जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल: गुलजार ने कहा- 'सियासत नई पीढ़ी की जुबान को खराब कर देगी'

फिल्म लेखिका नसरीन मुन्नी कबीर की किताब 'जिया जले- स्टोरीज बिहाइंड द सांग्स' पर चर्चा के दौरान उन्होंने फिल्मी गीतों के पीछे की रोचक कहानियां भी बताई. 

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल: गुलजार ने कहा- 'सियासत नई पीढ़ी की जुबान को खराब कर देगी'
गीतकार गुलजार ने कहा गीतों का अनुवाद हास्यास्पद नहीं होना चाहिए. (फाइल फोटो)

जयपुर: जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान शुक्रवार को गीतकार गुलजार ने कहा कि आज की सियासत में जिस तरह की जुबान इस्तेमाल हो रही है, वह सियासत और दोस्ती को तो खराब कर ही रही है, अगली पीढ़ी की जुबान भी खराब कर देगी. 

लिटरेचर फेस्टिवल के दूसरे दिन फिल्म लेखिका नसरीन मुन्नी कबीर की किताब 'जिया जले- स्टोरीज बिहाइंड द सांग्स' (jiya jale story behind the songs) पर नसरीन और संजोय के. राय के साथ चर्चा के दौरान उन्होंने फिल्मी गीतों के पीछे की रोचक कहानियां भी बताई. इसके अलावा अनुवाद के तरीके और फिल्मी गीत लिखने की प्रक्रिया पर भी चर्चा की. 

गुलजार ने कहा कि सियासत करने वालों को यह ध्यान रखना चाहिए कि जो जुबान वो आज बोल रहे है, वह नई पीढी तक जाएगी, इसलिए इस पर ध्यान जरूर दें. उन्होंने हिन्दी और उर्दू के विवाद पर कहा कि उर्दू हिन्दी से अलग नहीं है. इसका सिर्फ लहजा और साउंड ही इसे अलग बनाता है. हम जो बोलते है उसे हिन्दुस्तानी नाम दे दीजिए, सब झगड़ा खत्म हो जाएगा.

फिल्मी गीत और कविता के अंतर के बारे में गुलजार ने कहा कि कविता आपकी अभिव्यक्ति होती है. आपको पता होता है कि आपको क्या कहना है, लेकिन फिल्मी गीत ऐसा नहीं है. इसमें हमें एक सिचुएशन दे दी जाती है, किरदार का ध्यान रखना पडता है. उसकी जुबान का ध्यान रखना पडता है और फिर धुन के रूप में एक नता तुला कपडा दे दिया जाता है. हम उससे बाहर नहीं जा सकते, लेकिन फिर यह लिखने वाले पर निर्भर करता है कि वह उपर की तह के नीचे कितनी और तहें बना सकता है.

'जिया जले' की रिर्कार्डिंग का सुनाया दिलचस्प वाक्या

कार्यक्रम के दौरान फिल्म 'दिल से' के गीत 'जिया जले' की चर्चा करते हुए गुलजार ने कहा कि इस गीत की रिकार्डिंग के लिए लता जी पहली बार मुम्बई से बाहर गई थी. जिसकी रिकार्डिंग चेन्नई में हुई थी. वहां स्टूडियो में लता जी के सामने सिर्फ एक दीवार थी. इस दौरान लता जी ने उनसे कहा कि सामने किसी के ना होने पर मैं गाना नहीं गा पाउंगी. जिसके बाद गुलजार खुद एक कुर्सी लगा कर उनके सामने बैठ गए. जिसके बाद लता जी अपने गाने की रिकार्डिंग पूरी कर पाई. 

इस दौरान उन्होंने फिल्म 'स्लमडॉग मिलेनियर' के गीत 'जय हो' के बारे में कहा कि यह गीत पूरी तरह रहमान की संगीत और सुखविंदर की गायकी का कमाल है. रहमान ने हिन्दी फिल्म संगीत के प्रचलित मुहावरे को पूरी तरह से बदला है. 

सेशन के दौरान 'जिया जले- स्टोरीज बिहाइंड द सांग्स' के लेखक नसरीन मुन्नी कबीर ने कहा कि गीतों का अनुवाद हास्यास्पद नहीं होना चाहिए. और ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि लोग समझ ही न सके. ऐेसे में शब्दों का चयन बहुत मुश्किल काम होता है. 

वाट्सअप् पर गुलजार के नाम से आनी वाली कविताओं के बारे में उन्होंने कहा कि इनमें से एक भी मेरी नहीं है. जो लोग ऐसा कर रहे है, उन्हें अपने नाम से लिखने की हिम्मत दिखानी चाहिए.