जयपुर: राहत की बात, अब नहीं पीना पड़ेगा फ्लोराइड युक्त पानी

देश में फ्लोराइड प्रभावित आबादियों में से करीब 90 प्रतिशत राजस्थान में है. 

जयपुर: राहत की बात, अब नहीं पीना पड़ेगा फ्लोराइड युक्त पानी
प्रतीकात्मक फोटो

जयपुर: देश में फ्लोराइड प्रभावित आबादियों में से करीब 90 प्रतिशत राजस्थान में है. राजस्थान के लोगों को फ्लोराइड की समस्या से निजात दिलाने के लिए सरकार ने गत एक वर्ष में कई कदम उठाए हैं, जिसमें 500 से अधिक सौर ऊर्जा आधारित डीएफयू (डी-फ्लोरीडेशनयूनिट) लगाई है, जिससे सुद्ध पानी मिल सके.

देश में फ्लोराइड प्रभावित हैबिटेशंस (आबादियों) में से करीब 90 प्रतिशत राजस्थान में है. राज्य में पहली बार सौर ऊर्जा आधारित नलकूपों की स्थापना करने की पहल की गई है, जिससे ऐसे क्षेत्रों में भी जल उपलब्ध करवाना सम्भव हो पाएगा, जहां विद्युत की उपलब्धता नहीं है अथवा अनियमित है. 

भूजल स्तर नीचे जाने के कारण दूरदराज़ के ग्रामीण क्षेत्रों में फ्लोराइड युक्त पानी की समस्या उत्पन्न होती है. राज्य सरकार इस चुनौती का सामना करते हुए निरंतर सजगता से प्रयास कर रही है. लोगों को फ्लोराइड की समस्या से निजात दिलाने के लिए कई कदम उठाए गए हैं. 

वर्तमान सरकार के एक वर्ष के कार्यकाल में 500 से अधिक सौर ऊर्जा आधारित डीएफयू (डी-फ्लोरीडेशनयूनिट) लगाई गई है. राज्य के फ्लोराइड प्रभावित गांव एवं ढाणियों की समस्या के निदान पर सरकार का पूरा फोकस है तथा इस समस्या को प्राथमिकता दी जा रही है.

CM ने वर्ष 2019-20 के राज्य के बजट में फ्लोराइड प्रभावित गांव एवं ढाणियों में सौर ऊर्जा चलित डीएफयू लगाने की घोषणा की थी. इसकी अनुपालना में जलदाय विभाग द्वारा प्रदेश के गांव एवं ढाणियों में 1240 सोलर डीएफयू लगाने के लिए 202.21 करोड़ रूपये की स्वीकृति जारी की. इस वित्तीय वर्ष की समाप्ति तक 300 सोलर डीएफयू लगाने का लक्ष्य है. 

डी फ्लोरीडेशन के अतिरिक्त जल के शुद्धिकरण के लिए आस्ट्रेलिया सरकार के सहयोग से एमएनआईटी में हाइड्रोडिस तकनीक द्वारा पायलेट क्लोरीनेशन प्लांट की स्थापना की गई है. इस प्लांट की विशेषता है कि यह बिना किसी बाहरी रसायन को मिलाए पानी में उपलब्ध लवणों का उपयोग कर आवश्यक मात्रा में क्लोरीन गैस का निर्माण करता है, जो पानी को शुद्ध करती है. यह अपने आप में अनूठी एवं पेटेन्टेड तकनीक है. 

पानी में शुद्धिकरण के लिए मिलाए जाने वाले रसायनों से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ने की संभावना रहती है, लेकिन इस विधि द्वारा यह संभावना भी क्षीण हो जाती है. राज्य में वृहद स्तर पर इस तकनीक को उपयोग में लाने की वांछित स्वीकृति भी प्रक्रियाधीन है.