सेना में महिलाओं के स्‍थायी कमीशन पर SC की बड़ी टिप्‍पणी, प्रक्रिया को बताया भेदभावपूर्ण; दिया रिव्‍यू का आदेश

Permanent Commission in Army: शॉर्ट सर्विस कमीशन में परमानेंट कमीशन देने के मामले में जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने आज फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि समाज पुरुषों के लिए पुरुषों द्वारा बनाया गया है, अगर यह नहीं बदलता है तो महिलाओं को समान अवसर नहीं मिल पाएगा.

सेना में महिलाओं के स्‍थायी कमीशन पर SC की बड़ी टिप्‍पणी, प्रक्रिया को बताया भेदभावपूर्ण; दिया रिव्‍यू का आदेश
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार को सेना में स्थायी कमीशन (Permanent Commission in Army) को लेकर महिलाओं के लिए मेडिकल फिटनेस की आवश्यकता को 'मनमाना' और 'तर्कहीन' माना है.  जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा कि हमारे समाज की संरचना पुरुषों द्वारा पुरुषों के लिए बनाई गई है, इसमें समानता की बात झूठी है. 

परमानेंट कमीशन पर दिया ये आदेश

कोर्ट ने महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन न देने पर अप्रत्यक्ष रूप से भेदभाव करने के लिए सेना की आलोचना की. कोर्ट ने कहा कि भारत के लिए अलग अलग क्षेत्रों में गौरव अर्जित करने वाली महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन के अनुदान देने के लिए नजरअंदाज किया गया.  कोर्ट ने सेना को दो महीने के भीतर महिला अधिकारियों के लिए परमानेंट कमीशन के अनुदान पर विचार करने के आदेश दिए हैं. 

मेडिकल के नियमों को बताया भेदभावपूर्ण  

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कहा कि सेना ने मेडिकल के लिए जो नियम बनाए हैं, वो महिलाओं के साथ भेदभावपूर्ण रवैये को दिखाते हैं. लेकिन महिलाओं को बराबर अवसर दिए बिना रास्ता नहीं निकल सकता. कोर्ट ने 2 महीने में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने के लिए कहा है.

फिटनेस के आधार पर स्थायी कमीशन न देने को गलत ठहराया  

सुप्रीम कोर्ट ने महिला अधिकारियों को फिटनेस के आधार पर स्थायी कमीशन नहीं देने को गलत बताया, वो भी तब जब अदालत पहले ही इस पर अपना फैसला सुना चुकी थी. कोर्ट ने कहा कि दिल्ली हाई कोर्ट ने इस पर 2010 में पहला फैसला दिया था. इस फैसले को 10 साल बीत गए हैं और मेडिकल फिटनेस, शरीर के आकार के आधार पर स्थायी कमीशन न दिया जाना भेदभाव को दिखाता है और यह अनुचित है.  

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल फरवरी के फैसले में केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि 3 महीने के भीतर सभी महिला सैन्य अधिकारियों को स्थायी कमीशन दिया जाए.

दलील को विचलित करने वाला और समता के सिद्धांत के विपरीत बताया

जस्टिस चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने सरकार की इस दलील को विचलित करने वाला और समता के सिद्धांत के विपरीत बताया था जिसमें कहा गया था कि शारीरिक सीमाओं और सामाजिक चलन को देखते हुए महिला सैन्य अधिकारियों की कमान पदों पर नियुक्ति नहीं की जा रही है. कोर्ट ने निर्देश दिया था कि शॉर्ट सर्विस कमीशन में सेवारत सभी महिला सैन्य अधिकारियों को स्थायी कमीशन दिया जाए, भले ही मामला 14 साल का हो या 20 साल की सेवा का हो.

 80 महिला अधिकारियों की ओर से दी गई थीं याचिकाएं  

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि सेना की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) मूल्यांकन और देर से लागू होने पर चिकित्सा फिटनेस मानदंड महिला अधिकारियों के खिलाफ भेदभाव करता है. अदालत ने कहा, 'मूल्यांकन के पैटर्न से एसएससी (शॉर्ट सर्विस कमीशन) महिला अधिकारियों को आर्थिक और मनोवैज्ञानिक नुकसान होता है.' महिला अधिकारी चाहती थीं कि उन लोगों के खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू की जाए जिन्होंने कथित रूप से अदालत के पहले के फैसले का पालन नहीं किया था.

सेना में स्थायी कमीशन (Permanent Commission in Army) के लिए 80 महिला अधिकारियों की तरफ से याचिकाएं दायर की गईं थीं, जिस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला सुनाया है.

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