close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में उठा बाल मजदूरी का मुद्दा, साहित्यकारों ने किया मंथन

सत्र का संचालन करते हुए हिशम मुंदोल कहा कि बच्चों से मजदूरी कराना आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं है

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में उठा बाल मजदूरी का मुद्दा, साहित्यकारों ने किया मंथन
सभी बच्चों को अपना भविष्य चुनने का अधिकार मिलना चाहिए

आशीष चौहान/जयपुर: जयपुर में बाल मजदूरी को समाप्त करने के प्रयास में हाल ही में लॉन्च की गई पहल चाइल्ड लेबर फ्री जयपुर (CLFJ) ने जयपुर लिट्रेचर फेस्टिवल के दौरान एक पैनल चर्चा का आयोजन किया, जिसमें जयपुर शहर में चल रही वर्कशॉप्स, घरेलू युनिट्स में काम करने वाले बाल मजदूरों को बचाने और इस मुद्दे पर जागरुकता फैलाने पर ज़ोर दिया गया.

पैनल चर्चा में बाल अधिकारों पर काम करने वाले नेताओं और लेखकों ने हिस्सा लिया जिसमे हर्श मंदेर, डायरेक्टर, सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज, रमेश पालीवाल, संस्थापक सदस्य एवं सचिव, टाबर; मिस पारो आनंद, बच्चों की पुस्तकों के जाने-माने लेखक ओर हैड ऑफ लिट्रेचर इन एक्शन ने समाज में बाल मजदूरी की समस्या को समाप्त करने के लिए स्थायी समाधानों पर चर्चा की. 

सत्र का संचालन करते हुए हिशम मुंदोल कहा कि बच्चों से मजदूरी कराना आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं है. उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय लेबर ऑफिस द्वारा किए गए एक अध्ययन पर बात करते हुए कहा कि बाल मजदूरी के फायदों की तुलना में इसके कारण समाज को पहुंचने वाले नुकसान की लागत सात गुना अधिक होती है. एक अनुमान के मुताबिक यह लागत विकासशील और बदलावपूर्ण अर्थव्यवस्थाओं में 5.1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है, जहां ज़्यादातर बाल मजदूर पाए जाते हैं.

पैनलिस्ट्स ने इस बात पर सहमति जताई कि गरीबी और बाल मजदूरी के बीच सीधा संबंध है, लेकिन इसका इस्तेमाल बाल मजदूरी को तर्क संगत बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए. अपने अनुभवों के आधार पर प्रतिभागियों ने बाल मजदूरी और सड़कों से बचाए गए बच्चों की चुनौतियों पर भी रौशनी डाली. उन्होंने इस विषय पर सामाजिक अवधारणाओं को बदलने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया. उन्होंने कहा कि हमें समाज को इस बारे में जागरुक बनाना होगा कि सभी बच्चों को अपना भविष्य चुनने का अधिकार मिलना चाहिए.

प्रवक्ताओं ने कहा कि इस समस्या को प्रभावी रूप से हल करने के लिए आम जनता सहित सभी हितधारकों का सहयोग अपेक्षित है. अपने विचार अभिव्यक्त करते हुए  पारो आनंद ने कहा, 'हमें बच्चों के इस दर्द को समझना होगा. हमें बच्चों की आवाज को सुनना होगा. ये सभी बच्चे हमारे अपने बच्चे हैं'.