बीकानेर: महाराजा करणी सिंह स्टेडियम का साइकलिंग वेलोड्रम हुआ बदहाल, प्रशासन बेखबर

सरकार द्वारा करीब 11 लाख की लागत से ये वेलोड्रम 1980 में अंतराष्ट्रीय मानकों के आधार पर किया गया, लेकिन इसके रख रखाव पर ध्यान नहीं देने के कारण ये वेलोड्रम आज बदहाली के आंसू रो रहा है. 

बीकानेर: महाराजा करणी सिंह स्टेडियम का साइकलिंग वेलोड्रम हुआ बदहाल, प्रशासन बेखबर
कभी इस वेलोड्रम पर खिलाड़ियों की चहलकदमी होती थी

त्रिभुवन रंगा/बीकानेर: राजस्थान के बीकानेर क्षेत्र खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय स्तर पर अपना परचम फहरा देश का नाम रौशन किया है. अगर बात करें साइकलिंग की तो इस शहर के खिलाड़ियों ने एक नहीं बल्कि सैकड़ों राष्ट्रीय स्तर के पदक अपनी झोली में डाले हैं. यहां तक कि कॉमनवेल्थ व एशियन गेम्स में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया है. लेकिन इन्हीं खिलाड़ियों की सुविधा के लिए दशकों पहले बना वेलोड्रम आज अपनी बदहाली के आंसू रो रहा है. वहीं, खिलाड़ियों को प्रेटिक्स के लिए अन्य शहरों में जाना पड़ रहा है.

वैसे तो, सरकार ने गांव और छोटे शहरों से प्रतिभा तराशने के लिए 'खेलो इंडिया' का नारा दिया है. इस योजना के तहत करोड़ों रूपये भी विज्ञापन में खर्च किये जा रहे है. लेकिन धरातल पर खिलाड़ियों के लिए जो मैदान बने है. उसकी कोई सुध नहीं ले रहा है. आर्थिक रूप से कमजोर खिलाडी संसाधनों के आभाव या यूं कहें कि प्रशासन की उदासीनता के कारण इनकी प्रतिभा निखरने से पहले ही दम तोड़ती नजर आ रही है.

हम बात कर रहे हैं, बीकानेर के महाराजा करणी सिंह स्टेडियम में बने साइकलिंग वेलोड्रम की. जिसका निर्माण तत्कालीन महाराजा के प्रयासों से सरकार द्वारा करीब 11 लाख की लागत से 1980 में उस वक्त के अंतराष्ट्रीय मानकों के आधार पर किया गया, लेकिन इसके रख रखाव पर ध्यान नहीं देने के कारण ये वेलोड्रम आज बदहाली के आंसू रो रहा है. जहां, कभी इस वेलोड्रम पर खिलाड़ियों की चहलकदमी होती थी, आज वो शराबियों ओर असमाजिक तत्वों का अड्डा बन गया है.

भारतीय साइकलिंग महासंघ के पूर्व संयुक्त सचिव किशन पुरोहित बताते है कि वेलोड्रम की बदहाल स्थति के कारण खिलाड़ियों को जान जोखिम में डाल कर नेशनल हाइवे पर अभ्यास करना पड़ रहा है. वहीं, राष्ट्रीय प्रतियोगिता से पूर्व अभ्यास के लिए खिलाड़ियों को अपने निजी खर्च पर जयपुर में बने वेलोड्रम पर जाना पड़ रहा है. बीकानेर का वेलोड्रम असामाजिक तत्वों की शरणगाह बन गया है.

भारतीय महिला टीम की खिलाडी मोनिका कहती है कि वेलोड्रम नहीं होने के कारण निजी खर्च पर बाहर जाना पड़ता महिला होने के कारण परिजनों को भी साथ ले जाना पड़ता है जिसके कारण अतरिक्त आर्थिक मार झेलनी पड़ती है. वहीं, नेशनल साइकलिस्ट भवानी शकर व भगीरथ कहते है कि वेलोड्रम नहीं होने के कारण हाइवे पर अभ्यास करना पड़ता है, जो हमेशा जोखिम भरा रहता है.

बहरहाल, खिलाड़ी इस उम्मीद से सरकार से आस लगाए है कि वो उनकी सुविधाओं को बहाल कराते हुए मरणासन्न स्थिति में पहुंचे वेलोड्रम का पुनर्निर्माण करवा कर आने वाली प्रतिभाओं को अपना दमखम दिखाने में मदद करेगी. अगर इसी तरह अनदेखी होती रहे तो कैसे खेलेगा इंडिया और आगे बढ़ेगा इंडिया.