभ भवन के दरवाजे नहीं खुलेंगे. 30 से 35 सीट जीतने का मतलब है कि कांग्रेस यहां अपने प्रदर्शन में तीन से चार गुना का इजाफा करे. प्रदर्शन में इतना ज्यादा सुधार तभी आता है जब किसी पार्टी का जबरदस्त अंडर करंट हो.

मंदसौर में किसानों का आंदोलन
मालवा-निमाड़ की इस संवेदनशील स्थित को बीजेपी और कांग्रेस दोनों समझ रही हैं. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसीलिए चुनाव अभियान की शुरुआत मालवा में किसान-मजदूर रैली से की थी. यहीं उन्होंने पहली बार किसानों का कर्ज माफ करने का वादा किया था. कांग्रेस ने निमाड़ को इसलिए चुनाव क्योंकि जून 2017 में मंदसौर में किसानों पर गोली चली थी और यह इलाका कृषि संकट और किसानों के गुस्से का केंद्र बन गया था.

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जून 2017 में मंदसौर में किसानों पर गोली चली थी और यह इलाका कृषि संकट और किसानों के गुस्से का केंद्र बन गया था.(फाइल फोटो)

इस नाजुक हालत को समझते हुए बीजेपी ने भी मालवा को पूरी तरह सुरक्षित रखने के लिए अपने सारे घोड़े खोल दिए थे. वोटिंग से तीन दिन पहले से अमित शाह खुद यहां के हालात पर नजर रखे हुए थे. उस समय तक बीजेपी को जो फीड-बैक मिल रहा था, उसके मुताबिक प्रदेश की 47 सीटें ऐसी थीं, जिन पर पार्टी बेहद कांटे का मुकाबला मान रही थी. इन सीटों को भाजपा की तरफ मोड़ने के लिए आखिरी वक्त में हर दांव पार्टी ने चला. जहां जरूरत हुई पार्टी ने अपने बागियों को मनाया और जहां जरूरत आगे पड़ी वहां अपने प्रत्याशी को पीछे करके बागियों को बढ़ावा दिया, ताकि किसी सूरत में कांग्रेस का प्रत्याशी न जीत सके.

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कांग्रेस की तुलना में मालवा-निमाड़ में बीजेपी की चुनौती कम से कम आंकड़ों में तो आसान है. कांग्रेस को अगर खुद को तीन से चार गुना आगे बढ़ाना होगा तो वहीं बीजेपी अगर पिछली बार से आधी से ज्यादा यानी करीब 35 सीटें ले आए तो वह मालवा-निमाड़ के साथ ही पूरा मध्य प्रदेश बचा सकती है.

वोटिंग के बाद दोनों पार्टियां दावा कर रही हैं कि उन्होंने अपने हिस्से की गणित साध ली है. लेकिन असल में तो सब कुछ मतदाता के हाथ में है. उसने मध्य प्रदेश के इस सूरत की सूरत कैसी बनाई है, उसी पर चुनाव नतीजों के सूरतेहाल तय होंगे.