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आजादी के जश्म में डूबा देश भूला माचिया महल का इतिहास, कई स्वतंत्रता सेनानियों ने यहां दी थी अपनी जान

ऐसे महान स्वतंत्रता सेनानियों की यह जगह लावारिस हालत में पड़ी है. उनकी शहादत की कहानी भी किले की इन ऊंची दीवारों में दफन होकर रह गई है. 

आजादी के जश्म में डूबा देश भूला माचिया महल का इतिहास, कई स्वतंत्रता सेनानियों ने यहां दी थी अपनी जान
जोधपुर शहर से 10 किलोमीटर दूर पहाड़ो में माचिया सफारी पार्क में यह महल स्थित है.

जोधपुर: एक तरफ भारत देश में धारा 370 हटने की खुशी है तो दूसरी तरफ आजादी का जश्न यानि 15 अगस्त, लेकिन इन सबसे परे वीराने और सुनसान माचिया किले में सिर्फ तस्वीर तक सीमट कर रह गई देश के आजादी के नारों को बुलंद करने वाले स्वतंत्रता आंदोलन के परवानो की आवाज. हालांकि, प्रशासन को साल में एक बार ही यह स्वतंत्रता के सेनानी याद आते हैं. आज के दिन इसे खोल कर शहीदों के फोटो पर माला पहना कर फिर आमजन से दूर इनकी कहानी को इस वीरान किले में बंद कर दिया जाता है.

यह है जोधपुर का ऐतिहासिक माचिया किला, जो वर्तमान में माचिया पार्क में स्थित है. इस किले ने एक समय आजादी के परवानों की चीखे सुनी है, अंग्रजो द्वारा इसी किले में आजादी के दीवानों को बंधक बनाकर उन्हें यातनाएं दी जाती थीं, प्रताड़ित किया जाता था. इन ऊंची दीवारों के पीछे न जाने कितने लोगों ने देश को गुलामी से मुक्त करवाने के अंग्रेजो की प्रताड़नाय यातनाए सहते सहते तड़प तड़प कर ऊंची दीवारों के पीछे दम तोड़ दिया ताकि आने वाली पीढ़ी आजादी की रोशनी को देख सके. 

ऐसे महान स्वतंत्रता सेनानियों की यह जगह लावारिस हालत में पड़ी है. उनकी शहादत की कहानी भी किले की इन ऊंची दीवारों में दफन होकर रह गई है. हालांकि, सरकार सिर्फ इसे ऐतिहासिक किला बताकर ट्यूरिस्ट स्पॉट के रूप में डवलप करने के प्रयास कर रही है, लेकिन यहां देश के लिए कुर्बान होने वाले शहीदों की शहादत को भुलाया जा रहा है.  देश की आजादी के परवानो की गूंज माचिया किले की दीवारों में दबकर रह गई हैं. विकास के शोर में आजादी के परवानों की शहादत की आवाजें सुनाई नहीं देती. पर्यटकों को लुभाने के लिए इस ऐतिहासिक जगह पर सभी तरह के जतन किए जा रहे हैं, लेकिन इतिहास को भुलाकर और अपनी इसी सवरती स्थिति के साथ आंसू भी बहा रहा है. यहां स्वतंत्रता सेनानियों की गैलरी तो बनी, उनकी जीवनी और जीवन परिचय भी है, लेकिन इसे जनता आज भी नहीं देख सकती क्योिकी मचिया पार्क जॉन क्षेत्र में आने की वजह से वन विभाग द्वारा यहां आम पब्लिक को जाने की मनाही है. 

जोधपुर शहर से 10 किलोमीटर दूर पहाड़ो में माचिया सफारी पार्क हैं. यहां जोधपुर भ्रमण पर आने वाले देशी विदेशी पर्यटक माचिया जैविक पार्क में आते हैं, यहां जीव जन्तु देखने तक ही उनको अनुमति हैं. यहीं से एक रास्ता सीधा ऊपर माचिया किले पर जाता है, जो एक गुमनाम खण्डर लगता है. जहां आज भी सन्नाटा पसरा हुआ है. यह सन्नाटा यह बताता है कि आज हम हमारे उन शहीदों को कितनी श्रद्धा और तवज्जो देते हैं. देख रेख के अभाव में यहां जमीन पर सुखी घास उग आई है. इसी खंडर किले में देश को आजादी दिलाने में अपना योगदान देने वाले आजादी के परवानों को यातनाएं चीख चीख कर कुछ कहना चाहती हैं, लेकिन उन्हें जैसे किसी गुमनामी में डाल दिया गया है. इस किले में कुछ किया भी तो आजादी के परवानों की सिर्फ और सिर्फ तस्वीरें हैं. जिन पर या तो जाले लग गए या फिर पक्षियों ने अपने घोंसले बना लिए. इन शहीदों की शहादत याद आती है तो बस साल में दो बार जब इनकी तस्वीरों पर फूल मालाएं पहनाकर श्रदांजलि देकर इतिश्री कर दी जाती हैं. 

बरहाल देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देने वाले आजादी के परवानों की आवाज इस किले की ऊंची दीवारों के पीछे ही दबकर रह गई हैं. शायद अंग्रेजो ने भी देश के दीवानों को इस किले में इसी उद्देश्य से बंधक बनाकर यातनाएं दी थी कि उनकी आजादी की गूंज इस किले की ऊंची दीवारों में दबकर रह जाएं, और आज हम भी कुछ ऐसा ही कर रहे हैं, लेकिन जरूरत है तो सरकार को इस दिशा में कुछ करने कि ताकि आजादी के दीवानों के जीवन और उनके बारे में देश की युवा पीढ़ी जान सके और उन्हें जो सम्मान मिलना चाहिए वो मिल सके.

यहां घूमने आए पर्यटक रिया का कहना है कि माचिया पार्क के ऐतिहासिक किले में स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीरें हैम. जिसे कोई पर्यटक या आमजन देख नहीं सकता जब मुझे इसकी जानकारी हुई तो मुझे भी लगा कि हमें यह देखने की अनुमति मिलनी चाहिए. मैं टूरिज्म विभाग और सरकार से मांग करती हूं कि हमारे देश के लिए बलिदान होने वाले इन फ्रीडम फाइटर के जीवन के बारे में युवा पीढ़ी जान सके इसके लिए कोई कदम उठाना चाहिए. जब हम माचिया पार्क में जानवरों को देख सकते हैं तो इस किले को भी देखने की अनुमति मिलनी चाहिए.

यहां पर कैद एक पूर्व स्वतंत्रता सेनानी के बेटे सुरेश जैन का कहना था कि इस किले में अंग्रेजों द्वारा स्वतंत्रता के लिए अपनी आवाज बुलंद करने वालों को पकड़कर एक छोटी सी कोठरी में रखकर यातनाएं दी जाती थीं. मेरे पिता भी यहीं पर रहे. यहां करीब 28 लोगों को अंग्रेजों ने बेड़ियो से बंधक बनाकर यातनाएं दी थी. कई लोगों ने तड़प-तड़प कर इस किले की ऊंची दीवारों के पीछे ही देश के लिए अपनी जान दे दी थी.